India Blocks China-Backed IFD at WTO Meet

 व्यापार समझौताः वैश्विक मंच पर फिर भारत-चीन आमने-सामने, भारत ने खींची स्पष्ट लकीर

राजन नीमा

By : स्वदेश डेस्क
 व्यापार समझौताः  वैश्विक मंच पर फिर भारत-चीन आमने-सामने, भारत ने खींची स्पष्ट लकीर

एक युद्ध पश्चिम एशिया में महीनों से चल रहा है, जो खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है, जिसके दुष्परिणाम भारत ना चाहते हुए भी झेल रहा है। वहीं एक और युद्ध भारत ने विश्व व्यापार संगठन के 14वें मंत्री स्तरीय सम्मेलन (एमसी14) के अंतरराष्ट्रीय मंच पर लड़ा, जो कि 26 से 29 मार्च तक कैमरून के याउंदे में आयोजित किया गया।

विश्व व्यापार संगठन की स्थापना 1995 में टैरिफ और व्यापार पर सामान्य समझौते के उत्तराधिकारी के रूप में की गई थी, जिसका उद्देश्य नियमों पर आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रणाली का निर्माण करना, व्यापार समझौतों पर बातचीत करना, विवादों को सुलझाना और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने के लिए एक मंच प्रदान करना था।

परंतु आज के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इसके मूल सिद्धांत खंडित होते नजर आ रहे हैं। बहुपक्षीय मंच प्रभुत्वशाली आर्थिक शक्तियों के हाथों एक साधन बनकर रह गए हैं, जहां वे सामूहिक हितों की कीमत पर अपने संकीर्ण राष्ट्रीय एजेंडे को आगे बढ़ाते हैं, जिसका खामियाजा भारत और अन्य विकासशील देशों को भुगतना पड़ता है।

इसमें इस साल का एक महत्वपूर्ण मुद्दा चीन द्वारा प्रायोजित ‘विकास के लिए निवेश सुविधा’ (आईएफडी) रहा, जो एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जिसे 2017 में चीन और कुछ अन्य देशों ने पेश किया था। इसका मुख्य उद्देश्य देशों के बीच विदेशी निवेश (एफडीआई) की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, तेज और आसान बनाना है, जिसे 128 देशों का समर्थन प्राप्त है।

इसके तहत देशों को अपने निवेश से जुड़े कानून सार्वजनिक करने होंगे और ‘सिंगल विंडो सिस्टम’ जैसे इंतजाम करने होंगे, ताकि विदेशी कंपनियों को मंजूरी के लिए बार-बार भटकना न पड़े। यानी कुल मिलाकर निवेश से जुड़े फैसलों और प्रक्रियाओं को सरल और व्यवस्थित बनाना इसका लक्ष्य है।

लेकिन इसे महज़ एक समझौता मान लेना भूल होगी। इसके पीछे चीन की एक सामरिक चाल है। चीन ने इस संगठन को कुशलतापूर्वक सरकारी स्वामित्व वाले उद्यमों को सब्सिडी देने, वैश्विक बाजारों को लागत से कम कीमत वाले निर्यात से भरने और अपने घरेलू उद्योगों को वास्तविक प्रतिस्पर्धा से बचाने के मंच में बदल दिया है।

इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 1995 से 2023 के बीच चीन को विश्व स्तर पर चौंका देने वाली 1,614 एंटी-डंपिंग जांचों का सामना करना पड़ा है, जो किसी भी सदस्य देश के मुकाबले सबसे अधिक है। यह सब्सिडी वाले निर्यात और बाजार विकृतियों को लेकर व्यापक चिंताओं को दर्शाता है।

चीन विश्व व्यापार संगठन के नियमों का दिखावटी पालन करते हुए ‘मेड इन चाइना 2025’ और बेल्ट एंड रोड जैसी योजनाओं को आगे बढ़ा रहा है। इसके पहले अमेरिका और अब चीन व्यापार का शस्त्रीकरण अंतरराष्ट्रीय मंचों के माध्यम से करता दिखाई दे रहा है।

