Consumer Courts Crisis in India 2026

उपभोक्ता अदालतें प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार

देशभर की उपभोक्ता अदालतें रिक्त पदों, संसाधनों की कमी और प्रशासनिक उपेक्षा से जूझ रही हैं। उपभोक्ताओं को समय पर न्याय नहीं मिल पा रहा।

By : स्वदेश डेस्क
उपभोक्ता अदालतें प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार

दिनेश चंद सागर

भारतीय लोकतंत्र में ‘उपभोक्ता’ को बाजार का राजा कहा जाता है, किंतु वास्तविकता यह है कि वह अक्सर व्यवस्था के चक्रव्यूह में फंसा हुआ एक विवश पात्र बनकर रह जाता है। जब भारत की संसद ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 को पारित किया, तो इसका मूल उद्देश्य पुराने 1986 के अधिनियम की कमियों को दूर करना और डिजिटल युग की चुनौतियों के बीच उपभोक्ता को ‘अभिमन्यु’ बनने से बचाना था।

‘त्वरित न्याय, सुलभ न्याय और सस्ता न्याय’ इन तीन स्तंभों पर त्रि-स्तरीय अर्ध-न्यायिक व्यवस्था (जिला, राज्य और राष्ट्रीय आयोग) की परिकल्पना की गई थी। मंशा यह थी कि आम आदमी को दीवानी अदालतों की लंबी और थकाऊ प्रक्रिया से बचाकर एक ऐसा मंच दिया जाए, जहां उसकी बात सुनी जाए और निश्चित समय सीमा में निर्णय हो।लेकिन आज, 2026 के धरातल पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। न्याय की यह मशीनरी स्वयं प्रशासनिक उपेक्षा, बजटीय सीमाओं और रिक्तियों के एक अंतहीन ‘जाम’ से कराह रही है। वर्तमान में उपभोक्ता अदालतें स्वयं न्याय की गुहार लगाती प्रतीत हो रही हैं।

1. रिक्तियों का ‘अंध महासागर’ : व्यवस्था के तीनों स्तरों का विच्छेदन

अदालतों में पदों का रिक्त होना केवल एक प्रशासनिक सांख्यिकी नहीं है, बल्कि यह न्याय की उस धारा को रोकने जैसा है, जो समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचनी चाहिए। वर्तमान वैधानिक स्थिति का सूक्ष्म विश्लेषण करने पर एक भयावह तस्वीर उभरती है :

(क) राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) : एक स्थिर किंतु सीमित टापू

राष्ट्रीय स्तर पर स्थिति फिर भी तुलनात्मक रूप से संतोषजनक और स्थिर कही जा सकती है। यहां न्यायिक सदस्यों की संख्या पर्याप्त है, जिससे सुनवाई की निरंतरता बनी हुई है। हालांकि, यहां भी चुनौतियां न्यायिक पदों की नहीं, बल्कि प्रशासनिक और प्रतिनियुक्ति वाले पदों की हैं।तकनीकी कर्मचारियों और सहायक स्टाफ की कमी के कारण राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग की गति वह नहीं हो पा रही है, जो एक शीर्ष न्यायिक अभिकरण की होनी चाहिए। नीतिगत स्तर पर यहां से दिशा-निर्देश तो जारी होते हैं, किंतु उनका क्रियान्वयन निचले स्तरों पर लचर व्यवस्था व पद रिक्तियों के कारण दम तोड़ देता है।

(ख) राज्य उपभोक्ता आयोग (एससीडीआरसी) : नेतृत्वविहीन सेना का संकट

असली संकट की शुरुआत राज्य स्तर से होती है, जो जिला आयोगों और राष्ट्रीय आयोग के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी है। आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि :नेतृत्व का अभाव : देश के लगभग 50% राज्यों में स्थायी अध्यक्षों के पद रिक्त पड़े हैं। जब किसी आयोग का सेनापति (अध्यक्ष) ही नहीं होगा, तो वहां नीतिगत निर्णय, प्रशासनिक अनुशासन और अपीलीय प्रक्रियाओं का पटरी से उतरना स्वाभाविक है।सदस्यों की भारी कमी : राज्य स्तर पर स्वीकृत पदों में से लगभग 40% से 60% पद खाली हैं। परिणाम यह है कि कम समय में निपटने वाली अपीलें वर्षों तक लंबित रहती हैं, जिससे जिला आयोगों द्वारा दिए गए निर्णयों का लाभ उपभोक्ता को समय पर नहीं मिल पाता।यहां यह कहना उचित होगा कि “देर से मिला न्याय भी अन्याय के बराबर ही होता है।”

(ग) जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (डीसीडीआरसी) : सबसे कमजोर और पीड़ित कड़ी

जमीनी स्तर पर न्याय का ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है। जिला आयोग वह स्थान है, जहां उपभोक्ता सबसे पहले अपनी पीड़ा लेकर पहुंचता है। अध्यक्षों की कमी : देश के लगभग 33% जिलों में स्थायी अध्यक्ष नहीं हैं। विडंबना की पराकाष्ठा यह है कि एक-एक अध्यक्ष पर 4 से 5 आयोगों का अतिरिक्त प्रभार है।व्यावहारिक कठिनाई यह भी है कि एक व्यक्ति के लिए पांच अलग-अलग जिलों की फाइलों का अध्ययन करना, वहां की यात्रा करना और प्रभावी सुनवाई करना शारीरिक और मानसिक रूप से लगभग असंभव है।इस ‘अतिरिक्त प्रभार’ की संस्कृति ने न्याय की गुणवत्ता को ‘नगण्य’ कर दिया है। यहां अध्यक्ष और सदस्य केवल ‘हाजिरी’ लगाने तक सीमित रह गए हैं, न्याय करने तक नहीं।इसे व्यवस्थित करने का दायित्व राज्य सरकारों का है, पर आम आदमी से जुड़ी इस समस्या और संस्था की ओर किसी का ध्यान नहीं है। यह उपभोक्ता का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है।

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