Emergency 1975: When a Medical Student Lost a Year

आपातकाल की आपबीती: करियर का साल और जेल की सलाखें

आपातकाल 1975 में मीसा के तहत जेल भेजे गए मेडिकल छात्र डॉ. विश्वजीत मुखर्जी की आपबीती, जब करियर का अहम साल सलाखों के पीछे बीत गया

By : स्वदेश डेस्क
आपातकाल की आपबीती: करियर का साल और जेल की सलाखें

विनोद दुबे

नवंबर 1975 का समय एक मेडिकल छात्र के जीवन का निर्णायक पड़ाव था। अंतिम वर्ष की परीक्षा सामने थी, भविष्य आकार ले रहा था। लेकिन आपातकाल की ज्यादती ने वह साल निगल लिया। यह आपबीती है छिंदवाड़ा निवासी 72 वर्षीय लोकतंत्र सेनानी डॉ. विश्वजीत मुखर्जी की, जिनका करियर का सबसे महत्वपूर्ण वर्ष जेल की सलाखों के पीछे बीता।

संस्मरण- डॉ. मुखर्जी उस समय गांधी मेडिकल कॉलेज, भोपाल में एमबीबीएस अंतिम वर्ष के छात्र थे। दिसंबर और जनवरी में अंतिम परीक्षा होनी थी। उससे पहले ही पुलिस छात्रावास पहुंची। छात्रावास के बाहर हुई एक मारपीट की घटना में उनके रूम पार्टनर की गिरफ्तारी हुई थी। पुलिस ने डॉ. मुखर्जी पर आरोप लगाया कि वे रूम पार्टनर के सहयोगी थे और पुलिस कार्रवाई में बाधा डाल रहे थे।डॉ. मुखर्जी बताते हैं कि उन पर लगाए गए आरोप पूरी तरह झूठे थे। पुलिस और महाविद्यालय प्रशासन की ओर से उन पर दबाव डाला गया कि वे रूम पार्टनर के खिलाफ गवाही दें। उन्होंने ऐसा करने से इंकार कर दिया। लगभग एक सप्ताह बाद पुलिस ने छात्रावास के कमरे का दरवाजा खटखटाया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया।पुलिस ने तलैया थाने में रातभर उन्हें लॉकअप में रखा। सुबह मीसा की धाराएं लगाकर केंद्रीय जेल भोपाल भेज दिया गया। उस दौर में न गवाहों की जरूरत थी, न सबूतों की, न दलीलों की। गिरफ्तारी ही अंतिम निर्णय बन जाती थी।

21 नवंबर 1975 से लेकर अक्टूबर 1976 तक वे लगभग 11 महीने मीसा बंदी रहे। विडंबना यह रही कि छात्रावास के सामने हुए झगड़े के मुख्य आरोपी और अन्य लोग छह महीने में ही रिहा कर दिए गए, जबकि बार बार अनुरोध और परीक्षा का हवाला देने के बावजूद उन्हें 11 महीने बाद ही छोड़ा गया।डॉ. मुखर्जी बताते हैं कि दिसंबर 1975 और जुलाई 1976 में एमबीबीएस अंतिम वर्ष की परीक्षा थी। उन्होंने और कुछ अन्य छात्रों ने जेल से परीक्षा देने की अनुमति मांगी, पर जेल प्रशासन और शासन ने अनुमति नहीं दी। परिणामस्वरूप उनका एक पूरा शैक्षणिक वर्ष नष्ट हो गया। जेल से रिहा होने के बाद ही वे परीक्षा दे सके और अपनी डिग्री पूरी कर पाए।

गिरफ्तारी की सूचना मिलते ही उनके परिजन व्याकुल हो उठे। वे भोपाल पहुंचे, जेल में मुलाकात की और स्थानीय प्रशासन से लेकर दिल्ली तक प्रयास किए। लेकिन उस समय व्यवस्था किसी की सुनने को तैयार नहीं थी। जेल में मौजूद वरिष्ठ नेताओं ने परिजनों को समझाया कि प्रयास व्यर्थ है। अंततः स्वयं डॉ. मुखर्जी ने ही परिवार से कहा कि वे अधिक भागदौड़ न करें।वे बताते हैं कि थाने में उनके साथ मारपीट नहीं हुई। जेल में भी शारीरिक प्रताड़ना नहीं मिली। उस समय केंद्रीय जेल भोपाल में कैलाश नारायण सारंग, सरताज सिंह, आरिफ बेग जैसे कई राजनीतिक बंदी मौजूद थे। राजनीतिक बंदियों के लिए भोजन और वातावरण अपेक्षाकृत ठीक था। फिर भी एक 22 वर्षीय छात्र के लिए 11 महीने की कैद केवल शारीरिक बंधन नहीं थी, वह भविष्य पर लगा विराम थी। करियर का महत्वपूर्ण वर्ष आपातकाल की नीतियों की भेंट चढ़ गया।डॉ. मुखर्जी आज भी मानते हैं कि लोकतंत्र में असहमति को अपराध नहीं माना जाना चाहिए। उनका अनुभव यह याद दिलाता है कि सत्ता की कठोरता कभी कभी सबसे अधिक चोट उन युवाओं को पहुंचाती है, जिनका अपराध केवल सच के साथ खड़ा होना होता है।

 

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