दिग्विजय सिंह की 'अ' राजनीतिक यात्रा

दिग्विजय सिंह की 'अ' राजनीतिक यात्रा के निहितार्थ

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने एक बार फिर 'अ' राजनीतिक यात्रा पर निकलने की घोषणा की है। इसके राजनीतिक और व्यक्तिगत परिणाम क्या होंगे, यह समय बताएगा।

By : नरेंद्र कुमार
दिग्विजय सिंह की 'अ' राजनीतिक यात्रा के निहितार्थ

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह एक बार फिर 'अ' राजनीतिक यात्रा पर निकलने की घोषणा कर चुके हैं। 79 वर्षीय दिग्विजय सिंह दो बार नर्मदा परिक्रमा कर चुके हैं। अपनी नर्मदा परिक्रमा को, जिसे वह तब भी 'अ' राजनीतिक ही कहते थे, उन्होंने हाल ही में एक पॉडकास्ट में दावा किया था कि उनकी नर्मदा परिक्रमा से कांग्रेस को लाभ मिला। उज्जैन में शिप्रा से अयोध्या की सरयू तक की लगभग 1000 किलोमीटर की पदयात्रा से वह क्या हासिल करेंगे, यह भविष्य बताएगा। पर श्री सिंह कांग्रेस हाईकमान की कमान में नहीं हैं। उनकी राह और मंजिल, दोनों अलग हैं, यह तय है।

यह लिखने की भी अब खास आवश्यकता नहीं कि श्री सिंह कांग्रेस में स्वयं की प्रासंगिकता की लड़ाई, विशेषकर मध्य प्रदेश में, वर्ष 2003 से ही लड़ रहे हैं। कांग्रेस की हार के बाद दस साल चुनाव न लड़ने की घोषणा कर वह दिल्ली में सक्रिय हुए। पहले श्रीमती सोनिया गांधी और बाद में राहुल गांधी ने महासचिव के नाते तथा राज्यसभा में भेजकर उन्हें भरपूर न केवल सम्मान दिया, बल्कि विश्वास भी किया। अघोषित तौर पर वह राहुल गांधी के गुरु भी रहे। परिणामस्वरूप, आज कांग्रेस कहाँ है और स्वयं राहुल गांधी भी कहाँ हैं, यह सर्वविदित है।

बेशक, 2018 में कांग्रेस की सरकार बनी, पर यह भी सच है कि यह सरकार गिरी भी श्री सिंह के अहम के चलते ही। यह बात स्वदेश नहीं कह रहा, बल्कि यह बात पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कही थी। अब, जब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के नेतृत्व में भाजपा सरकार को घेरने की तैयारी हो रही है, श्री सिंह की अलग राह उनकी भविष्य की दिशा और दशा दोनों बता रही है। यह बात सच है कि स्वयं पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार प्रदेश में कांग्रेस को न एकजुट रख पाए, न ही सशक्त विपक्ष का चेहरा बना पाए।राज्यसभा में मीनाक्षी नटराजन के नामांकन निरस्त होने के मामले में कांग्रेस भाजपा पर आरोप लगाकर बच नहीं सकती। कारण यह है कि चुनावी नामांकन में पूर्ण जानकारी नहीं थी, यह एक तथ्य है।

उल्लेखनीय है कि दिग्विजय सिंह और जीतू पटवारी के बीच 36 के आंकड़े जैसा संबंध है। कांग्रेस सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके, दो बार के विधायक और दिग्विजय सिंह के बेटे जयवर्धन सिंह को उनके गृह जिले का अध्यक्ष बनाकर पटवारी, श्री सिंह की राजनीतिक हद नापने की पहले ही कोशिश कर चुके हैं। श्री सिंह प्रदेश में अपना उत्तराधिकारी अपने बेटे को बनाकर एक बड़ी भूमिका में देखना चाहते हैं। कमलनाथ के बेटे नकुल नाथ स्थापित हो नहीं पाए। प्रथम पंक्ति के अन्य नेता भी अब ढलान पर हैं। इसलिए श्री सिंह पार्टी में इस शून्य को अपने बेटे से ही भरना चाहते हैं। उनकी अपनी इच्छा भी राज्यसभा जाने की थी, लेकिन उस पर भी कांग्रेस नेतृत्व ने पानी फेर दिया।

वीर भारत न्यास के विषय पर अलग-थलग पड़े दिग्विजय सिंह को, जीतू पटवारी की शिकायत पर, संयुक्त पत्रकार वार्ता कर उन्हें अपना बेटा कहना यह दर्शाता है कि नेतृत्व उन्हें लेकर सख्त है। श्री सिंह की पदयात्रा उसी पीड़ा की उपज है। इस यात्रा में श्री सिंह एक बार फिर हिंदुत्व, भाजपा और संघ पर आक्रामक होंगे और उसका लाभ फिर भाजपा को मिलना तय है। कारण, भारत की चेतना अब मिथ्या प्रचार सहन नहीं करती।राम मंदिर के कथित दान चोरी के प्रकरण पर दिग्विजय सिंह का प्रलाप सभी की समझ में आ रहा है। शिप्रा का पवित्र जल श्री सिंह की राजनीतिक मंशा को समझता है और सरयू अपने लाल रंग को भूली नहीं है। वह यह भी जानती है कि उसकी यह पीड़ादायक दशा जिन मुलायमों ने की थी, वह दिग्विजय सिंह जिस घृणा की राजनीति कर रहे हैं, उसी का एक और अंग ही है।

इसलिए, जब प्रदेश कांग्रेस मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार के खिलाफ जन आंदोलन की तैयारी में है, श्री सिंह ठीक उसी समय एक 'अ' राजनीतिक यात्रा पर क्यों हैं, इसका ठीक-ठीक उत्तर वही दे सकते हैं।

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