Biological Terror Threat Raises Alarm In India

भारत पर मंडरा रहा जैविक आतंकवाद का खतरा

भारत में जैविक आतंकवाद की साजिश का खुलासा होने के बाद सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हैं। विशेषज्ञों ने AI और बायोटेक्नोलॉजी के दुरुपयोग पर चिंता जताई है।

By : स्वदेश डेस्क
भारत पर मंडरा रहा जैविक आतंकवाद का खतरा

प्रमोद भार्गव

जैविक आतंकवाद अब प्रामाणिक सच्चाई में बदलता दिखाई देने लगा है। भारत में जैविक आतंक फैलाने की एक बड़ी साजिश का पर्दाफाश हुआ है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने मई 2026 में तीन लोगों के विरुद्ध अहमदाबाद, गुजरात की विशेष एनआईए अदालत में आरोप-पत्र प्रस्तुत किया है। इस षड्यंत्र में हैदराबाद के मुख्य आरोपी डॉ. सैयद अहमद मोहिउद्दीन को गिरफ्तार किया गया है। उसने अपने घर में ही एक घातक जैविक विष बनाने की प्रयोगशाला बना ली थी। इसे अरंडी के बीज से तैयार किया जाता है। इस मामले में सहयोगी आरोपी उत्तर प्रदेश के आजाद और मोहम्मद सुहेल को भी गिरफ्तार किया गया है। ये आरोपी आतंकी संगठन आईएसआईएस से जुड़े विदेशी आतंकियों के इशारे पर काम कर रहे थे। इनका लक्ष्य भारत में भीड़-भाड़ वाले स्थलों पर जैविक जहर फैलाने का था। फल, सब्जियों और मंदिरों के प्रसाद में भी जहर मिलाकर हमला करने की साजिश रची जा रही थी। ये ऐसी आतंकी घटनाओं को दिल्ली, अहमदाबाद और लखनऊ में अंजाम देने की फिराक में थे।

दिल्ली पुलिस ने भी मई माह में आईएसआई के 9 एजेंटों को देश के विभिन्न नगरों से हिरासत में लिया है। ये गिरफ्तारियां इस बात का ठोस सबूत हैं कि आतंकी भारत में जैविक हमला करने की तैयारी में लगे हैं।कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जैविक हथियार बनाना हुआ आसान:कृत्रिम बुद्धिमत्ता की उपलब्धियां अब केवल नौकरी, पढ़ाई और तकनीक तक सीमित नहीं रह गई हैं। जैविक सुरक्षा से जुड़े विशेषज्ञों को आशंका है कि एआई भविष्य में जैविक आतंकवाद को भी आसान बना सकता है। कोई भी व्यक्ति वैज्ञानिक विशेषज्ञता हासिल किए बिना बीमारी पैदा करने वाले जीवाणु, विषाणु एवं कीटाणु बनाकर उन्हें बड़े समूहों में फैला सकता है।

हाल के दिनों में जीन या आनुवंशिक अनुक्रमण की तकनीक, जैसे सीआरआईएसपीआर यानी क्लस्टर्ड रेगुलरली इंटरस्पेस्ड शॉर्ट पैलिंड्रोमिक रिपीट्स, जीवित प्राणियों के डीएनए को मनचाहे रूप में परिवर्तित करने के लिए उपयोग में लाई जा रही है। ये जैविक इंजीनियरिंग टूलकिट अब बाजार में उपलब्ध होने लगे हैं। प्रयोग में लाए जाने वाले कई औजार और अन्य सामग्री ऑनलाइन वेबसाइटों से खरीदी जा सकती हैं। इससे हानि नहीं पहुंचाने वाले जीवाणुओं को भी जानलेवा बनाया जा सकता है।इनके निर्माण में एआई के समय में विकसित हुए लार्ज लैंग्वेज मॉडल का उपयोग किया जाता है। यह एक प्रकार की कृत्रिम बुद्धिमत्ता है, जो इंसानी भाषा को समझने, उसका सार प्रस्तुत करने और अनुवाद करने में सक्षम है। ये कंप्यूटर मशीन लर्निंग और न्यूरल नेटवर्क का उपयोग करते हैं। अतः यह तकनीक इंटरनेट पर उपलब्ध डाटा से संदर्भ एकत्रित कर इंसानों से संवाद करने में सक्षम है। इसी तकनीक का उपयोग आतंकी जैविक हथियार बनाने के उपाय खोजने में कर रहे हैं।

