दिल्ली में हुआ छात्र आंदोलन हाल-फिलहाल समाप्त हो गया लगता है। लेकिन आंदोलनकारियों के स्वर बता रहे हैं कि किसी न किसी बहाने फिर हंगामा खड़ा किया जाएगा। संसद का सत्र चल रहा है। केंद्र सरकार की प्राथमिकताएँ कुछ और हैं। इसलिए वह आंदोलन से पीछा छुड़ाना चाहती थी। आंदोलनकारियों की उचित तथा अनुचित मांगें पूरी कर आंदोलन को समाप्त करवा दिया। विदेशी हस्तक्षेप तथा विदेशों में देश की बिगड़ने वाली छवि भी सरकार की चिंता का विषय थी। सरकार द्वारा मांगें माने जाने के बाद छात्र आंदोलन के नेतृत्व के सामने आंदोलन जारी रखने का कारण नहीं बचा था। इस कारण आंदोलन की समाप्ति को तात्कालिक राहत माना जाना चाहिए।
इस आंदोलन से समाजशास्त्रीय अध्येताओं के माथे पर चिंता की रेखाएँ उभरी होंगी। यदि वे चिंतित नहीं हैं तो उन्हें चिंतन व चिंता करना ही चाहिए। आंदोलन में छात्रों की जो भाषा थी, वह किसी भी दृष्टिकोण से सभ्य समाज की भाषा नहीं थी। पढ़ने वाले छात्रों की तो कतई नहीं थी। युवा पीढ़ी की तो कतई नहीं होनी चाहिए। छात्रों के मुख में संदर्भहीन, अर्वाच्य अपशब्द थे। इतना ही नहीं, अपने देश ने लड़कियों के मुँह से ऐसी भद्दी शब्दावली कभी सुनी नहीं थी। स्त्री मुक्ति व स्त्री स्वतंत्रता का यह परिणाम है तो हम किस दिशा में जा रहे हैं, इसकी चिंता करनी ही पड़ेगी।
आंदोलनकारियों की भाषा में छोटे-बड़े का अंतर नहीं था। आयु- मर्यादा का भेद नहीं था। किसी पद, प्रतिष्ठा और गरिमा का ध्यान नहीं था। देश के सम्मान का विचार नहीं था। यह कहना भी अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि जानबूझकर ऐसा किया गया। ऐसा करने क्यों दिया गया? किसी ने रोकने का प्रयास नहीं किया। आंदोलन का अर्थ यह नहीं है कि आप किसी का भी अपमान करें।
जिनके लिए इस प्रकार की भाषा का प्रयोग किया गया, वे अपने त्याग, सेवा, समर्पण और परिश्रम के कारण उन पदों पर पहुँचे हैं। उन्होंने अपना जीवन देश के लिए खपाया है। अनेक बार अपार जनसमर्थन प्राप्त कर निर्वाचित हुए हैं। जिन संवैधानिक अधिकारों की बात आंदोलनकारी कर रहे थे और जिस लोकतंत्र के कारण उन्हें आंदोलन करने की सुविधा मिली थी, वह लोकतंत्र इन राजनेताओं के कारण ही देश में सुरक्षित रहा है। उनके लिए इस प्रकार की भाषा के प्रयोग की केवल निंदा करने से काम नहीं चलेगा।
ऐसी भाषा का प्रयोग केवल सम्मानित लोगों के प्रति ही नहीं, बल्कि सभ्य समाज में किसी के प्रति भी नहीं होना चाहिए। आंदोलन में ऐसा होता है अथवा क्षमा मांग लेना पर्याप्त नहीं है। इसे असहनीय माना जाना चाहिए। कई आंदोलनकारियों के साथ उनके पालक भी आंदोलन स्थल पर उपस्थित थे। छात्रों के साथ अन्याय हुआ है। छात्रों का परिश्रम व्यर्थ गया है। पालकों की आशाओं पर तुषारापात हुआ है। पालकों का अपने बच्चों के लिए चिंतित होना स्वाभाविक है। हताश पालक अपने बच्चों के साथ आंदोलन का समर्थन करने आए थे, यह उनकी जागरूकता का प्रतीक है। उन पालकों की प्रशंसा करनी चाहिए। इसमें दो मत नहीं हो सकता, लेकिन पालकों की उपस्थिति में उनके बच्चे गाली-गलौज तथा असभ्य भाषा का प्रयोग और ऐसी हरकतें कर रहे थे। यह चिंता की बात है और पालकों के पालकत्व पर प्रश्नचिह्न भी।
विरोध प्रदर्शन के लिए व्यंग्य-चित्र बनाना आम बात है। किसी को विशेष आपत्ति भी नहीं होती। लेकिन इस आंदोलन में व्यंग्य-चित्र नहीं थे। चरित्रहनन करने वाले प्रदर्शन-चित्र प्रदर्शित किए जा रहे थे। जब पुलिस ने कैमरायुक्त वाहनों का उपयोग किया तो आंदोलनकारियों ने आपत्ति की कि यह उनकी निजता पर हमला है। मगर जब आप स्वयं दूसरे का चरित्रहनन असभ्य ढंग से कर रहे थे, तब दूसरे की निजता का क्या?
