Indian Vegetarian Diet and Climate Change

क्या भारत की थाली बचा सकती है धरती का भविष्य?

क्या भारत की पारंपरिक शाकाहारी भोजन संस्कृति जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग से निपटने में मदद कर सकती है? जानिए विशेषज्ञों के तर्क और पर्यावरणीय तथ्य।

By : स्वदेश डेस्क
क्या भारत की थाली बचा सकती है धरती का भविष्य?

Can Indian Thali Help To Save Environment

डॉ. अमित झालानी

आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरणीय संकट की चुनौती से जूझ रही है। बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़, जंगलों की आग और जैव विविधता के क्षरण ने मानव सभ्यता के सामने अस्तित्व का प्रश्न खड़ा कर दिया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5°C के भीतर नियंत्रित नहीं किया गया, तो आने वाले दशकों में इसके परिणाम और भी गंभीर हो सकते हैं। ऐसे समय में दुनिया ऊर्जा, उद्योग और परिवहन क्षेत्रों में कार्बन उत्सर्जन कम करने के उपाय खोज रही है, लेकिन एक महत्वपूर्ण क्षेत्र अक्सर चर्चा से छूट जाता है और वह है - हमारी भोजन प्रणाली।


विश्व स्तर पर मांस उत्पादन और उपभोग में पिछले कुछ दशकों के दौरान अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए पशुपालन और मांस उद्योग का विस्तार हुआ है, जिसके कारण वनों की कटाई, अत्यधिक जल उपयोग, भूमि क्षरण, वायु एवं जल प्रदूषण तथा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार पशुधन क्षेत्र वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। विशेष रूप से मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी गैसें, जो पशुपालन से बड़ी मात्रा में उत्सर्जित होती हैं, कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली तापवर्धक प्रभाव रखती हैं। 


भारत उन कुछ देशों में से है जहाँ एक बड़ी आबादी आज भी मुख्यतः पौध-आधारित भोजन पर निर्भर है। भारतीय समाज का एक बड़ा वर्ग पूर्णतः शाकाहारी है, जबकि मांसाहार करने वालों में भी अधिकांश लोग इसे दैनिक भोजन के बजाय अवसर विशेष पर ग्रहण करते हैं। केवल एक सीमित प्रतिशत जनसंख्या ही नियमित रूप से मांस-आधारित आहार पर निर्भर है। यह वैश्विक परिप्रेक्ष्य में एक अनूठी स्थिति है। वैश्विक स्तर पर उत्पन्न होने वाले अनाज का लगभग 40 प्रतिशत पशुओं के चारे के रूप में चला जाता है, जबकि अमेरिका जैसे देशों में यह अनुपात 70 प्रतिशत तक पहुँच जाता है।


भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन लगभग 2.2 टन प्रतिवर्ष है, जो वैश्विक औसत 4.8 टन के आधे से भी कम है। इसके विपरीत अमेरिका (14.4 टन), चीन (8.7 टन) और रूस (13.3 टन) जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन कहीं अधिक है। इसके अनेक कारण हैं, जिनमें भारतीय जीवनशैली की पौध-आधारित भोजन संस्कृति की महत्वपूर्ण भूमिका है। भारतीय भोजन परंपरा में दालें, अनाज, मोटे अनाज, फल, सब्जियाँ और दुग्ध उत्पाद प्रमुख स्थान रखते हैं। यह आहार न केवल पोषण की दृष्टि से संतुलित है, बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी अपेक्षाकृत कम संसाधनों की मांग करता है। अनेक अध्ययनों से संकेत मिलता है कि एक किलोग्राम मांस उत्पादन के लिए उतने ही पौध-आधारित खाद्य पदार्थों की तुलना में लगभग 15 गुना अधिक पानी और 20 गुना अधिक भूमि की आवश्यकता होती है। 


जैन, बौद्ध और वैदिक परंपराओं ने जीवन के प्रति सम्मान तथा संयमित उपभोग की संस्कृति को विकसित किया। यही कारण है भारतीय संस्कृति में भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं है, बल्कि नैतिकता, करुणा और धार्मिक मूल्यों से जुड़ा विषय भी है। दुर्भाग्यवश, वैश्वीकरण और उपभोक्तावाद के प्रभाव में भोजन संबंधी आदतों में तेजी से परिवर्तन हो रहा है। मांस की बढ़ती मांग ने औद्योगिक पशुपालन और बड़े पैमाने पर मांस उत्पादन को बढ़ावा दिया है। इसके साथ ही जल संसाधनों पर दबाव, कृषि भूमि की बढ़ती मांग और पर्यावरणीय क्षति भी बढ़ी है। 


यह प्रश्न केवल भोजन की व्यक्तिगत पसंद का नहीं है। लोकतांत्रिक समाज में प्रत्येक व्यक्ति को अपने भोजन का चुनाव करने का अधिकार है। किंतु जब किसी विकल्प का प्रभाव पर्यावरण, जल संसाधनों, जलवायु और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर पड़ता है, तब वह विषय सार्वजनिक विमर्श का भी हिस्सा बन जाता है। इसलिए भोजन संबंधी चर्चाओं को राजनीतिक विवादों से ऊपर उठाकर वैज्ञानिक तथ्यों और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व के आधार पर देखने की आवश्यकता है।


संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) तथा वैश्विक जलवायु प्रतिबद्धताओं को प्राप्त करने के लिए केवल ऊर्जा क्षेत्र का डीकार्बोनाइजेशन पर्याप्त नहीं होगा बल्कि भोजन उत्पादन के क्षेत्र में भी परिवर्तन अपेक्षित होंगे। इसका अर्थ यह नहीं है कि आमजन के भोजन चयन संबंधी अधिकारों को सीमित कर दिया जाए। आवश्यकता इस बात की है कि लोगों को वैज्ञानिक तथ्यों से अवगत कराया जाए, पौध-आधारित भोजन के पोषण संबंधी लाभों को समझाया जाए और सतत विकास के प्रति सकारात्मक वातावरण बनाया जाए। पारंपरिक भारतीय खाद्य पदार्थों तथा नवाचार-आधारित पौध-प्रोटीन विकल्पों को बढ़ावा देकर हम पर्यावरणीय दबाव को कम कर सकते हैं।


भारत के पास इस दिशा में दुनिया को देने के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। संभव है कि भविष्य में जलवायु परिवर्तन के समाधान केवल नई तकनीकों से न आएँ, बल्कि हमारी थाली में रखे भोजन से भी आएँ। यदि ऐसा होता है, तो भारत की पारंपरिक शाकाहारी जीवनशैली केवल सांस्कृतिक विरासत नहीं, बल्कि मानवता के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्ध हो सकती है।

(लेखक ऊर्जा और पर्यावरण विषय के शोधकर्ता है)

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