विशेषज्ञों की चिंता : वैज्ञानिक तकनीक का दुरुपयोग किसी भी वैज्ञानिक तकनीक के अनुचित उपयोग के परिप्रेक्ष्य में विशेषज्ञों का चिंतित होना स्वाभाविक है। क्योंकि जैविक हथियार बनाने की विधियां ओपन एआई और गूगल जैसे प्लेटफॉर्म पर सुलभ हैं। हालांकि इस संदर्भ में यह अच्छी बात है कि एलएलएम के प्रयोग कई बार गड़बड़ा जाते हैं। फिर भी तकनीकी जानकारी की आसान उपलब्धता के कारण यदि अनेक लोग इस तकनीक को सीखने में लगे रहें, तो वे विशेषज्ञ बन सकते हैं।एआई कंपनियां भी अब इस बात को स्वीकार करने लगी हैं कि उनके मॉडल मामूली वैज्ञानिक ज्ञान रखने वाले जिज्ञासुओं की जैविक हथियार बनाने में मदद कर सकते हैं। ऐसे में रोगाणु बनाने का इच्छुक व्यक्ति जैविक आतंक फैलाने के लिए जैविक हथियार बनाने में सफल हो सकता है।

इस संदर्भ में मिशिगन मेडिकल कॉलेज में माइक्रोबायोलॉजी के प्राध्यापक माइकेल इंपीरियल का कहना है कि डीएनए या आरएनए के कणों से जीवाणु या विषाणु बनाना इतना सरल भी नहीं है कि कोई भी व्यक्ति आसानी से जैविक हथियार बना ले। फिर भी जैविक औजारों से घातक जैविक हथियार बनाए जा सकते हैं।कोरोना वायरस ने जैविक रोगाणु बनाने की आशंका बढ़ाई:कोरोना वायरस के अस्तित्व में आने के बाद से ही यह आशंका बनी हुई है कि दुनिया के जैव प्रौद्योगिकी में सक्षम देश जैविक या कीटाणु हथियार बनाने में लगे हुए हैं। इन हथियारों से कम खर्च में बड़ी तबाही मचाई जा सकती है।

रूस अत्यंत खतरनाक इबोला वायरस को जैविक औजार के रूप में विकसित करने की तैयारी में लगा है। इस गोपनीय परियोजना को ‘टोलेडो’ नाम दिया गया है। टोलेडो स्पेन का एक नगर है, जहां प्लेग फैलने से बड़ी संख्या में लोग काल के गाल में समा गए थे।इबोला के साथ-साथ मारबर्ग वायरस को भी रूस ने टोलेडो परियोजना में शामिल किया हुआ है। इस विषाणु से संक्रमित लोगों में से 88 प्रतिशत की मौत हो जाती है। दरअसल, चीन से फैले कोरोना वायरस ने जैविक हथियारों का नया रास्ता खोल दिया है।इस तरह के औजारों में जीवाणु, विषाणु, कीटाणु, फफूंद और जैविक विष जैसे संक्रमण फैलाने वाले तत्वों का उपयोग किया जाता है। जिस क्षेत्र में भी इनकी मौजूदगी हो जाती है, वहां ये तेजी से फैलते हैं और लोगों को मौत के घाट उतारते चलते हैं।सैन्य युद्ध में जैविक औजारों का प्रयोग पूरी तरह निषिद्ध है। इसलिए इन पर नियंत्रण के लिए ‘जैविक और घातक औजार संधि’ अस्तित्व में है, लेकिन इसके बावजूद सक्षम देश चोरी-छिपे जैविक हथियार बनाने और उनका उपयोग करने से बाज नहीं आ रहे हैं।

आम तौर पर जैविक औजारों को बनाने में उन अदृश्य सूक्ष्म जीवों का उपयोग किया जाता है, जो विभिन्न सतहों पर कई दिनों तक जीवित रहते हैं। इनके अलावा कीटाणुओं, फफूंदों और जहरीले जीव-जंतुओं एवं पेड़-पौधों से विष निकालकर भी जनसंहार किया जाता है।चूंकि ये औजार बिना किसी धमाके के कुछ दिनों बाद बीमारी के रूप में सामने आते हैं, इसलिए इनका तुरंत अंदाजा लगाना बेहद मुश्किल होता है।

 

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