अनुराग तागड़े
नई दिल्ली। एक समय था जब भारत को दुनिया का सबसे बड़ा रक्षा आयातक कहा जाता था। लड़ाकू विमान से लेकर तोप, मिसाइल, हेलीकॉप्टर और युद्धपोत तक के लिए देश को विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता था। लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है। आने वाला दशक भारत के रक्षा क्षेत्र के लिए वैसा ही साबित हो सकता है जैसा 1990 का दशक भारतीय आईटी उद्योग के लिए साबित हुआ था।भारत अब केवल अपनी सेना की जरूरतें पूरी करने वाला देश नहीं रहना चाहता, बल्कि वैश्विक रक्षा विनिर्माण और निर्यात का एक प्रमुख केंद्र बनने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2029 तक रक्षा उत्पादन को 3 लाख करोड़ रुपये और रक्षा निर्यात को 50 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है।
आयातक से निर्यातक बनने की ऐतिहासिक यात्रा
भारत की रक्षा यात्रा का सबसे बड़ा परिवर्तन यह है कि जो देश एक दशक पहले हथियारों के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर था, वही आज दुनिया के अनेक देशों को रक्षा उपकरण निर्यात कर रहा है।रक्षा मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2013-14 में भारत का रक्षा निर्यात केवल 686 करोड़ रुपये था। आज यह बढ़कर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपये के ऐतिहासिक स्तर तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 62 प्रतिशत से अधिक वृद्धि दर्शाता है। भारतीय रक्षा उत्पाद अब 80 से अधिक देशों तक पहुंच रहे हैं और सरकार का लक्ष्य इसे और विस्तार देना है।ब्रह्मोस मिसाइल, आकाश वायु रक्षा प्रणाली, डोर्नियर विमान, हल्के टॉरपीडो, बुलेटप्रूफ जैकेट और गश्ती नौकाएं अब "मेड इन इंडिया" रक्षा क्षमता के प्रतीक बन चुके हैं।
रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा रक्षा उत्पादन
भारत का रक्षा उत्पादन भी अभूतपूर्व गति से बढ़ रहा है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में रक्षा उत्पादन 1.78 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। यह पांच वर्ष पहले की तुलना में दोगुने से अधिक वृद्धि को दर्शाता है।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वर्तमान गति बनी रही तो अगले कुछ वर्षों में भारत रक्षा विनिर्माण के क्षेत्र में दुनिया के प्रमुख देशों की श्रेणी में शामिल हो जाएगा।सरकार का लक्ष्य केवल हथियार खरीदना नहीं बल्कि उन्हें भारत में डिजाइन करना, विकसित करना और निर्मित करना है। इसी सोच ने "आत्मनिर्भर भारत" अभियान को रक्षा क्षेत्र का सबसे बड़ा परिवर्तनकारी कार्यक्रम बना दिया है।
निजी कंपनियां बनेंगी नई ताकत
रक्षा क्षेत्र में सबसे बड़ा बदलाव निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी है।एक समय रक्षा उत्पादन लगभग पूरी तरह सार्वजनिक उपक्रमों तक सीमित था, लेकिन अब लार्सन एंड टुब्रो, भारत फोर्ज, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, अदाणी डिफेंस और अनेक एमएसएमई कंपनियां रक्षा विनिर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। सरकार ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की सीमा को स्वचालित मार्ग से 74 प्रतिशत तक बढ़ाकर वैश्विक तकनीक और पूंजी को आकर्षित करने का रास्ता भी खोल दिया है। इससे भारत में संयुक्त उत्पादन और तकनीकी हस्तांतरण की प्रक्रिया तेज हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में रक्षा क्षेत्र में नवाचार का सबसे बड़ा स्रोत निजी उद्योग और स्टार्टअप्स होंगे।
युद्ध का नया चेहरा और भारत की तैयारी
