Energy Crisis Warning for India

देर से जागने की कीमत देश ही चुकायेगा 

पश्चिम एशिया संकट और बढ़ती तेल कीमतों के बीच भारत के सामने ऊर्जा और विदेशी मुद्रा संकट गहराने की आशंका। जानिए क्यों देर से उठाए कदम भारी पड़ सकते हैं।

देर से जागने की कीमत देश ही चुकायेगा 

राज कुमार सिंह 

भारत की राजनीति हर चीज को राजनीतिक नजरिये से देखने-दिखाने को अभिशप्त है। ताजा उदाहरण गहराते ऊर्जा संकट और बढ़ते विदेशी मुद्रा संकट से निपटने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील का है। प्रधानमंत्री ने देशवासियों से अपील की कि पेट्रोल-डीजल की खपत कम करें और उसके लिए वर्क फ्रॉम होम, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग तथा कार पूलिंग जैसे उपाय करें। एक साल तक सोना न खरीदने और विदेश यात्रा से परहेज करने की अपील भी की गयी है। अपील खाद्य तेलों का उपयोग 10 प्रतिशत घटाने की भी है। अमेरिका और ईरान में संघर्ष विराम के बावजूद पश्चिम एशिया में जारी टकराव और अस्थिरता से कमोवेश पूरा विश्व ऊर्जा संकट झेल रहा है। तमाम देशों से उससे निपटने के लिए अपनी परिस्थितियों के अनुरूप कदम भी उठाये हैं। महंगाई की मार और नागरिकों की देशवासियों की चर्चा के बावजूद दिखा नहीं कि कहीं भी विपक्ष ने सरकार के ऐसे कदमों की आलोचना की हो, लेकिन भारत में विपक्ष की प्रतिक्रियाओं से लगता है कि मानो मोदी सरकार ही इस संकट के लिए जिम्मेदार हो।

युद्ध की आहट के बीच प्रधानमंत्री मोदी की इजरायल यात्रा सही थी या गलत यह कूटनीतिक बहस का विषय है, लेकिन यह गलतफहमी तो नहीं होनी चाहिए कि अगर वह नहीं जाते तो अमेरिका और इजरायल, ईरान पर हमला नहीं करते। मुक्त सूचनाओं के दौर में साफ है कि यह युद्ध अमेरिका की साम्राज्यवादी सोच, इजरायल के युद्धोन्माद और ईरान की इस्लामिक कट्टरता का परिणाम है। शेष विश्व की इसमें कोई भूमिका हो ही नहीं सकती थी। फिर भी अंतिम क्षणों तक युद्ध टालने की कोशिशें की गयीं। जिनेवा में कुछ मुद्दों पर सहमति भी बनी, लेकिन समझौता वार्ता के अगले चरण से पहले ही अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमले शुरू कर दिये, और जिनकी परिणति पूरा विश्व देख रहा है झेल भी रहा है। युद्धोन्मादियों के निहित स्वार्थों के चलते ही इस्लामाबाद में शांति वार्ता विफल हो गयी और संघर्ष विराम दोनों ओर से धमकियों के बीच अंतिम सांसें लेता दिख रहा है। समझ पाना मुश्किल नहीं कि ऊर्जा संकट अनिश्चितकालीन हो सकता है। यह भी कि संघर्ष विराम से अंततः शांति की राह निकल भी आती है तो ऊर्जा उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला में आये व्यवधान के पूर्ण समाधान में लंबा समय लगेगा। 

इसलिए ऊर्जा संकट और उसके चलते विदेशी मुद्रा संकट से निपटने के लिए तात्कालिक और दीर्घकालीन उपाय के अलावा कोई विकल्प किसी भी देश के पास नहीं है। हां, यह प्रश्न अनुत्तरित है कि जब दुनिया भर में ऊर्जा संकट से निपटने के उपाय 28 फरवरी को शुरू हुए युद्ध के सप्ताह भर बाद ही शुरू हो गये थे, भारत में इतनी देर क्यों हुई? चुनाव लोकतंत्र की प्राण वायु हैं, पर चुनाव जीत कर सत्ता में आने और उसे बनाये रखने की सोच कई बार राजनीतिक नेतृत्व को देश हित में सही समय पर सही फैसले लेने से रोकती भी है। पड़ोसी देशों से ले कर दूरदराज तक के देशों में पेट्रोल-डीजल के दाम मार्च में ही बेतहाशा बढ़ गये। विकसित देश भी महंगाई की मार से अछूते नहीं, लेकिन सात मार्च को कमर्शियल और घरेलू गैस सिलेंडर के दामों में कुछ वृद्धि के अलावा इस मोर्चे पर हमारी सरकार मौन ही रही। विपक्ष द्वारा व्यक्त आशंकाओं को दरकिनार करते हुए देश में पर्याप्त भंडार का दावा कर सरकार देशवासियों को महंगाई से बचाये रखने का भरोसा भी देती रही। 

