हनुमान की शक्ति और द्वापर के सेतु

बड़ा मंगलवार (बुढ़वा मंगल): हनुमान के लिए जब श्रीकृष्ण के पीठ से बही रुधिर धार

मायापति मिश्र

By : स्वदेश डेस्क
बड़ा मंगलवार (बुढ़वा मंगल): हनुमान के लिए जब श्रीकृष्ण के पीठ से बही रुधिर धार

गताक से आग-  कमशः

जब साधक एवं साध्य के मध्य स्थित सारी दूरियाँ समाप्त हो जाती हैं तब भी साधक अपने आराध्य के समक्ष दीन-हीन ही बना रहता और यही कहता है कि हे प्रभु! हम दीन और आप दीनानाथ हैं। भक्त वत्सल श्रीराम की भक्ति में हनुमान इतने डूबे रहते थे कि उन्हें अपने से विलग करने को तैयार ही नहीं होते थे। हनुमान सदैव श्रीराम को लक्ष्मण के साथ सीता सहित अपने हृदय में बसाये रहते थे और प्रार्थना करते थे कि - 
 यह बर मांगऊं कृपा निकेता। बसहु हृदय श्री अनुज समेता ।। 

हनुमान मानते थे कि जो व्यक्ति हृदय में रहता है वह दूर होकर भी दूर नहीं होता-

 दूरस्थोडिय न दूरस्थे यो मस्य  मनसि स्थितः
 
समीपता का लोभ पाले हनुमान को श्री राम अयोध्या में लोगों की सेवा हेतु छोड़ गएI ठीक ऐसे जैसे नदी को पार करने वाले लोग चले जाते हैं और पार लगाने वाली नाव अगले पथिक को पार कराने के उद्देश्य से नदी में ही रह जाती है। धन्य हैं हनुमान जो नित्य जीवी चिरंजीवि परम बहम की तरह अविनाशी है

 परं ब्रह्म नित्यं तदेवाहमास्मि

 वह परम ब्रह्म जो नित्य है वही (अविनाशी) में हूँ।

द्वापर में त्रेता के हनुमान राम के साथ-साथ कृष्ण के भी हो गये। त्रेता के हनुमान को माता सीता ने  अष्टसिद्धियों एवं नवनिधियों के दाता होने का वरदान दिया था- 

 अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता
अस वर दीन्हि जानकी माता। 

तो द्वायर में श्रीकृष्ण ने सिद्धियों को बरदान के स्थान पर कर्म से जोड़ दिया-

 सिद्धिभर्ववति कर्मजा 
                       - भगवत गीता 4,12

अर्थात - सिद्धि अथवा सफलता कर्म से उत्पन्न होती है। हनुमान कर्मवादी थे और मानते थे कि-

 नायमात्मा बलहीनेन लक्ष्यो
                       - मुण्ड‌कोषनिषद 

बलहीन पुरुष परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकता। और वे यह भी मानते थे कि- 
 अभयम एतद ब्रह्मति 
                           -  छन्दोग्यपनिषद 

अभयता ही ब्रह्म है।

निर्भिक अतुलित बलधाम हनुमान ने कई बार श्री कृष्ण के कहने पर उनकी इच्छानुसार द्वापर काल के महान योद्धाओं- भीम और अर्जुन के घमंड को चूर-चूर कर दिया। एक कथा के अनुसार एक बार महाभारत काल के महान धनुरघर अर्जुन से श्रीकृष्ण से कहा कि प्रभु श्रीराम चाहते तो अपने बाणों से समुद्र में पुल बना सकते थे। फिर उन्होंने नल-नील और भालू बन्दरों की सहायता लेकर पुल क्यों बनाया। आगे अर्जुन ने दर्प में भर कर यह भी कहा कि यदि मैं होता तो एक बाण मार कर ही पुल निर्माण कर देता। अर्जुन का घमंड देख कर श्रीकृष्ण कहने लगे ठीक है तो तुम आज यहीं नदी पर बाणों का पुल बना दोI अभिमान से चूर अर्जुन ने कहा अभी बनाता हूँ।

अर्जुन ने पास की नदी पर बाणों का पुल निर्मित कर दिया। श्रीकृष्ण ने कहा ठीक है अब मैं तुम्हारे द्वारा निर्मित पुल पर चलने के लिए रामायण काल के एक योद्धा हनुमान को बुलाता हूँ। श्री कृष्ण के बुलावे पर वृद्ध हनुमान जी प्रकट हुए। उस दिन जेष्ठ माह का मंगलवार का दिन था। हनुमान जी बूढ़े लग रहे थे। जरा रूपं हरति - वृद्धावस्था रूप को नष्ट कर देती है। श्रीकृष्ण की इच्छानुसार जर्जर शरीर बाले बुढ़वा हनुमान अर्जुन के द्वारा बनाये पुल पर चढ़े। दो कदम चलते ही पुल चरमरा कर नदी मे घंसने लगा तो श्री कृष्ण भगवान ने पुल को बचाने के लिए नदी में घुस कर टूटते पुल के नीचे अपनी पीठ लगा दिया, हनुमान के भार से नदी में धंसता हुआ पुल तो बच गया परन्तु श्रीकृष्ण की घायल पीठ से होने वाले रक्तस्राव से नदी का जल लाल हो गया। यह देख कर हनुमान पीछे खिसकते हुए पुल से नीचे उतर आये।

हनु‌मान मे भगवान श्रीकृष्ण से कहा- प्रभु! आपने यह क्या किया? यह तो मेरे द्वारा पाप हो गया I श्रीकृष्ण कहने लगे-नहीं हनुमान, यह पुल तुम्हारा भार नहीं सह पा रहा था और नदी में धंसा चला जा रह था । यदि पुल टूट जाता तो तुम्हें चोट लग जाती इस लिए मैंने अपनी पीठ लगा कर पुल बचा लिया। हनुमान की आंखें भर आयी और अर्जुन देखते रह गये। श्रीकृष्ण में कहा अर्जुन, बन्दर भालुओं द्वारा निर्मित सेतु पर पूरी राम सेना पार हुई थी। तुम्हारे बाणों के पुल पर तो राम का एक सैनिक भी पार नहीं हो पाया। अर्जुन का घमंड चूर-चूर हो गया और वे मान गये कि हनुमान महाबलशाली हैं और वृद्धावस्था में भी अति उत्साही हैं -

नास्तुत्साहत्परं बलम 

उत्साह से बढ़ कर कोई अन्य बल नहीं 

लेखक मायापति मिश्र, बौद्धिक प्रमुख, इतिहास संकलन समिति मध्य भारत प्रांत हैं।

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