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बागी सिपाहियों को सबक सिखाने के मूड में कांग्रेस

असम, केरल और पश्चिम बंगाल चुनावों में कांग्रेस की रणनीति, अंदरूनी विरोधाभास और भाजपा के खिलाफ राजनीतिक समीकरणों का विश्लेषण।

By : स्वदेश डेस्क
बागी सिपाहियों को सबक सिखाने के मूड में कांग्रेस

उमेश चतुर्वेदी

पांच राज्यों के विधानसभा पा चुनावों की तारीख जैसे जैसे नजदीक आती जा रही है, चुनावी घमासान बढ़ता जा रहा है। देश की सबसे पुरानी पार्टी का दांव चूंकि दो राज्यों में ही सबसे ज्यादा है, इसलिए उसका सारा ध्यान इन्हीं दो राज्यों पर है। असम और केरल के विधानसभा चुनावों में कलीस की स्थिति अलग-अलग है। इसलिए दोनों ही राज्यों में उसकी चुनौतियां अलग हैं. इसलिए उसकी लड़ाई के रूप और तरीके अलग-अलग हैं। हरियाली और समुद्री किनारे के चलते केरल को खूबसूरत राज्यों में शुमार किया जाता है। इस खूबसूरती की ही बजह से केरल को 'भगवान का देश कहा जाता है। बारह साल से केंद्रीय सत्ता से दूर कांग्रेस को उम्मीद भगवान के इसी देश से ही ज्यादा है। पिछले लोकसभा चुनावों में जिस तरह इस राज्य से उसे समर्थन मिला था, उसकी वजह से उसकी उम्मीदों का परवान चढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन यहां उसकी चुनौती भगवान को न मानने वाली विचारधारा से है। 

केरल की सत्ता पर काबिज जिस वाममोर्चा से विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का मुकाबला है, राष्ट्रीय स्तर पर मोदी के खिलाफ बने विपक्षी मोर्चे में कांग्रेस उसी वाममोर्चे के साथ है। स्थानीय स्तर पर विरोध और राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग का विरोधाभास अगर सर्वाधिक शिक्षित राज्य में भारी पड़ सकता है। हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में राजधानी तिरूअनंतपुरम् में जीत हासिल कर चुकी भाजपा इस विरोधाभास को खूब उछाल रही है। वैसे तो भाजपा का दावा है कि इस बार भगवान के देश में भगवा ध्वज फहरने जा रहा है, हालांकि अब तक चुनावी अभियान से साफ है कि भाजपा को वैसी सफलता मिलती नजर नहीं आ रही। लेकिन भाजपा का मौजूदा जीन आखिरी दम तक हार नहीं मानने का है। इसलिए पार्टी की कोशिश सीपीएम की अगुआई वाले वाममोर्चे और कांग्रेस की अगुआई वाले संयुक्त मोर्चे के विरोधाभास को उजागर करने पर है। 

पार्टी को लगता है कि देश के इस सर्वाधिक साक्षर राज्य में अगर जनता ने इस विरोधाभास को समझ लिया तो राज्य के चुनावी नतीजे 2017 के उत्तरप्रदेश के परिणामों की तरह आश्चर्यजनक रूप से अपने पक्ष में किए जा सकते है। 2017 में किसने सोचा था कि भारतीय जनता पार्टी प्रचंड बहुमत हासिल करेगी। इसी कोशिश के तहत अमित शाह केरल की करीब 19 प्रतिशत जनसंख्या वाले ईसाई समुदाय से लगातार संपर्क कर रहे हैं। साल 2011 की जनगणना के अनुसार, केरल के कुल 3.34 करोड़ निवासियों में से लगभग 61.41 लाख ईसाई हैं, जो मुख्य रूप से मध्य केरल में केंद्रित हैं। पारंपरिक रूप से केरल में यह समुदाय कांग्रेस का सहयोग करता रहा है, लेकिन भाजपा की कोशिश इस समुदाय को कांग्रेस से तोड़ने की रही है। हालिया अतीत के कुछ चुनावों में यह समुदाय भाजपा के साथ खड़ा होता नजर आया है। इसकी वजह यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित लवजिहाद का शिकार केरल में यह समुदाय भी होता रहा है।

 इससे स्थानीय स्तर पर इस समुदाय में भी कुछ वैसा ही गुस्सा है, जैसा उत्तर भारत में हिंदू समाज में ऐसा नजर आता है। कांग्रेस का संकट है कि वह वाममोर्चा का विरोध और समर्थन की उलटबांसी की सटीक काट नहीं खोज पा रही है। इस वजह से राज्य का चुनावी मुकाबला लगातार दिलचस्प होता जा रहा है। वैसे भाजपा जिस तरह की कोशिश करती नजर आ रही है, उससे सबसे ज्यादा संकट में कांग्रेस की संभावनाएं ही नजर आ रही है। ऐसा लगता है कि भाजपा की रणनीति कांग्रेस को इस राज्य की सत्ता से दूर रखने की ही है। पूर्वोत्तर भारत के प्रमुख राज्य असम की जहां तक बात है, तो वहां मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस में ही है। कांग्रेस की चिढ़ यह है कि बीजेपी जिस हिमंत विस्वसरमा के चेहरे पर चुनावी मैदान में है, वह कभी कांग्रेस का ही चेहरा होते थे। कांग्रेस अपने इस पूर्व नेता को इस बार हर हाल में सबक सिखाने के मूड में नजर आ रही है। 

