गाजियाबाद के जहेज मामले पर क्यों चुप्पी?

गाजियाबाद में जहेज की नुमायश को लेकर विमर्श में इतना सन्नाटा क्यों है?

सोनाली मिश्रा

By : स्वदेश डेस्क
गाजियाबाद में जहेज की नुमायश को लेकर विमर्श में इतना सन्नाटा क्यों है?

उत्तर प्रदेश में हुए एक निकाह के दौरान जहेज की बेशर्म नुमायश हुई है। मुस्लिमों में dowry को जहेज कहा जाता है, जो कि एक अरबी शब्द है। दहेज शब्द जहेज से ही आया है। जहेज का अर्थ होता है सौगात, या फिर दुल्हन को दिया जाने वाला उपहार, जो पहले अपनी मर्जी से दिया जाता था। 

मगर पाकिस्तानी ड्रामाज में यह स्पष्ट होता है कि यह जो भी जहेज की बातें हैं, वह कहीं न कहीं अपनी मर्जी की बात तो नहीं है, क्योंकि वहाँ के लगभग हर ड्रामा में लड़की की शादी में जहेज में ढेर सा सामान जाता ही है। और लड़की पैदा होने के साथ से ही जहेज को इकट्ठा किया जाने लगता है। मध्य वर्गीय परिवार को केवल जहेज के कारण कितनी समस्याएं आती हैं, वह सब भी दिखाया जाता है। 

कैसे जहेज न लाने वाली लड़की अपने ससुराल में जगह नहीं बना पाती है और अपने सास आदि सभी की जली कटी सुनती है। कैसा है नसीबा ऐसा ही एक ड्रामा था। मगर बात अब भारत की और भारत में रहने वाले मुस्लिम समुदाय और दहेज या जहेज पर उनके विचारों की। 

चलते हैं कुछ वर्ष पूर्व अहमदाबाद में घटी एक घटना की ओर। घटना थी एक मुस्लिम आयशा की लाइव आत्महत्या। इसमें बहुत भावुक होकर उसने कहा था कि कैसे उसके मातापिता ने उसे जहेज दिया था, मगर ससुराल वालों ने उसे फिर भी और जहेज के लिए प्रताड़ित किया और उसके कारण उसने आत्महत्या कर ली थी। बहुत हंगामा हुआ था और फिर मुस्लिम संगठनों और ओवैसी ने भी यह अपील की थी कि मुस्लिम परिवार जहेज से तौबा करें। 

इसी बीच यह भी फैलाया जाता है कि मुस्लिमों में तो जहेज होता ही नहीं है, यह तो हिंदुओं के कारण है। मगर यह कहीं न कहीं पूरी तरह से गलत है। क्योंकि यदि हिंदुओं से कथित रूप से उनके यहाँ जहेज आया तो यह अरबी मूल का शब्द होना ही नहीं चाहिए था। यह तो फिर संस्कृत का स्त्रीधन होना चाहिए था। 

मगर बात अब उससे आगे! बात-बात पर दहेज या स्त्रीधन को लेकर हंगामा मचाने वाले लोग या फिर आयशा की आत्महत्या के समय पर जहेज न लेने की अपील करने वाले संगठन या ओवैसी जैसे लोग गाजियाबाद में जो निकाह के समय जहेज की बोली लग रही है कि 1 करोड़ 1 लाख 11 हजार नकद, BMW कार और बिचौलिए को स्कॉर्पियो दी जाएगी, यह सब क्या है?

क्या यह गैरकानूनी नहीं है? बात-बात पर दहेज को गैर-इस्लामी बताने वाले लोग इस नुमायश का विरोध क्यों नहीं कर रहे हैं? सोशल मीडिया पर लोग यह बात लिख रहे हैं कि जब यह कहा जाता है कि दहेज की बुराई हिंदुओं से इस्लाम में आई तो फिर यह जो सार्वजनिक रूप से बोली लग रही है, उसका विरोध क्यों नहीं हो रहा है? 

बात हिन्दू या मुस्लिम की नहीं है, बात है इस प्रकार के प्रदर्शन की, क्योंकि इससे वे लोग प्रभावित होते हैं, जिनके पास पैसे नहीं होते हैं, जिनकी बेटियों के सपने जहेज या दहेज के चलते टूट जाते हैं। जब इस खबर को मीडिया चला रहा है, तो आयशा की पीड़ा एक बार फिर से ताजा हो गई है। दहेज के चलते जलाई गई हर हिन्दू और मुस्लिम लड़की की कहानी ताजा हो गई है। 

दहेज एक अभिशाप है, इसे इस तरह कोई भी परिवार दिखाए, तो समाज के बुजुर्गों या संगठनों को आकर रोकना चाहिए कि इससे समाज में गलत संदेश जाता है। इससे गरीब लड़कियों की शादी में समस्याएं आती हैं, और एक प्रकार की प्रतिस्पर्धा बढ़ती है।

लेखिका - सोनाली मिश्रा

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