India Energy Security: Oil Supply & Hormuz Strateg

कूटनीति के जरिए पेट्रोलियम आपूर्ति को रखा बरकरार

ईरान-इजरायल तनाव के बीच भारत की कूटनीति से पेट्रोलियम आपूर्ति सुरक्षित रही। होर्मुज संकट के बावजूद तेल और गैस सप्लाई स्थिर बनी रही।

By : स्वदेश डेस्क
कूटनीति के जरिए पेट्रोलियम आपूर्ति को रखा बरकरार

उमेश चतुर्वेदी

28 फरवरी कोअमेरिकी ईरान पर और इजराइली हमले के बाद पूरी दुनिया की चिंता ऊर्जा को लेकर थी। आज की दुनिया ऊर्जा के लिए जीवाश्म तेलों पर सबसे ज्यादा निर्भर है, जिसे हम पेट्रोल और डीजल के रूप में जानते हैं। इसके साथ ही प्राकृतिक गैस भी आज ऊर्जा की बड़ी स्रोत है। ईरान पर हमले के पहले बहुत लोगों ने होमुर्ज जलडमरूमध्य का नाम नहीं सुना था, लेकिन आज हर पढ़ा-लिखा और सचेत शख्स इसे जान गया है। फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित इस संकरे समुद्री रास्ते पर ईरान का कब्जा है। इसके जरिए पूरी दुनिया को आपूर्ति होने वाला बीस प्रतिशत पेट्रोलियम पदार्थ इसी रास्ते से गुजरता रहा है। 

जहां तक भारत का सवाल है तो ईरान पर हमले के पहले तक भारत आयात होने वाले कच्चे तेल के आधे हिस्से की आपूर्ति इसी रास्ते होती थी। इससे भारत की चिंताएं बढ़ना स्वाभाविक थी। लेकिन भारत ने ना सिर्फ होमुर्ज के जरिए अपनी आपूर्ति को बनाए रखने की कूटनीतिक कोशिशें जारी रखी, बल्कि वैकल्पिक रास्ते की भी तलाश तेज कर दी। भारत अपनी पेट्रोलियम जरूरतों का करीब 85 फीसद हिस्सा आयात करता है। इसका आधा हिस्सा होमुर्ज के रास्ते ही आता था। भारतीय वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार होमुर्ज के रास्ते भारत रोजाना ढाई से 2.7 मिलियन बैरल कच्चा तेल आयात करता था। लेकिन ईरान पर हमले के बाद यह घटकर इसका आधा ही रह गया है। वैसे तो होमुर्ज पर ओमान का भी दावा माना जाता है, लेकिन हकीकत में इस जलमार्ग पर पूरी तरह ईरान का दबदबा है। हमले के बाद ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड ने इस रास्ते पर ना सिर्फ निगरानी बढ़ा दी है, बल्कि सीमित आवाजाही हो ही मंजूरी दी है। भारत को इसकी आशंका थी, इसलिए उसने खाड़ी के देशों से तेल आयात के लिए वैकल्पिक मागों पर भी ध्यान देना शुरू कर दिया। 

संकट के क्षण में भले ही ईरान ने भारत के प्रति सहयोगी रूख अख्तियार कर रखा है, लेकिन भारत ने 'केप ऑफ गुड होप' यानी अफ्रीका के दक्षिण से गुजरने वाले जलमार्ग का भी उपयोग बढ़ा दिया है। इस बीच भारत ने कूटनीतिक प्रयास जारी रखा। इसका असर यह हुआ कि ईरान भारतीय जहाजों को होमुर्ज से गुजरने की अनुमति दे रहा है। एलपीजी लदा एक जहाज कोचीन आ चुका है और ऐसे ही कुछ और जहाज तेल और गैस लेकर भारत आ रहे हैं। इस बीच भारत ओमान की खाड़ी से गुजरने वाले जहाजों को अपनी नौसेना के जरिए सुरक्षा दे रहा है। भारत सरकार के अनुसार, भारतीय रिफायनरियों के पास कच्चे तेल का पर्याप्त भंडार है। इस बीच भारत ने रूस से भी कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति बढ़ा दी है। इसका असर यह हुआ है कि भारत में जिस तरह की महंगाई की आशंका थी, वैसी नहीं दिखी। हालांकि उद्योगों के लिए आपूर्ति किए जाने वाले व्यवसायिक गैस सिलेंडर की कीमतें बढ़ा दी गई हैं। तेल की बढ़ती कीमतों और व्यवसायिक गैस की आपूर्ति कम होने के चलते खाने-पीने वाली चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है। 

