21वीं सदी में क्यों जरूरी है बुद्ध का दर्शन

 संयुक्त राष्ट्र से युद्ध क्षेत्र तक: क्यों हार रही है कूटनीति और क्यों याद आ रहे हैं बुद्ध? 

डॉ रतन सूर्यवंशी

By : स्वदेश डेस्क
 संयुक्त राष्ट्र से युद्ध क्षेत्र तक: क्यों हार रही है कूटनीति और क्यों याद आ रहे हैं बुद्ध? 

आज की इक्कीसवीं सदी तकनीकी रूप से जितनी उन्नत है, मानवीय मूल्यों और शांति के धरातल पर उतनी ही खोखली नजर आती है। एक तरफ हम मंगल ग्रह पर बस्तियां बसाने का स्वप्न देख रहे हैं, तो दूसरी तरफ धरती पर युद्ध, घृणा, पर्यावरणीय विनाश और मानसिक अवसाद की आग में झुलस रहे हैं। रूस-यूक्रेन संघर्ष हो या मध्य-पूर्व का तनाव, जलवायु परिवर्तन की चेतावनी हो या समाज में बढ़ती कटुतावैश्विक स्तर पर छाई इस अनिश्चितता के बीच भगवान बुद्ध का दर्शन मात्र एक धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि अस्तित्व बचाने का एक अनिवार्य 'ब्लूप्रिंट' बनकर उभरता है।

हिंसा के विरुद्ध करुणा का शस्त्र

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में युद्ध सबसे बड़ी समस्या है। बुद्ध का मूल मंत्र था "न ही वेरेन वेरानि सम्मन्तीध कुदाचनं" अर्थात् शत्रुता से शत्रुता कभी शांत नहीं होती, वह केवल प्रेम और करुणा से ही शांत होती है। आज जब परमाणु हथियारों की होड़ लगी है, बुद्ध की अहिंसा (Non-violence) का सिद्धांत किसी कमजोरी का प्रतीक नहीं, बल्कि उच्चतम साहस का परिचायक है। यदि राष्ट्र 'विस्तारवाद' की जगह 'सह-अस्तित्व' को अपनाएं, तो खरबों डॉलर जो हथियारों पर खर्च हो रहे हैं, वे गरीबी और भुखमरी मिटाने में काम आ सकते हैं।

पर्यावरण संकट और अपरिग्रह

आज की सबसे बड़ी चुनौती 'क्लाइमेट चेंज' है। इसका मूल कारण मनुष्य का असीमित लालच है। बुद्ध ने 'मध्यम मार्ग' (Middle Path) की शिक्षा दी, जो भोग-विलास और अत्यधिक त्याग के बीच का संतुलन है। बौद्ध दर्शन सिखाता है कि प्रकृति के साथ हमारा संबंध 'दोहन' का नहीं, बल्कि 'कृतज्ञता' का होना चाहिए। बुद्ध का जीवन स्वयं वृक्षों के नीचे बीताजन्म लुम्बिनी के वन में, ज्ञान बोधगया के वृक्ष तले और महापरिनिर्वाण कुशीनगर के उपवन में। उनका दर्शन 'अपरिग्रह' और 'संतोष' पर आधारित है, जो आज के 'उपभोक्तावादी समाज' (Consumerist Society) के लिए एकमात्र उपचार है।

मानसिक महामारी और माइंडफुलनेस

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, अवसाद और मानसिक तनाव अगली वैश्विक महामारी है। भौतिक सुखों के अंबार के बावजूद इंसान भीतर से खाली है। बुद्ध ने सिखाया कि दुःख का मूल कारण 'तृष्णा' (अंधी इच्छाएं) है। बुद्ध की 'विपश्यना' और 'सम्यक स्मृति' (Mindfulness) की तकनीक आज पूरी दुनिया में कॉर्पोरेट घरानों से लेकर अस्पतालों तक अपनाई जा रही है। वर्तमान क्षण में जीना और आत्म-अवलोकन करना मनुष्य को बाहरी कोलाहल के बीच आंतरिक शांति प्रदान करता है।

सामाजिक न्याय और समता

आज भी दुनिया रंगभेद, जातिवाद और धार्मिक कट्टरता से जूझ रही है। बुद्ध ने 2500 साल पहले ही जन्म-आधारित श्रेष्ठता को नकार दिया था। उन्होंने 'संघ' की स्थापना कर एक ऐसे लोकतंत्र की नींव रखी जहाँ राजा और रंक, पुरुष और स्त्री, सबको समान अधिकार थे। उनका 'धम्म' सामाजिक समरसता का वह सेतु है, जिस पर चलकर एक समावेशी विश्व का निर्माण संभव है।

अष्टांगिक मार्ग: एक वैश्विक आचार संहिता

यदि संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं या वैश्विक नेता बुद्ध के 'अष्टांगिक मार्ग' (सम्यक दृष्टि, संकल्प, वचन, कर्म, आजीविका, प्रयास, स्मृति और समाधि) को अपनी नीतियों का आधार बनाएं, तो अधिकांश समस्याओं का समाधान स्वतः हो जाएगा। 'सम्यक आजीविका' का अर्थ है ऐसा व्यापार जिससे किसी जीव को हानि न हो। यदि आज का वैश्विक व्यापार इस सिद्धांत पर चले, तो नशीली दवाओं का व्यापार, मानव तस्करी और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर लगाम लग सकेगी।

निष्कर्ष

भगवान बुद्ध का दर्शन किसी एक देश या काल के लिए नहीं है; वह सार्वभौमिक और कालातीत (Timeless) है। वे हमें 'अप्प दीपो भव' (अपना दीपक स्वयं बनो) का संदेश देते हैं, जो मनुष्य को स्वयं की समस्याओं के लिए जिम्मेदार बनने और समाधान खोजने की प्रेरणा देता है। आज जब दुनिया कट्टरता और विनाश के मुहाने पर खड़ी है, तो बुद्ध का करुणा-भाव और मध्यम मार्ग ही वह 'शीतल छाया' है, जो मानवता को इस ताप से बचा सकती है।

अब समय आ गया है कि हम बुद्ध को केवल मंदिरों की मूर्तियों में न खोजें, बल्कि उनके विचारों को अपनी संसद, अपनी अर्थव्यवस्था और अपने आचरण में उतारें। विश्व शांति का मार्ग युद्ध की विभीषिका से नहीं, बल्कि बुद्ध की मुस्कुराती हुई उस शांतिपूर्ण मुद्रा से होकर गुजरता है।

डॉ रतन सूर्यवंशी  

निदेशक, प्रभारी वित्त नियंत्रक

मध्य प्रदेश भोज (मुक्त) विश्वविद्यालय,भोपाल

 

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