अतीत के अनुभव के मद्देनजर समझ पाना मुश्किल नहीं था कि सरकार की यह सदाश्यता पांच राज्यों में मतदान तक ही है। हमने अतीत में भी देखा है कि सरकारी तेल कंपनियां चुनाव के दौरान जनता के प्रति इतनी संवेदनशील हो जाती थीं कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ जाने पर भी देश में कीमत नहीं बढ़ाती थीं, लेकिन मतदान समाप्ति की शाम ही सारी कसर पूरी कर लेती थीं। उस लिहाज से मोदी सरकार ने ज्यादा धैर्य दिखाया। मतदान के अंतिम चरण के बाद ही कमर्शियल सिलेंडर की कीमत में भारी-भरकम वृद्धि की गयी तथा महंगाई की बाकी मार के लिए खुद प्रधानमंत्री ने अपील कर देशवासियों को तैयार किया। सवाल पूछा जा सकता है कि देशवासियों के पास विकल्प ही क्या है, पर विकल्प तो सरकार के पास भी नहीं है। जब अंतर्राष्ट्रीय कारणों से वैश्विक संकट है तो झेलना पड़ेगा ही। हां, पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में मतदाताओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका के चलते ऐसे जरूरी कदम भी दो माह बाद उठाने के लिए सरकार की आलोचना की जा सकती है।

अगर कारोना काल में बिना तामझाम सादगी से चुनाव हो सकते थे, तो इस बार क्यों नहीं? ऊर्जा संकटकाल में धुंआधार चुनाव प्रचार में फूंके गये पेट्रोल-डीजल की जवाबदेही किसकी है? शक्ति प्रदर्शन के रूप में हुए नयी सरकारों के शपथ ग्रहण में तमाम बड़े नेता कार पूल करके आये थे? थोक महंगाई दर पहले ही उच्च स्तर पर पहुंच चुकी है और अतीत का अनुभव बताता है कि तेल कंपनियों को इस बीच हुए नुकसान की भरपाई अंततः उपभोक्ताओं को ही करनी पड़ेगी। कटु सत्य यह भी है कि पेट्रोल-डीजल सीएनजी की कीमतों में की गयी वृद्धि महज झांकी है। कई सालों से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम रसातल में चले जाने पर भी उपभोक्ताओं को राहत न देनेवाली सरकारी तेल कंपनियों के हालिया घाटे के आंकड़ों को सच मानें तो पेट्रोल डीजल सीएनजी-रसोई गैस की कीमतों में आग लगना तय है-और तब महंगाई डायन से खासकर मध्य और निम्न मध्य आय वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होगा। 

अगर विपक्ष को इसकी चिंता है तो उससे बेखबर सरकार भी नहीं होगी, लेकिन सवाल तात्कालिक उपायों से आगे बढ़ कर दीर्घकालीन नीतियों और जीवन शैली का है। शाश्वत समस्या है कि हमारी सरकारें आग लगने पर ही कुआं खोदने की सोचती हैं। अगर हम अपनी जरूरत के 80 प्रतिशत तक कच्चे तेल के लिए आयात पर निर्भर हैं, जिसका भुगतान में हमें ज्यादातर डॉलर में ही करना पड़ता है, तब आज तक देश में विश्वसनीय और सुविधाजनक सार्वजनिक परिवहन तंत्र क्यों नहीं विकसित किया गया? चंद महानगरों में मेट्रो के उदाहरण से इस सवाल का जवाब नहीं मिलता, क्योंकि दिल्ली में डीटीसी और मुंबई में एसटी और बीएसटी की विश्वसनीय बस सेवा हमने ध्वस्त होते देखी है। कोरोना काल में किये गये वर्क फ्रॉम होम के प्रयोग को यथासंभव जीवन शैली का हिस्सा बनाया जाना चाहिए? छोटे काफिले के साथ या मेट्रो में सफर कर प्रचार बटोरने वाले नेता-अफसर ऐसा हमेशा क्यों नहीं कर सकते? 

जो देश हरित क्रांति करने में सक्षम रहा, उसकी खाद्य तेल आयात पर निर्भरता सरकारी प्राथमिकताओं पर ही सवालिया निशाल लगाती है। कच्चे तेल के बाद सबसे ज्यादा हमारा आयात बिल सोने का है, पर बेलगाम कीमतों के चलते वह आम भारतीय की क्रयशक्ति से बाहर है, जबकि सक्षम लोगों पर किसी अपील का असर शायद ही हो।

युद्धोन्मादियों के निहित स्वार्थों के चलते ही इस्लामाबाद में शांति वार्ता विफल हो गयी और संघर्ष विराम दोनों ओर से धमकियों के बीच अंतिम सांसें लेता दिख रहा है। समझ पाना मुश्किल नहीं कि ऊर्जा संकट अनिश्चितकालीन हो सकता है। यह भी कि संघर्ष विराम से अंततः शांति की राह निकल भी आती है तो ऊर्जा उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला में आये व्यवधान के पूर्ण समाधान में लंबा समय लगेगा।

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