रिसर्च एंड इंफॉर्मेशन सिस्टम (आरआईएस) की रिपोर्ट के अनुसार, आईएफडी का समर्थन करने वाले 128 देशों में से तीन-चौथाई देश चीन की ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (बीआरआई) के सदस्य हैं, जिसमें भारत के पड़ोसी देश भी शामिल हैं। कई देश जैसे श्रीलंका, पाकिस्तान और अंगोला चीन के कर्ज के जाल में इस कदर फंस चुके हैं कि इन देशों की जीडीपी का पचास फीसदी हिस्सा तक चीन से लिए गए भारी कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है।

आईएफडी लागू होने से देशों के लिए विदेशी निवेश पर अपने हिसाब से नियम बनाना मुश्किल हो जाएगा। पहले ही चीन ट्रिलियन डॉलर से अधिक का कर्ज दे चुका है, जो अक्सर अपारदर्शी शर्तों, गैर-पारदर्शी प्रक्रियाओं और ऊंची ब्याज दरों के साथ आता है। इससे कर्ज लेने वाले देश धीरे-धीरे एक ऐसे आर्थिक संकट के चक्र में फंस जाते हैं, जिससे बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। खासकर गरीब देशों के पास इतनी ताकत नहीं होती कि वे बाहरी दबाव से खुद को बचा सकें, इसलिए उनके फैसले लेने की संप्रभुता भी प्रभावित हो सकती है।

साथ ही भारत के ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ जैसे कार्यक्रमों के तहत घरेलू उद्योगों को दी जाने वाली वरीयता भी खतरे में पड़ सकती है और भविष्य में कोई भी विदेशी कंपनी भारत की नीतियों को डब्ल्यूटीओ में चुनौती दे सकती है।

वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए दृढ़ रुख अपनाया और चीन समर्थित आईएफडी एजेंडा को विश्व व्यापार संगठन के ढांचे में बहुपक्षीय समझौते के रूप में शामिल करने के प्रयासों को विफल कर दिया।

उन्होंने तर्क दिया कि प्रस्तावित आईएफडी को शामिल करना विश्व व्यापार संगठन की आम सहमति से फैसले लेने की प्रक्रिया को कमजोर करता है, जो इसकी नीति निर्माण की सबसे अहम पहचान है। यह मूल मराकेश समझौते का उल्लंघन करता है और यह एक गैर-व्यापारिक मुद्दा है। साथ ही उन्होंने कहा कि सबसे पहले उन मुद्दों को हल करना चाहिए, जो लंबे समय से लंबित हैं, जैसे कि विश्व व्यापार संगठन सुधार एजेंडा के तहत व्यापक चर्चा और रचनात्मक जुड़ाव।

अमेरिका के प्रभाव के कम होने के बाद विश्व व्यापार संगठन में भारत की भूमिका अधिक मजबूत होकर उभरी है। साथ ही भारत की छवि ‘ग्लोबल साउथ’ के एक जिम्मेदार नेतृत्व के रूप में निखर रही है, जो छोटे और विकासशील देशों के हितों की आवाज उठाता है।

संभव है कि भारत इस मुद्दे पर एक तरह की ‘बर्गेनिंग’ (सौदेबाज़ी) की रणनीति अपना रहा है। यानी आईएफडी जैसे प्रस्तावों पर अपने रुख के बदले भारत खाद्य सुरक्षा के लिए सार्वजनिक भंडारण पर स्थायी समाधान हासिल करना चाहता है। यह भारत के लिए इसलिए अहम है क्योंकि प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना जैसी योजनाएं इसी व्यवस्था पर निर्भर करती हैं।

बहरहाल, उद्देश्य चाहे चीन की विस्तारवादी नीति को संतुलित करना हो, सार्वजनिक भंडारण (स्टॉक पाइलिंग) पर स्थायी समाधान हासिल करना हो या विश्व व्यापार संगठन में सुधार एजेंडा को आगे बढ़ाना भारत ने एक ही कदम से कई लक्ष्य साध लिए हैं।

(लेखक राजन नीमा मीडिया एवं जनसंपर्क समन्वयक हैं)

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