Emergency Story: Husband Missing for 6 Months

आपातकाल की आपबीती: पति को दुकान से उठा लिया छह महीने खोजती रही पत्नी

भोपाल की इमरत बाई ने आपातकाल में पति की गिरफ्तारी, गरीबी और बेटी की मौत का दर्द झेला। पढ़िए लोकतंत्र सेनानी परिवार की मार्मिक कहानी।

By : स्वदेश डेस्क
आपातकाल की आपबीती: पति को दुकान से उठा लिया छह महीने खोजती रही पत्नी

भोपाल के चांदबड़ क्षेत्र के विजय नगर में रहने वाली श्रीमती इमरत बाई, स्वर्गीय हरिप्रसाद सिनोरिया की पत्नी हैं। हरिप्रसाद जनसंघ से जुड़े कार्यकर्ता थे और तत्कालीन विधायक बाबूलाल गौर के साथ बैठकों, आंदोलनों और रैलियों में सक्रिय रहते थे। पेशे से वे दर्जी थे और अपनी छोटी सी दुकान चलाते थे। किराए के मकान में रहने वाला उनका परिवार साधनों से भले समृद्ध नहीं था, लेकिन चार बच्चों के साथ जीवन संतोष और उम्मीदों से भरा था। फिर आया आपातकाल। राजनीतिक गतिविधियों से जुड़े लोगों को घरों और दुकानों से उठाया जाने लगा। एक दिन हरिप्रसाद अपनी दुकान से घर लौटे ही नहीं। इमरत बाई ने आसपास खोजबीन की, लोगों से पूछा, रिश्तेदारों तक खबर पहुंचाई, लेकिन कोई जानकारी नहीं मिली। उन्हें यह तक पता नहीं था कि उनके पति को मीसाबंदी बनाकर जेल भेज दिया गया है।

पति की तलाश और चार बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी एक साथ उनके कंधों पर आ गई। घर चलाने के लिए उन्होंने मजदूरी शुरू कर दी। हालात इतने कठिन हो गए कि किराए का मकान छोड़कर झुग्गी में रहना पड़ा। करीब छह महीने बाद वे अपनी पीड़ा लेकर बाबूलाल गौर के पास पहुंचीं। उनके प्रयास से जेल में जानकारी मिली कि हरिप्रसाद बंद हैं। उसी सहयोग से इमरत बाई अपने पति से मिल सकीं। यह मुलाकात भावनाओं से भरी थी। एक ओर जेल की दीवारों में बंद पति थे, दूसरी ओर संघर्ष से टूटी पत्नी। दोनों की आंखों में आंसू थे, लेकिन हालात बदलने की ताकत किसी के पास नहीं थी।इमरत बाई बताती हैं कि इसी कठिन दौर में उनकी पांच वर्ष की बेटी बीमार पड़ी। न समय था, न पैसे। इलाज नहीं हो सका और बेटी हमेशा के लिए बिछड़ गई। अंतिम संस्कार तक मोहल्ले वालों के सहयोग से हुआ। वे कहती हैं कि उस समय प्रशासन भले संवेदनहीन हो गया था, लेकिन समाज ने उनका साथ नहीं छोड़ा।

आपातकाल खत्म हुआ तो लगा कि मुश्किलें भी खत्म हो जाएंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हरिप्रसाद जेल से बाहर तो आए, पर मानसिक रूप से टूट चुके थे। उनकी सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित हो गई थी। वे कई बार बिना बताए घर से निकल जाते। एक बार दिल्ली चले गए। बाद में भोपाल लौटे तो रास्ते में दुर्घटना का शिकार हो गए। पुलिस ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया, जहां से सूचना मिलने पर इमरत बाई उन्हें घर लेकर आईं। इसके बाद उनका स्वास्थ्य कभी पूरी तरह ठीक नहीं हो सका और 15 जुलाई 2004 को बीमारी के बीच उनका निधन हो गया। इमरत बाई कहती हैं कि उन्होंने बच्चों को पढ़ाकर आगे बढ़ाने का सपना देखा था, लेकिन आपातकाल ने वह सपना भी छीन लिया। बच्चे पढ़ नहीं सके। बड़े बेटे ने मां को मजदूरी करते देखा तो खुद भी काम पर उतर गया। बाद के वर्षों में लोकतंत्र सेनानी परिवारों के लिए शुरू हुई पेंशन योजना से कुछ सहारा मिला। उसी सहायता और अपनी बचत से उन्होंने एक छोटा पक्का घर बनाया।आज भी इमरत बाई के लिए आपातकाल सिर्फ इतिहास नहीं, जीवन भर का घाव है। 75 वर्ष की आयु में उनकी आंखों में वह दर्द अब भी जिंदा है, जिसे समय भी पूरी तरह भर नहीं सका।

आपातकाल का इतिहास अक्सर गिरफ्तारियों, प्रतिबंधों और राजनीतिक संघर्षों के रूप में याद किया जाता है, लेकिन इसके पीछे हजारों परिवारों की ऐसी निजी त्रासदियां भी छिपी है, जिनका दर्द पीढियां झेलती रहीं। भोपाल की श्रीमती इमरत बाई की कहानी भी ऐसी ही है। पति को पुलिस उठा ले गई, छह महीने तक कोई खबर नहीं मिली, मजदूरी कर बच्चों को पाला, इलाज के अभाव में बेटी खो दी और जब पति लौटे तो वे पहले जैसे नहीं रहे। यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि उस दौर की मानवीय पीड़ा का दस्तावेज है।

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