Iran Israel War Triggers Global Oil Crisis

युद्ध से गहराया तेल संकट

ईरान-इजराइल युद्ध के बीच वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर दिखने लगा है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर खतरे से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हैं।

By : स्वदेश डेस्क
युद्ध से गहराया तेल संकट

अमेरिका-इजराइल और ईरान की जंग को एक सप्ताह से अधिक हो चुके हैं। युद्ध लगातार जारी है और दोनों देशों की तरफ से ताबड़तोड़ हमले किए जा रहे हैं। इस बीच न सिर्फ युद्धरत देश बल्कि अन्य देश भी प्रभावित हो रहे हैं।युद्ध का असर अब सीधे तौर पर दुनियाभर में देखने को मिल रहा है। हर किसी को डर सता रहा है कि आने वाले दिनों में लोगों को तेल के संकट का सामना न करना पड़े। मध्य-पूर्व के देशों पर इसका साफ असर दिखाई देने लगा है, जहां तेल और गैस प्रोजेक्ट प्रभावित हो गए हैं। साथ ही होर्मुज की खाड़ी जैसे अहम रास्तों पर भी सुरक्षा खतरा बढ़ गया है।इसी कारण वैश्विक बाजार में तेल की सप्लाई कम होने और कीमतें बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है। हालांकि भारत सरकार की तरफ से दावा किया जा रहा है कि न तो तेल की कमी है और न ही कीमतों में किसी तरह का इजाफा किया जाएगा।

ईरान-इजराइल-अमेरिका के बीच युद्ध के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह बाधित हुई है, जिससे कच्चे तेल की कीमतें 100-110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गई हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने के डर और हूतियों व ईरान द्वारा तेल ठिकानों को निशाना बनाए जाने से आपूर्ति में भारी कमी आई है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए खतरा पैदा कर रही है।दरअसल, दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरता है। तनाव के कारण सऊदी अरब और यूएई को उत्पादन में कटौती करनी पड़ी है। यही कारण है कि तेल की कीमतों में करीब 30 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है, जो 2022 के उच्चतम स्तर के करीब है।

आपदा की इस स्थिति में भारत को भी इस संकट से बड़ा खतरा हो सकता है, क्योंकि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आयात करता है। भारत के पास लगभग 74 दिनों का भंडार (भूमिगत भंडार और रिफाइनरी सहित) है, लेकिन कीमतें बढ़ने पर डीजल-पेट्रोल में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हो सकती है।इन हालातों में पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी उथल-पुथल मच गई है। वहां तेल की आपूर्ति बाधित होने से पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा दिए गए हैं। वैश्विक बाजार में ईंधन की कमी से ट्रांसपोर्टेशन महंगा हो गया है, जिससे खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें बढ़ना शुरू हो गई हैं।

यह स्थिति 1973 और 1979 के तेल प्रतिबंधों के समान मानी जा रही है, जब मध्य-पूर्व के देशों के फैसलों से वैश्विक ऊर्जा संकट पैदा हो गया था।युद्ध के असर से भारत भी अछूता नहीं है। गैस महंगी हो गई है, तेल पर संकट गहराया है, सेंसेक्स गिर रहा है और रुपया लुढ़कता जा रहा है। खाड़ी देशों में करीब एक करोड़ भारतीय भी मौजूद हैं, जिससे उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है।इन मुद्दों को लेकर संसद में विपक्ष ने जोरदार प्रदर्शन किया और चर्चा की मांग की। सरकार ने संसद में बयान देते हुए सप्लाई चेन पर असर और भारतीयों के रेस्क्यू की बात कही, लेकिन विपक्ष इससे संतुष्ट नहीं है। विपक्ष तेल-गैस की कीमतों, निर्यातकों को हो रहे नुकसान और भारत के स्पष्ट रुख पर सवाल उठा रहा है।

सरकार का कहना है कि विपक्ष, खासकर कांग्रेस, संसद चलने नहीं देना चाहती। वहीं विदेश नीति विशेषज्ञ हर्ष पंत का कहना है कि मौजूदा हालातों में तेल के दाम बढ़ना तय है और इसका असर वैश्विक महंगाई पर भी पड़ेगा।उन्होंने कहा कि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भी मुश्किलों का सामना कर रही हैं, जबकि कमजोर अर्थव्यवस्थाएं चरमरा रही हैं। ट्रंप के बयान पर उन्होंने कहा कि उससे ऐसा लगता है कि या तो उन्हें दीर्घकालिक असर की परवाह नहीं है या फिर इसकी पूरी समझ नहीं है।भारत की रणनीति पर उन्होंने कहा कि भारत अपने तेल आयात का लगातार विविधीकरण करता रहा है। जब यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ था, तब भारत ने रूस से भारी मात्रा में तेल लेना शुरू कर दिया, जबकि उससे पहले भारत रूस से महज करीब 2 प्रतिशत तेल ही आयात करता था।


 

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