इस बात की चिंता भी करनी होगी कि आंदोलनकारी युवाओं के लगभग सारे पोस्टर स्त्री-पुरुष शरीर संबंधों पर आधारित थे। ऐसा करने वाली छात्राएँ वहीं थीं, जिनके फूहड़ एवं अंग-प्रदर्शनकारी वस्त्रों पर आपत्ति किए जाने पर वे कहती हैं कि अश्लीलता देखने वालों की दृष्टि में है। लेकिन उनके द्वारा दिखाए जा रहे अधिकांश पोस्टर अश्लीलता की सीमा पार करने वाले थे। यह घटना सिद्ध करती है कि वर्तमान पीढ़ी अश्लीलता व शरीर संबंधों के अलावा अन्य संबंधों को नहीं जानती। उन्हें अन्य संबंधों में विश्वास भी नहीं है।
स्त्री-पुरुष संबंधों तथा अमानवीय क्रियाओं का इतना वीभत्स सार्वजनिक प्रदर्शन लड़कियों की उपस्थिति में ही नहीं किया गया, बल्कि लड़कियों द्वारा अत्यधिक फूहड़ता से किया जा रहा था। लड़कियाँ भद्दे इशारे तक कर रही थीं। हालांकि वे जानती थीं कि वे क्या कर रही हैं। स्त्री-सुलभ लज्जा और स्त्रियोचित व्यवहार का नामोनिशान नहीं था।
ठीक है, आप आंदोलन कर रहे हैं, करिए। वहाँ कोई अघटित घटना न हो, असामाजिक तत्व उपद्रव न करें, इसलिए सरकार पुलिस व्यवस्था करती है। इस बार भी सरकार ने पुलिस बंदोबस्त रखा था। रक्षा व व्यवस्था के लिए तैनात पुलिस पर प्राणघातक हमला समझदारी नहीं कहा जा सकता। सामान्यतः तैनात पुलिस अपनी ओर से अनावश्यक व्यवधान नहीं करती। पर जब उस पर पथराव किया जाएगा, तलवारें भांजी जाएँगी, तो वे हाथ पर हाथ रखकर तो नहीं बैठ सकते।
अनेक पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। उनके भी परिवार हैं। उनके बच्चे भी परीक्षा देते हैं। उन्हें भी कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती हैं। समान कष्ट के कारण पुलिस वालों की सहानुभूति निश्चित ही आपके साथ रही होगी। मन की पीड़ा को दबाकर वे उत्तरदायित्व की पूर्ति हेतु तैनात थे। वे आपके शत्रु नहीं थे। भारतीय नागरिक ही हैं। पुलिस वालों को बड़ी कठिन एवं विपरीत परिस्थितियों में जिम्मेदारी निभानी पड़ती है। फिर पुलिस पर अमानवीय हमला क्यों किया गया? जंतर-मंतर दिल्ली का केंद्रीय स्थान है। सब ओर पुराना व पक्का निर्माण है। पुलिस पर हमले के लिए योजनापूर्वक पत्थर तो मंगवाए ही गए थे। फिर भी फुटपाथ की पटियों तथा सजावटी सार्वजनिक निर्माण को तोड़-फोड़कर पथराव किया गया। सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान अन्य किसी का नहीं, अपनी स्वयं की हानि होती है। अच्छे की मांग के लिए विनाश को उचित नहीं ठहराया जा सकेगा।
कहने का तात्पर्य यह है कि आंदोलन होते हैं। कतिपय बार लड़ाई-झगड़े भी हो जाते हैं। पर इस बार जो बदतमीजी, अश्लीलता, फूहड़ता और नंगा नाच देखने में आया है, वह गंभीर चिंता की बात है। पालकों को आग्रहपूर्वक आंदोलन के वीडियो देखने चाहिए। बच्चे किस दिशा में जा रहे हैं, उनकी सोच कितनी भद्दी है, इस पर विचार कर उसे योजनापूर्वक ठीक करना चाहिए। जातिगत संगठनों को अपने संगठन का भवन बनाने और अवांछनीय लोगों का सम्मान करने से ऊपर उठकर बच्चों को संस्कारयुक्त करने के कार्यक्रम चलाकर उन्हें प्रेरित करने की जरूरत है। सामाजिक संगठनों को अपनी सक्रियता बढ़ानी होगी। तथाकथित बुद्धिजीवियों से तो अपेक्षा नहीं है, पर विचारशील लोगों को आंदोलन के गूढ़ार्थ को गंभीरता से ग्रहण करना होगा।

श्रीधर पराड़कर
(लेखक अखिल भारतीय साहित्य परिषद के पूर्व संगठन मंत्री हैं।)