भारत की नई जल नीति

सिंधु जल संधि: छह दशक पुरानी उदारता बनाम 21वीं सदी का रणनीतिक यथार्थ

जल अब केवल संसाधन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संप्रभुता, सामरिक प्रतिरोध और भू-राजनीतिक शक्ति का निर्णायक उपकरण बन चुका है

By : स्वदेश डेस्क
सिंधु जल संधि: छह दशक पुरानी उदारता बनाम 21वीं सदी का रणनीतिक यथार्थ

 अनुराग तागड़े 

दक्षिण एशिया की सामरिक राजनीति में सिंधु जल संधि लंबे समय तक “सह-अस्तित्व” और “कूटनीतिक उदारता” के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत की जाती रही, किंतु वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में यह संधि अब एक नए विमर्श, नए प्रतिरोध और नई सामरिक पुनर्व्याख्या के केंद्र में आ खड़ी हुई है। छह दशक पूर्व जिस समझौते को शांति, सद्भावना और क्षेत्रीय स्थिरता की आधारशिला माना गया था, वही आज राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमा-पार आतंकवाद, जलवायु संकट, ऊर्जा संप्रभुता और भू-राजनीतिक शक्ति-संतुलन के प्रश्नों से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ चुका है।

संयुक्त राष्ट्र के “विश्व जल दिवस 2026” मंच पर भारत द्वारा सिंधु जल संधि को आतंकवाद के प्रश्न से जोड़ते हुए जिस स्पष्टता और कठोरता के साथ अपना दृष्टिकोण रखा गया, उसने यह संकेत दे दिया है कि नई दिल्ली अब “एकतरफा उदारता” की पुरानी कूटनीतिक संरचना से बाहर निकल चुकी है। भारत का यह कथन कि पाकिस्तान जब तक आतंकवाद को राज्य-नीति के औजार के रूप में त्याग नहीं देता, तब तक सामान्य परिस्थितियां संभव नहीं हैं वस्तुतः भारत की बदलती सामरिक चेतना का उद्घोष है।वास्तव में सिंधु जल संधि केवल जल-वितरण का तंत्र नहीं थी; यह भारत की उस आदर्शवादी विदेश नीति का भी प्रतिबिंब थी, जो यह मानकर चलती थी कि नैतिक उदारता, आर्थिक सहयोग और राजनीतिक सद्भावना अंततः स्थायी शांति का मार्ग प्रशस्त करेंगे। किंतु इतिहास ने बार-बार यह सिद्ध किया कि पाकिस्तान ने भारत की उदारता को सदैव उसकी रणनीतिक दुर्बलता के रूप में ग्रहण किया।1947 के विभाजन के साथ केवल भूभाग नहीं बंटा था; नदियां, संसाधन, सभ्यतागत संपर्क और आर्थिक संरचनाएं भी विभाजित हुई थीं। सिंधु नदी प्रणाली, जिसमें सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज जैसी नदियां सम्मिलित हैं, भारतीय उपमहाद्वीप की कृषि और सभ्यता की प्राणधारा रही हैं। विभाजन के पश्चात भारत ऊपरी तटवर्ती राष्ट्र बना, जबकि पाकिस्तान की कृषि अर्थव्यवस्था इन नदियों के जल पर लगभग पूर्णतः निर्भर हो गई।

यही वह बिंदु था, जहां भारत के पास स्वाभाविक सामरिक बढ़त थी। किंतु तत्कालीन भारतीय नेतृत्व ने शक्ति-राजनीति के स्थान पर नैतिक कूटनीति को प्राथमिकता दी। परिणामस्वरूप 1960 की सिंधु जल संधि में भारत ने संपूर्ण नदी प्रणाली के लगभग 80 प्रतिशत जल पर पाकिस्तान का अधिकार स्वीकार कर लिया, जबकि स्वयं केवल 20 प्रतिशत जल पर सीमित हो गया।इतिहास का यह संभवतः एकमात्र उदाहरण है, जहां ऊपरी तटवर्ती राष्ट्र ने न केवल अपने प्राकृतिक अधिकारों का बड़ा हिस्सा छोड़ा, बल्कि बदले में आर्थिक भुगतान भी किया। भारत ने पाकिस्तान को लगभग 62 मिलियन पाउंड की सहायता दी, ताकि वह अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में जल अवसंरचना विकसित कर सके।

यहां सबसे बड़ा प्रश्न केवल जल-वितरण का नहीं, बल्कि उस मानसिकता का है, जिसके अंतर्गत भारत ने यह मान लिया था कि उदारता स्थायी सद्भावना को जन्म देगी। किंतु इसके पश्चात भारत ने क्या देखा?

1965 का युद्ध, 1971 का युद्ध, कारगिल संघर्ष, पंजाब और जम्मू-कश्मीर में प्रायोजित आतंकवाद, मुंबई हमला, उरी, पुलवामा और पहलगाम जैसे आतंकी आक्रमण— इन सबने यह स्पष्ट कर दिया कि पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि को कभी “सद्भावना” के प्रतीक के रूप में नहीं देखा। उसने इसे भारत की स्थायी रियायत के रूप में ग्रहण किया।यही कारण है कि आज भारत में यह प्रश्न तीव्रता से उठ रहा है कि क्या कोई भी संधि अनंतकाल तक केवल एक पक्षीय नैतिकता के आधार पर जीवित रह सकती है? क्या कोई राष्ट्र अपनी संप्रभुता, सुरक्षा और संसाधनों की अनदेखी करके केवल आदर्शवाद के सहारे रणनीतिक स्थिरता बनाए रख सकता है?

