इतिहास में नक्सलवाद एक
भारत की आंतरिक सुरक्षा के लंबे समय तक सबसे गंभीर और जटिल चुनौती बना रहा। 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से शुरू हुआ यह आआंदोलन धीरे धीरे हिंसक वामपंथी उग्रवाद में बदल गया और देश के अनेक राज्यों में फैल गया। एक समय ऐसा था जब यह 'रेड कॉरिडोर' नौ से अधिक राज्यों के 180 से ज्यादा जिलों तक फैला हुआ था। लेकिन आज 1 अप्रैल 2026 को यह दावा किया जा रहा है कि भारत लगभग नक्सलवाद मुक्त हो चुका है, यह बदलाव केवल सुरक्षा की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और रणनीतिक बदलाव का भी परिणाम है। इस लंबी लड़ाई में कहने को कई सरकारों ने प्रयास किए लेकिन आधे अधूरे मन से किए गए ये प्रयास सफल नहीं हो सके।
निर्णायक सफलता हाल के वर्षों में दिखाई देती है। विशेष रूप से 2014 के बाद केंद्र में आई नरेंद्र मोदी की सरकार ने नक्सलवाद को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानने के बजाय एक बहुआयामी चुनौती के रूप में देखा। इसके समाधान के लिए छह दशक की चुनौती से निर्णायक मुक्ति सुरक्षा, विकास और पुनर्वास, तीनों को समान महत्व दिया गया। गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व में केंद्र और राज्यों के बीच अभूतपूर्व समन्वय स्थापित हुआ। पहले जहां अभियान बिखरे हुए और असंगठित थे, वहीं अब सटीक खुफिया जानकारी, आधुनिक तकनीक और संयुक्त ऑपरेशनों के जरिए नक्सल नेतृत्व को सीधे निशाना बनाया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि शीर्ष माओवादी नेतृत्व का तेजी से सफाया हुआ और संगठन की रीढ़ टूट गई। यह भी सच है कि पूर्ववती सरकारों, विशेषकर कांग्रेस के नेतृत्त्व वाली सरकारों ने भी नक्सलवाद से निपटने के प्रयास किए, लेकिन उनमें निरंतरता और समन्वय की कमी अवसर देखने को मिली। कई बार शांति वार्ताओं की कोशिशें भी हुई, लेकिन वे अविश्वास के कारण सफल नहीं हो सकी।
यह भी कुछ हद तक सही ही है कि कतिपय राजनीतिक और वैचारिक समूहों ने नक्सलवाद के प्रति नरम रुख अपनाया, जिससे समस्या के समाधान में देरी हुई। हालांकि, यह भी ध्यान रखना चाहिए कि नक्सलवाद जैसी जटिल समस्या का समाधान कंवल बल प्रयोग से संभव नहीं था, इसके लिए सामाजिक-आर्थिक पहल भी जरूरी थी। मौजूदा सरकार ने इन सभी बातों का ख्याल रखते हुए इस समस्या से जंग लड़ी। वर्तमान दौर में जो सबसे बड़ा बदलाव दिखता है, वह है 'समग्र रणनीति' का प्रभाव। सुरक्षा अभियानों के साथ-साथ सड़कों, मोबाइल टावरों और बुनियादी ढांचे का तेज विकास किया गया। इससे न केवल सुरक्षा बलों की पहुंच बढ़ी, बल्कि स्थानीय आबादी का मुख्यधारा से जुड़ाव भी मजबूत हुआ। आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे हजारों नक्सलियों ने हथियार छोड़कर सामान्य जीवन अपनाया। आआंकड़े इस बदलाव की पुष्टि करते हैं। 2014 में जहां 126 जिले नक्सल प्रभावित थे, वहीं अब यह संख्या घटकर न के बराबर रह गई है।
सशस्त्र कैडर की संख्या में भी भारी गिरावट आई है। दशकों पुराने गढ़ जैसे अबूझमाड़ और पारसनाथ जैसे क्षेत्र भी अब सुरक्षा बलों के नियंत्रण में हैं। अब यह कहने में कोई गुरेज नहीं की समस्या पूरी तरह समाप्त हो गई है। नक्सलवाद केवल बंदूक की लड़ाई नहीं था, यह सामाजिक असमानता, गरीबी और विकास की कमी से भी जुड़ा रहा है। इसलिए, स्थायी समाधान के लिए जरूरी है कि सरकार विकास, शिक्षा और रोजगार के मोर्वे पर निरंतर काम करती रहे। नक्सलवाद के लगभग समाप्त होने का दावा भारत की एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। यह सुरक्षा बलों के साहस, सरकार की रणनीति और स्थानीय लोगों के सहयोग का संयुक्त परिणाम है। लेकिन इस सफलता को बनाए रखने के लिए सतत सतर्कता और समावेशी विकास ही आगे का मार्ग होगा।