भविष्य के युद्ध केवल टैंक और लड़ाकू विमानों से नहीं लड़े जाएंगे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्वांटम कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा, स्वायत्त ड्रोन और मानव रहित युद्ध प्रणाली भविष्य के संघर्षों का स्वरूप तय करेंगी।इसी कारण भारत अब रक्षा अनुसंधान और विकास पर पहले से कहीं अधिक निवेश कर रहा है। टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड और अन्य योजनाओं के माध्यम से स्वदेशी इंजन, ड्रोन, सेंसर, रोबोटिक सिस्टम और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक युद्ध तकनीकों के विकास को प्रोत्साहित किया जा रहा है।रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जिस देश के पास भविष्य की तकनीक होगी, वही भविष्य के युद्धों में बढ़त हासिल करेगा।
सरकार की रणनीति: आयात बंद, स्वदेशी उत्पादन शुरू
भारत ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी पॉजिटिव इंडिजेनाइजेशन लिस्ट के अंतर्गत सैकड़ों ऐसे रक्षा उपकरणों को सूचीबद्ध किया गया है जिनका आयात अब नहीं किया जाएगा और उन्हें भारत में ही निर्मित करना अनिवार्य होगा। सरकार ने हजारों कलपुर्जों, उप-प्रणालियों और प्लेटफॉर्मों के स्वदेशीकरण की प्रक्रिया भी शुरू की है।इसके अलावा रक्षा खरीद प्रक्रिया में भारतीय कंपनियों को प्राथमिकता देने की नीति ने घरेलू उद्योग को नई ऊर्जा प्रदान की है।
केवल सैन्य शक्ति नहीं, आर्थिक शक्ति भी
रक्षा उद्योग का विस्तार केवल राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय नहीं है। यह रोजगार, तकनीकी विकास, निर्यात आय और औद्योगिक वृद्धि का भी बड़ा स्रोत है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगले दशक में रक्षा उत्पादन से लाखों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होंगे। हजारों एमएसएमई कंपनियां इस आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा बनेंगी और भारत के विनिर्माण क्षेत्र को नई गति मिलेगी।
अगले दशक की तस्वीर
यदि वर्तमान योजनाएं सफल होती हैं तो 2030 का भारत आज के भारत से बिल्कुल अलग दिखाई देगा।भारत न केवल अपनी सेना के लिए अत्याधुनिक हथियारों का निर्माण करेगा, बल्कि एशिया, अफ्रीका, मध्य-पूर्व और लैटिन अमेरिका के अनेक देशों के लिए एक विश्वसनीय रक्षा साझेदार भी बनेगा। जिस देश को कभी दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक कहा जाता था, वही देश अगले दशक में वैश्विक रक्षा बाजार के सबसे प्रभावशाली निर्यातकों में शामिल हो सकता है।यह केवल रक्षा उत्पादन की कहानी नहीं है। यह उस भारत की कहानी है जो "मेक इन इंडिया" से आगे बढ़कर "मेक फॉर द वर्ल्ड" की दिशा में आत्मविश्वास के साथ कदम बढ़ा रहा है।
अगले 10 वर्षों में रक्षा क्षेत्र को बदल देंगी ये 10 तकनीकें
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि वर्ष 2035 तक युद्ध का स्वरूप पूरी तरह बदल जाएगा। सैनिकों की संख्या से अधिक महत्व तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वायत्त हथियार प्रणालियों का होगा। भारत भी इसी दिशा में तेजी से निवेश कर रहा है।
1. कृत्रिम बुद्धिमत्ता
भविष्य के युद्धक्षेत्र में AI सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। युद्धक्षेत्र की रियल टाइम निगरानी, दुश्मन की गतिविधियों का विश्लेषण, लक्ष्य की पहचान और स्वचालित निर्णय प्रणाली में AI का व्यापक उपयोग होगा।भारत की DRDO, BEL और निजी रक्षा कंपनियां पहले से ही AI आधारित कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम विकसित कर रही हैं।
2. स्वायत्त ड्रोन और ड्रोन स्वार्म
रूस-यूक्रेन युद्ध ने साबित कर दिया है कि लाखों डॉलर के टैंक को कुछ हजार डॉलर का ड्रोन नष्ट कर सकता है।आने वाले वर्षों में सैकड़ों ड्रोन एक साथ "स्वार्म" बनाकर दुश्मन के ठिकानों पर हमला करेंगे। भारत पहले ही "स्वार्म ड्रोन" तकनीक का सफल परीक्षण कर चुका है।
3. मानव रहित नौसैनिक युद्धपोत