जिस तरह उनकी पत्नी रिकी भुइयां सरमा के पास तीन-तीन पासपोर्ट हैं। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा का आरोप है कि रिन्को भुइयां सरमा के पास संयुक्त कॉन्फ्रेंस में ही लगता दिखा, जब राष्ट्रीय अरब अमीरता, एंटीगुआ और बारबुडा एवं मिस्र का पासपोर्ट है। कांग्रेस ने इसके समर्थन के कुछ दस्तावेजों की कॉपी भी दिखाई है। हलांकि हिमंत विस्वसरमा का कहना है कि कांग्रेस हताशा में है और उनकी ओर से कांग्रेस के नेताओं पर मानहानि का केस दायर करने की भी बात कही जा रही है। कीस एक तरह से अपने इस पुराने सिपाही को भ्रष्टतम साबित करने की कोशिश में है। कांग्रेस का यह भी आरोप है कि हिमंत के पास अमेरिका में भी कंपनी है, जिसमें बावन हजार करोड़ रुपए जमा हैं। कांग्रेस का यह आरोप राहुल गांधी के आरोपों का विस्तार ही लगता है। राहुल गांधी ने कुछ दिन पहले उन्होंने अपने पुराने सहयोगों को देश का सबसे भ्रष्ट मुख्यमंत्री बताया था। राहुल गांधी उन्हें सत्ता में वापसी के बाद जेल भेजने की बात कहते रहे हैं। कांग्रेस की इन आरोपों के जरिए कोशिश सिर्फ हिमंत को ही सवालों के घेरे में रखना नहीं है, बल्कि भाजपा को भी भ्रष्टाचार बताने की भी है। जैसे हिमंत भी राहुल गांधी की आलोचना करते रहे हैं।

अपने कांग्रेस छोड़ने की वजह से राहुल गांधी को ही बताते रहे हैं। दोनों के रिश्तों के संदर्भ में मौजूदा आरोपों को देखें तो यह निजी खुन्नस का भी मामला लगता है। हिमंत इन आरोपों को निजी खुन्नस बताने और असम के लोगों को समझाने की कोशिश में लगे हैं। अगर वे इसमें कामयाब रहे तो असम में कांग्रेस की चुनावी संभावना दूर होगी। अगर ऐसा हुआ तो फिर कांग्रेस के लिए उत्तर पूर्व में अपनी मौजूदगी बनाए रखना दूर को कौड़ी हो जाएगा। इसका कारण यह है कि हिमंत पूर्वोत्तर भारत में भाजपा का चेहरा और संकट मोचक बन चुके हैं। अगर कांग्रेस की कोशिशें कामचाच रहीं तो पूर्वोत्तर में भाजपा की राह कठिन हो जाएगी। हिमंत की हार उसकी चुनाली संभावनाओं पर बड़ा प्रश्नचिन्ह बनकर उभरेगी। असम पर काबू पाने के लिए कांग्रेस ने अपने हरावल दस्ते के हर हथियार मैदान में उतार दिए हैं। काग्रेस की कोशिशों को पलीता उसकी प्रेस मीडिया के एक पत्रकार ने उस कंपनी की वेबसाइट खोलकर उसकी स्थापना के तथ्य काग्रेस प्रवक्ता के सामने पेश करने शुरू कर दिए, जो काग्रेस के दावे के ठीक उलट नजर आ रहे थे। इसका माकूल और संतोषजनक जवाब कसीस प्रवक्ता नहीं दे पाए।

असम से सटे पश्चिम बंगाल में भी विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। वहां तो बाह लड़ती भी नहीं दिख रही। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी कभी कांग्रेस की सिपाही रहीं। केरान की तरह पश्चिम बंगाल में भी कांग्रेस विरोधाभास से जूझ रही है। राष्ट्रीय स्तर पर वह ममता के साथ है, लेकिन राज्य में उसकी पूरी कोशिश ममता को हिमंत की तरह सबक सिखाने की ही लग रही है। दरअसल राज्य में कांग्रेस का एक भी विधायक नाई है। हालांकि 2023 में मुस्लिम बहुत मुर्शिदाबाद जिले की सगरदीधी सीट के उपचुनाव में कांग्रेस तृणमूल कांग्रेस को हराकर विधानसभा में अपना खाता खोलने में सफल रही थी। मुस्लिम बहुल विध्छनसभा में कांग्रेस की जीत से ममता की नोंद उड़ गई थी। राज्य के करीब पैंतीस फीसदी मुस्लिम ओट बैंक में सेंध का डर उन्हें सताने लगा। इसके लिए उन्होंने ऑपरेशन सगस्तीची शुरू किया और यहां से जीते कांग्रेसौ विधायक बाबरन विश्वास को तृणमूल कांग्रेस में शामिल करा दिया। कांग्रेस ने इसे विश्वासघात माना और लगता ऐसा है कि वह ममता को इन चुनावों में सबक सिखाने की कोशिश कर रही है। वैसे पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान राज्य की प्यारह मुस्लिम बहुल विधानसभा सीटों पर उसके प्रत्याशी पहले नंबर पर रहे थे। इसलिए कांग्रेस यह मानकर चल रही है कि विधानसभा चुनावों में उसे मुस्लिम वोटरों का साथ मिल सकता है। उसकी पूरी रणनीति इसी लिहाज से आगे बढ़ रही है। साफ है कि इस बार के चुनावों में काग्रेस जहां अपने पुराने सिपाहियों को सिरखाने की कोशिश में है, वहीं खुद की संभावनाएं बेहतर करने का भी प्रयास कर रही है।

 

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