Bhagwat Sharan Mathur Inspiring Journey

संघ कार्य के 100 वर्ष: सेवा की साधना, त्याग का तेज 

संघ के वरिष्ठ प्रचारक भगवत शरण माथुर का जीवन त्याग, सेवा और राष्ट्र समर्पण की प्रेरक गाथा रहा। वनवासी सेवा से संगठन निर्माण तक उनका योगदान याद किया जा रहा है।

By : स्वदेश डेस्क
संघ कार्य के 100 वर्ष: सेवा की साधना, त्याग का तेज 

सांझ ढल रही थी । नर्मदा अंचल के एक दूरस्थ वनवासी गाँव में मिट्टी के आँगन पर चूल्हे की धुंधली आँच जल रही थी। कुछ बच्चे फटे कापियों में टिमटिमाते दीये की रोशनी में लिखने का प्रयास कर रहे थे। तभी दूर से शुभ्र वेश में एक व्यक्ति आती एक धीरे-धीरे उस आँगन में प्रवेश करते हैं। वे चुपचाप बच्चों के पास बैठ जाते हैं, उनकी कॉपियाँ देखते हैं, सिर पर स्नेह से हाथ फेरते हैं और पूछते हैं-'पढ़ाई में कोई कठिनाई तो नहीं?' बच्चों की आँखों में जो चमक उभरती है, वही इस आगंतुक की पहचान है। यह हैं भगवत शरण माथुर, जिनका जीवन सेवा को केवल विचार नहीं, बल्कि व्यवहार में उतारने का जीवंत उदाहरण है।

आपातकाल में विचारों की अग्निपरीक्षाः आपातकाल का समय उनके जीवन की अग्निपरीक्षा था। लगभग 19 महीने जेल में रहने के बावजूद उनके विचारों की ज्योति मंद नहीं पड़ी। जेल की कठोर परिस्थितियों में भी वे अन्य बंदियों के बीच आशा और साहस का संचार करते रहे। उनके लिए यह संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का संकल्प था। उन्होंने कभी समझौते का मार्ग नहीं चुना, यह उनकी वैचारिक निष्ठा की सबसे बड़ी पहचान है।

संपत्ति का समाज को समर्पणः उनके जीवन का एक अत्यंत मार्मिक और प्रेरक प्रसंग है पैतृक संपत्ति का समर्पण। सामान्यतः मनुष्य जीवनभर जो कुछ अर्जित करता है, उसे सुरक्षित रखने का प्रयास करता है, लेकिन माथुर जी ने इसके विपरीत अपनी संपूर्ण पैतृक संपत्ति समाज को समर्पित कर दी। 'अपने लिए क्या रखा?' इस प्रश्न के उत्तर में उनका सहज वाक्य 'जब समाज ही अपना है, तो अलग से अपने लिए क्या रखना?' उनके त्याग की पराकाष्ठा को प्रकट करता है। इसी भाव से उन्होंने 'नर्मदेहर सेवा न्यास' की स्थापना की, जो आज भी वनवासी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वावलंबन के दीप प्रज्वलित कर रहा है।

वनवासी अंचल में सेवा का विस्तारः वनवासी अंचलों में उनका कार्य केवल योजनाओं तक सीमित नहीं रहा। वे स्वयं दुर्गम पगडंडियों पर चलकर गाँव-गाँव पहुँचे, लोगों के बीच बैठे, उनकी समस्याओं को सुना और उन्हें अपना बना लिया। एक बार जब गाँव के लोगों ने पूछा कि वे बार-बार क्यों आते हैं, तो उनका उत्तर था कि 'जब तक आपकी समस्याएँ मेरी नहीं बनेंगी, तब तक समाधान भी अधूरा रहेगा।' यह संवाद केवल शब्द नहीं, बल्कि उनके कार्यपद्धति का सार था।

कार्यकर्ता निर्माणः संगठन निर्माण में उनकी भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही। वे केवल दायित्व निभाने वाले व्यक्ति नहीं, बल्कि कार्यकर्ता गढ़ने वाले मार्गदर्शक थे। हर छोटे कार्यकर्ता से व्यक्तिगत संबंध रखना, उसकी चिंता करना और गलती होने पर उसे सुधार का अवसर देना, यह उनकी शैली थी। एक युवा कार्यकर्ता की भूल पर उन्होंने उसे डाँटने के बजाय समझाया-'गलती से सीखो, उससे डरकर पीछे मत हटो।' इस दृष्टिकोण ने अनेक कार्यकर्ताओं को आत्मविश्वास और दिशा दी।

पद नहीं, सेवा का माध्यमः उच्च पदों पर पहुँचने के बाद भी उनके व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया। वे स्वयं को सदैव कार्यकर्ता ही मानते रहे। उनके लिए पद प्रतिष्ठा का नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम था। यह विनम्रता ही उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी शक्ति है।

कर्मयोग की जीवंत परंपरा

भगवत शरण माथुर का जीवन एक ऐसी गाथा है, जिसमें त्याग शब्द नहीं, कर्म है, सेवा विचार नहीं, साधना है; और संगठन केवल संरचना नहीं, बल्कि संस्कार है। वे उन दुर्लभ व्यक्तित्वों में हैं, जो चुपचाप कार्य करते हुए समाज की धड़कनों में बस जाते हैं।उनके जीवन की हर कथा यह संदेश देती है कि सच्ची सेवा वही है, जिसमें 'मैं' का स्थान 'हम' ले लेता है और यही उनके जीवन का सार है। उन्होंने मध्यप्रदेश हरियाणा में संगठन का कुशलता से कार्य किया। 15-16 दिसंबर 2021 की दरमियानी रात भोपाल में उनका निधन हुआ। उनका जीवन हमेशा प्रेरणा देता रहेगा।

साधना से संकल्प तक

ग्राम सीका के ग्रामीण परिवेश में 13 अप्रैल 1951 को जन्मे माथुर जी ने प्रारंभ से ही जीवन को साधना की तरह जिया। 1975 में जब देश राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था, उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में स्वयं को पूर्णतः समर्पित कर दिया। प्रचारक जीवन का अर्थ उन्होंने केवल संगठन विस्तार नहीं, बल्कि आत्मानुशासन, त्याग और समाज के प्रति पूर्ण उत्तरदायित्व के रूप में समझा। यही कारण रहा कि उनके व्यक्तित्व में सादगी और दृढ़ता एक साथ दिखाई देती है।





 

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