महानगरों में सर्वसुलभ ठेले की चाय की कीमतें डेढ़ गुनी तक बढ़ चुकी हैं। लेकिन आपूर्ति श्रृंखला जारी रहने के चलते स्थिति खराब नहीं हुई है। जबकि पड़ोसी पाकिस्तान में आधी गाड़ियों को ही सड़कों पर उतरने की अनुमति है, वहां पेट्रोल भारत के मुकाबले करीब ढाई गुनी ऊंची दर पर मिल रहा है।पश्चिम एशिया में संकट शुरू होने के बाद कूटनीति की कमान प्रधानमंत्री मोदी ने संभालते हुए युद्ध शुरू होने के महज 48 घंटों के भीतर आठ खाड़ी देशों संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कुवैत, ओमान, कतर, जार्डन, ओमान, बहरीन और इजरायल के नेताओं से बात की। इसके साथ ही उन्होंने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रां और मलयेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहीम से बात की। इस बातचीत का मकसद वैश्विक हालात पर चर्चा के साथ ही भारतीय हितों को सुनिश्चित करना भी था। इस बीच 'गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल' के महासचिव जासेम मोहम्मद अल बुदैवी से फोन पर वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने बात की है। इस बातचीत का मकसद खाड़ी देशों के इस संगठन के साथ एकजुटता प्रदर्शित करने के साथ ही भावी ऊर्जा संकट से भारत को मुक्ति दिलाने को लेकर रणनीति बनाना भी है। इसके पहले मंत्री हरदीप पुरी ने कतर की यात्रा की थी। दरअसल भारत इन देशों से भी पेट्रोलियम पदार्थों का आयात बढ़ाना चाहता है। 

भारत की कोशिश ईरान के विकल्प के रूप में अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए दूसरे देशों का भी सहयोग हासिल करने की है।भारत को अपनी खेती के लिए रासायनिक खाद की भी जरूरत पड़ती है। भारत में खाद उत्पादन के लिए पेट्रोलियम पदार्थों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है। बेशक रूस से भारत को कच्चा तेल और खाद की सामग्री मिल रही है, लेकिन भारत की कोशिश आपूर्ति को विविधरंगी बनाए रखना है। इसकी वजह यह है कि किसी एक देश पर किसी खास आयात के लिए पूरी तरह निर्भर होना भविष्य में ब्लैकमेलिंग की वजह बन सकता है। भारत के पास आज करीब साठ करोड़ का ऐसा विशाल मध्य वर्ग है, जिसकी खरीद क्षमता लगातार बढ़ रही है। ऐसे में शायद ही कोई उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादक देश ऐसा होगा, जिसे भारत की जरूरत महसूस नहीं होगी, लेकिन भारत की अपनी जरूरतें भी हैं और यहां लोकतांत्रिक व्यवस्था है। ऐसी व्यवस्था में अगर किसी चीज की गंभीर कमी होती है तो अफरा-तफरी का माहौल उत्पन्न होना आसान हो जाता है। इससे महंगाई भी बढ़ती है। महंगाई बढ़ने से लोक के बीच नाराजगी बढ़ती है और फिर यह गुस्सा राज व्यवस्था के खिलाफ आंदोलनों के रूप में मुखर होता है। तेल और ईरान संकट को देखते हुए भारत ने कूटनीतिक कार्रवाई करते हुए जिस तरह अपनी जरूरतों के लायक आपूर्ति का संतुलन बनाए रखा है, वह गौर करने लायक है।

 

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