भविष्य में समुद्र में बिना चालक दल वाले जहाज गश्त करेंगे।ये जहाज पनडुब्बियों का पता लगाने, समुद्री निगरानी और खुफिया जानकारी एकत्र करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। अमेरिका और चीन इस क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, जबकि भारत भी इस दिशा में कार्य कर रहा है।
4. हाइपरसोनिक मिसाइलें
ध्वनि की गति से पांच गुना अधिक गति से उड़ने वाली हाइपरसोनिक मिसाइलें अगले दशक की सबसे बड़ी सैन्य तकनीक मानी जा रही हैं।भारत और रूस संयुक्त रूप से ब्रह्मोस-2 जैसी हाइपरसोनिक तकनीक पर काम कर रहे हैं। ऐसी मिसाइलों को रोकना वर्तमान वायु रक्षा प्रणालियों के लिए बेहद कठिन होगा।
5. क्वांटम कंप्यूटिंग और क्वांटम कम्युनिकेशन
भविष्य में युद्ध केवल जमीन और समुद्र में नहीं बल्कि डेटा नेटवर्क पर भी लड़े जाएंगे।क्वांटम तकनीक सैन्य संचार को लगभग हैक-प्रूफ बना सकती है। भारत ने हाल के वर्षों में क्वांटम संचार के सफल परीक्षण किए हैं और इस क्षेत्र में निवेश बढ़ाया जा रहा है।
6. निर्देशित ऊर्जा हथियार
भविष्य में मिसाइलों और ड्रोन को मार गिराने के लिए महंगी मिसाइलों की जगह लेजर हथियारों का उपयोग बढ़ेगा।DRDO पहले ही कई लेजर आधारित रक्षा प्रणालियों का परीक्षण कर चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि 2035 तक लेजर हथियार सैन्य ठिकानों की सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाएंगे।
7. अगली पीढ़ी की पनडुब्बियां
भारतीय नौसेना वर्तमान में परमाणु पनडुब्बी कार्यक्रम को तेजी से आगे बढ़ा रही है।2035 तक भारत के पास अधिक आधुनिक SSBN और SSN श्रेणी की पनडुब्बियां हो सकती हैं, जो हिंद महासागर में उसकी रणनीतिक बढ़त को और मजबूत करेंगी।
8. अंतरिक्ष आधारित सैन्य प्रणाली
भविष्य के युद्धों में उपग्रह सबसे महत्वपूर्ण हथियार बन जाएंगे।निगरानी, मिसाइल चेतावनी, संचार और नेविगेशन के लिए सैन्य उपग्रहों का महत्व कई गुना बढ़ेगा। भारत का रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी इसी दिशा में कार्य कर रहा है।
9. रोबोटिक सैनिक और एक्सोस्केलेटन
आने वाले वर्षों में सैनिकों की क्षमता बढ़ाने के लिए रोबोटिक सहायता प्रणाली और एक्सोस्केलेटन सूट का उपयोग बढ़ेगा।ये तकनीक सैनिकों को अधिक भार उठाने, लंबी दूरी तय करने और कठिन परिस्थितियों में बेहतर प्रदर्शन करने में मदद करेगी।
10. स्वदेशी जेट इंजन और अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमान
भारत का AMCA कार्यक्रम अगले दशक का सबसे महत्वपूर्ण रक्षा प्रोजेक्ट माना जा रहा है।पांचवीं पीढ़ी के इस स्टील्थ लड़ाकू विमान के साथ भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो सकता है जिनके पास स्वदेशी स्टील्थ फाइटर तकनीक होगी।
आंकड़ों में भारत का रक्षा
आंकड़ों में भारत की बढ़ती सैन्य शक्ति
भारत का रक्षा बजट अब केवल सीमाओं की सुरक्षा का दस्तावेज नहीं रह गया है, बल्कि यह देश की तकनीकी, औद्योगिक और सामरिक महत्वाकांक्षाओं का रोडमैप बन चुका है।वित्त वर्ष 2026-27 के लिए केंद्र सरकार ने रक्षा मंत्रालय को 7.85 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए हैं, जो भारतीय इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा रक्षा बजट है। यह पिछले वर्ष के 6.81 लाख करोड़ रुपये की तुलना में लगभग 15 प्रतिशत अधिक है।इस बजट की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है सैन्य आधुनिकीकरण पर जोर। सरकार ने 2.19 लाख करोड़ रुपये का पूंजीगत व्यय निर्धारित किया है, जिसका उपयोग नए लड़ाकू विमान, पनडुब्बियां, युद्धपोत, मिसाइल प्रणालियां, ड्रोन और अगली पीढ़ी की सैन्य तकनीकों की खरीद एवं विकास में किया जाएगा।
रक्षा बजट में विशेष रूप से
63,733 करोड़ रुपये विमान एवं एयरो इंजन खरीद के लिए। 25,000 करोड़ रुपये से अधिक नौसेना के बेड़े के विस्तार और नए युद्धपोतों के लिए। DRDO के लिए 26,800 करोड़ रुपये से अधिक का प्रावधान, जिससे स्वदेशी अनुसंधान और नई सैन्य तकनीकों के विकास को गति मिलेगी।