वर्तमान परिस्थिति में यह बहस और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि 1960 और 2026 की वैश्विक वास्तविकताओं में व्यापक अंतर है। जब संधि हुई थी, तब न जलवायु परिवर्तन का वर्तमान संकट था, न ऊर्जा संक्रमण की आवश्यकता, न जनसंख्या का विस्फोट और न ही आधुनिक जल-प्रौद्योगिकी की उपलब्धता।आज हिमालयी हिमनद तीव्र गति से पिघल रहे हैं। मानसूनी चक्र अस्थिर हो चुका है। जल-संकट विश्वव्यापी भू-राजनीतिक प्रश्न बन चुका है। स्वच्छ ऊर्जा की वैश्विक आवश्यकता ने जलविद्युत परियोजनाओं के महत्व को कई गुना बढ़ा दिया है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे सामरिक क्षेत्रों के विकास के लिए भी पश्चिमी नदियों का अधिक प्रभावी उपयोग भारत की आवश्यकता बन चुका है।इसीलिए भारत अब यह स्पष्ट संकेत दे रहा है कि वह पश्चिमी नदियों पर अपने वैध अधिकारों का अधिकतम उपयोग करेगा। यह केवल विकासात्मक आवश्यकता नहीं, बल्कि सामरिक आवश्यकता भी है।पाकिस्तान की वास्तविक चिंता इसी बिंदु से प्रारंभ होती है। उसकी लगभग 80 प्रतिशत कृषि सिंधु बेसिन पर निर्भर है। सिंध, पंजाब और खैबर पख्तूनख्वा जैसे प्रांतों की खाद्य सुरक्षा इन नदियों के जल से संचालित होती है। धान, गन्ना, आम, खरबूजा और अन्य जल-आधारित कृषि उत्पादन सीधे सिंधु प्रणाली से जुड़े हुए हैं।यदि भारत अपने वैध अधिकारों का भी पूर्ण उपयोग करता है, तो पाकिस्तान की जल-आधारित अर्थव्यवस्था पर व्यापक दबाव उत्पन्न हो सकता है। यही कारण है कि पाकिस्तान इस प्रश्न को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक ले जाने की तैयारी कर रहा है।

किंतु यहां भी परिस्थितियां 1960 जैसी नहीं हैं। उस समय भारत एक नवस्वतंत्र विकासशील राष्ट्र था; आज भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। अमेरिका, फ्रांस, इजराइल, खाड़ी राष्ट्रों और यूरोपीय शक्तियों के साथ उसके सामरिक संबंध अभूतपूर्व रूप से मजबूत हुए हैं। दूसरी ओर पाकिस्तान की वैश्विक छवि आतंकवाद, आर्थिक अस्थिरता और कट्टरपंथी नेटवर्कों से जुड़ी रही है।

यदि पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र अथवा अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की शरण लेता भी है, तो यह केवल कानूनी विवाद नहीं रहेगा। यह आतंकवाद, जल-सुरक्षा, सामरिक संप्रभुता और भू-राजनीतिक शक्ति-संतुलन का व्यापक प्रश्न बन जाएगा। भारत यह तर्क रखने की स्थिति में है कि कोई भी संधि पारस्परिक विश्वास पर आधारित होती है और यदि एक पक्ष निरंतर युद्धोन्मुखी एवं आतंक-समर्थक नीति अपनाता है, तो परिस्थितियों में मूलभूत परिवर्तन का सिद्धांत लागू होता है।

वास्तव में यह पूरा विवाद भारत की विदेश नीति में आए गहरे परिवर्तन को भी प्रतिबिंबित करता है। स्वतंत्रता के बाद भारत की विदेश नीति नैतिक आदर्शवाद और गुटनिरपेक्षता पर आधारित थी, किंतु आज भारत “रणनीतिक यथार्थवाद” की दिशा में स्पष्ट रूप से आगे बढ़ चुका है। नई दिल्ली अब यह मानकर चल रही है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है,संसाधन-संप्रभुता अपरिहार्य है,आतंकवाद और सामान्य संबंध साथ-साथ नहीं चल सकते, और जल, ऊर्जा, डेटा तथा समुद्री मार्ग 21वीं सदी की वास्तविक शक्ति-संरचनाएं हैं।इसी संदर्भ में सिंधु जल संधि अब केवल नदी-जल बंटवारे का दस्तावेज नहीं रह गई है।

यह भारत की सामरिक आत्मनिर्भरता, भू-राजनीतिक पुनर्संतुलन और राष्ट्रीय संप्रभुता के पुनर्परिभाषण का प्रतीक बन चुकी है। स्पष्ट है कि आने वाले वर्षों में दक्षिण एशिया की राजनीति में जल सबसे महत्वपूर्ण सामरिक प्रश्नों में से एक बनने जा रहा है। और इस बार भारत केवल “सद्भावना” की भाषा में नहीं, बल्कि “रणनीतिक क्षमता” और “राष्ट्रीय हित” की भाषा में संवाद करता दिखाई दे रहा है।

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