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संघ कार्य के 100 वर्ष :एक नाम नहीं, चेतना की ज्योति थे दद्दा

दद्दा शंकरलाल शर्मा का जीवन संघ कार्य, त्याग और प्रेरणा का अद्भुत उदाहरण रहा। भोपाल से शुरू हुई उनकी यात्रा ने हजारों कार्यकर्ताओं को नई दिशा दी।

By : स्वदेश डेस्क
संघ कार्य के 100 वर्ष :एक नाम नहीं, चेतना की ज्योति थे दद्दा

भोपाल के पुराने चौक मोहल्ले की संकरी गलियों में, तब्बा मियाँ के महल से सटे एक छोटे से घर में 14 जनवरी 1920 को एक बालक ने जन्म लिया। घर में हर्षोल्लास था, लोग बधाइयां दे रहे थे पर वह नवजात रो रहा था। शायद वह रोदन भविष्य के संघर्षों की पूर्वपीठिका था। यही बालक आगे चलकर दद्दा श्री शंकरलाल शर्मा के नाम से जाना गया, जिसने अपने जीवन को राष्ट्र और समाज की साधना में तपाकर एक कालजयी उदाहरण प्रस्तुत किया। दद्दा का जीवन अभावों की धूप में तपकर बना था, पर उनमें भावों की ऐसी समृद्धि थी कि वे हर हृदय में ऊर्जा का संचार कर देते थे। वे स्वाभिमानी थे, पर अहंकार से दूर फक्कड़ थे, पर कर्म में अनुशासित; मस्तमौला थे, पर लक्ष्य के प्रति अडिग। उनके अट्टहास में आत्मविश्वास की गूंज थी, और उनकी वाणी में प्रेरणा का संगीत। दद्दा भोपाल के कमली मंदिर में संघ की पहले शाखा लगाने वालों में भी शामिल थे।

नबाबी शासन के समय सीहोर का वातावरण भय और आतंक से भरा था। एक क्रूर पुलिस अधिकारी के अत्याचारों से हिन्दू समाज सहमा रहता था। ऐसे समय में बड़ियाखेड़ी के श्री हनुमान मंदिर में संघ का एकत्रीकरण चल रहा था। सूचना पाकर वह अधिकारी अपने दल-बल के साथ वहां पहुँचा मंशा स्पष्ट थी, दहशत फैलाने की।किन्तु उस दिन इतिहास ने करवट ली। दद्दा के साथ उपस्थित बाबूलाल बंसल ने बिजली-सी फुर्ती से उस अधिकारी को जीप से खींच लिया और उसकी धुनाई कर दी। वह दृश्य केवल एक व्यक्ति की पिटाई नहीं, बल्कि भय के पतन और साहस के उदय का प्रतीक था। इस घटना ने सीहोर में संघ की धाक जमा दी और हिन्दू समाज में नई चेतना का संचार हुआ। इसी प्रकार, जब जामा मस्जिद के आसपास बने जैन मंदिरों को अपवित्र करने का प्रयास हुआ, तब भी दद्दा और उनके साथियों ने उसे विफल कर दिया। ये घटनाएँ केवल प्रतिरोध नहीं थीं ये आत्मसम्मान की पुनर्स्थापना के क्षण थे, जिन्होंने भोपाल और सीहोर में शाखाओं के विस्तार को नई गति दी।

एक तांगे से शुरू हुई प्रचारक यात्रा श्री नारायण प्रसाद गुप्ता स्मरण करते हैं 1945 में वे मिडिल स्कूल पास कर चुके थे और शाखा के अनियमित स्वयंसेवक थे। शंकरलाल जी का स्नेह इतना आत्मीय था कि वे स्वयं घर आकर उन्हें शाखा आने के लिए प्रेरित करते। एक दिन अचानक दद्दा तांगा लेकर आए। बिना औपचारिकता के उनका सामान समेटा और कार्यालय ले गए। वही क्षण था, जब एक साधारण छात्र की जीवनधारा बदल गई वहीं से उसकी प्रचारक यात्रा प्रारंभ हुई। दद्दा केवल प्रेरणा नहीं देते थे, वे जीवन की दिशा ही बदल देते थे।

संकल्प से होती है सिद्धि: पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर ने दद्दा के बारे में कहा था कि 'हमारे भौतिक साधन हमारी कार्यक्षमता को बढ़ाते हैं, पर जब साधन न हों, तब भी कोई व्यक्ति इतना कर जाए, यह विश्वास करना कठिन होता है।' यह कथन दद्दा के जीवन का सटीक चित्रण है। 'क्रिया भवति सत्वेन, नोपकरणे' -दद्दा इस सिद्धांत के साक्षात उदाहरण थे। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि साधनों की कमी कभी भी संकल्प की शक्ति को रोक नहीं सकती।

गुरुजी के समक्ष संगठन की परीक्षाः एक बार गुरुजी के भोपाल आगमन पर हिन्दू राष्ट्र सेना के कार्यकर्ताओं ने सुझाव दिया कि एक ही उद्देश्य के लिए दो संगठन उचित नहीं अतः संघ की शाखा बंद कर दी जाए। गुरुजी ने शांत स्वर में उत्तर दिया मैं शाखा बंद करने को तैयार है, पर पहले आप आजीवन कार्य करने वाला एक प्रचारक दें और यह आश्वासन भी कि आपका कार्य कभी बंद नहीं होगा। यह उत्तर केवल तर्क नहीं था, बल्कि संगठन की स्थायित्व और समर्पण की कसौटी था। हिन्दू राष्ट्र सेना इस कसौटी पर खरी नहीं उतर सकी। यह प्रसंग दद्दा और उनके साथियों के समर्पण की गहराई को उजागर करता है।

एक जीवन, जो स्वयं एक युग बन गया

2 नवंबर 1998 का दिन जब दद्दा इस संसार से विदा ले रहे थे। उस दिन लोग रो रहे थे और वे मौन थे। जन्म के समय वे रो रहे थे और संसार हँस रहा था: विदाई के समय संसार रो रहा था और वे शांत थे। जीवन का यह पूर्ण चक्र उनके तप, त्याग और साधना का साक्षी था। 78 वर्षों के जीवन में से यदि प्रारंभिक 20 वर्ष भी हटा दें, तो भी 58 वर्षों तक उन्होंने तन, मन और वचन से समाज की सेवा की। उन्होंने अभावों में भी भाव जगाए, निराशा में भी आशा की किरण जगाई।

तप, त्याग और प्रेरणा की धारा

दद्दा के संपर्क में आए अनेक कार्यकर्ताओं ने अपने जीवन को नई दिशा दी। जुगल किशोर भार्गव, नर्मदा प्रसाद किंकर जैसे अनेक नाम हैं, जिन्होंने दद्दा के सान्निध्य में संघ कार्य को जीवन का ध्येय बना लिया। नर्मदा प्रसाद किंकर का संस्मरण विशेष रूप से हृदयस्पर्शी है -उन्होंने अहमदाबाद में संघ शिक्षा वर्ग करने के लिए 25 दिन तक कुलीगिरी कर धन जुटाया। यह त्याग केवल व्यक्तिगत नहीं था, यह दद्दा के प्रभाव का प्रमाण था, जिसने साधारण व्यक्तियों को असाधारण बना दिया।




 

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