Ceasefire Not Victory: Iran-US War Analysis

हार-जीत नहीं, है संघर्ष विराम

ईरान-अमेरिका-इजराइल संघर्ष पर 40 दिन बाद संघर्ष विराम। विशेषज्ञों के अनुसार यह जीत नहीं, बल्कि दबाव में लिया गया फैसला है, जिसके असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीति पर पड़े।

By : स्वदेश डेस्क
हार-जीत नहीं, है संघर्ष विराम

राज कुमार सिंह

खुद को विश्व शांति और स्थिरता का ठेकेदार समझने वालों को संघर्ष विराम की जरूरत समझने में 40 दिन लग गए। इस अवधि में दिखाई पड़े तबाही के मंजरों के मद्देनजर कोई भी समझदार व्यक्ति संघर्ष विराम का स्वागत ही करेगा, लेकिन फिर भी यह सवाल अनुत्तरित है कि आखिर इस युद्ध से हासिल क्या हुआ?15 दिनों के लिए घोषित संघर्ष विराम के बीच अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधि पाकिस्तान में उन शर्तों पर बातचीत करेंगे, जिन पर सहमति के बाद इस युद्ध का अंत हो जाएगा। याद रहे कि 28 फरवरी को इजराइल और अमेरिका के ईरान पर अचानक हमलों के बाद छिड़ी जंग से पहले भी संबंधित पक्ष बातचीत ही कर रहे थे। 26 फरवरी को जेनेवा में हुई बातचीत में कई मुद्दों पर सहमति बन गई थी, लेकिन वार्ता के अगले दौर से पहले ही ईरान पर हमले शुरू हो गए।

जाहिर है, ईरान की ओर से भी जवाबी हमले होने ही थे। परिणामस्वरूप न सिर्फ ये तीन देश, बल्कि खाड़ी के सभी देश जंग के बीच तबाही झेलते रहे, जिसकी मार ऊर्जा संकट और महंगाई के रूप में शेष विश्व को भी झेलनी पड़ी। समझना मुश्किल नहीं होना चाहिए कि अगर संबंधित पक्षों ने पहले ही संघर्ष के बजाय संवाद के जरिए समाधान खोजा होता, तो इस तबाही से बचा जा सकता था। युद्ध के बीच अपनी-अपनी जीत के दावे करते हुए भी ईरान और अमेरिका का अचानक संघर्ष विराम पर सहमत हो जाना बताता है कि जमीनी हकीकत क्या रही होगी।यह स्पष्ट है कि ईरान पर हमलों के मूल में इजराइल का युद्धोन्माद रहा, लेकिन उसकी अगुआई अमेरिका ही करता नजर आया। अपने दूसरे राष्ट्रपतिकाल के पहले ही साल में आठ संघर्ष विराम करवाने का दावा करते हुए शांति का नोबेल मांगने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इन 40 दिनों में ‘बर्बादी के बादशाह’ ज्यादा नजर आए।सत्ता परिवर्तन के घोषित उद्देश्य के साथ किसी दूसरे देश पर हमले करना कम-से-कम लोकतांत्रिक सोच तो नहीं मानी जा सकती, लेकिन विश्व का सबसे पुराना लोकतंत्र माने जाने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने ऐसा कर दिखाया। तर्क दिया जा सकता है कि जो व्यक्ति सेना भेजकर वेनेजुएला से उसके राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को सपत्नीक उठवा चुका हो, उसके लोकतांत्रिक होने की गलतफहमी नहीं पालनी चाहिए।

तर्क निराधार नहीं है, पर सच यह भी है कि अगर वेनेजुएला प्रकरण में अन्य देशों ने अपनी वैश्विक जिम्मेदारी का अहसास करते हुए कड़ी प्रतिक्रिया की होती, तो शायद पश्चिम एशिया को 40 दिन की यह युद्ध विभीषिका नहीं झेलनी पड़ती, जिसकी तपिश दूरदराज के देशों ने भी महसूस की।दरअसल, दूसरे राष्ट्रपतिकाल की शुरुआत से ही ट्रंप प्रवासियों और टैरिफ जैसे मुद्दों पर वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देते नजर आ रहे हैं। आसन्न खतरों को शेष विश्व को समय रहते समझकर अमेरिकी दादागिरी को नियंत्रित करने के लिए कूटनीतिक दबाव बनाना चाहिए था, लेकिन ज्यादातर देश अपने-अपने हितों से संचालित होकर चुप रहे।चंद दिनों में ईरान को तबाह कर विजेता बनकर निकलने के मंसूबे के साथ हमले करने वाले ट्रंप को संघर्ष विराम की जरूरत का अहसास कराने में भी अब विश्व समुदाय की बड़ी भूमिका रही है। लंबे खिंचते युद्ध से तबाही और उसकी तपिश महसूस कर इस बार अमेरिका के उन परंपरागत मित्र देशों ने भी उसका साथ देने से इनकार कर दिया, जिन्हें ट्रंप अपने साथ ही मानते रहे।अमेरिका के साम्राज्यवादी और भोगवादी चरित्र के बावजूद वहां के नागरिकों ने भी सड़कों पर उतरकर ट्रंप के इस युद्धोन्माद का विरोध किया। इसी साल होने वाले मध्यावधि चुनावों के मद्देनजर विरोधी डेमोक्रेट्स को कारगर मुद्दा मिल गया, तो रिपब्लिकन भी अपने राष्ट्रपति की नीतियों के राजनीतिक खतरे महसूस करने लगे।

कहना नहीं होगा कि इन चौतरफा दबावों के बीच संघर्ष की राह तलाशते हुए भी ट्रंप अपने अहंकारी कारोबारी चरित्र से बाज नहीं आए। सप्ताहांत में युद्ध समाप्ति की भविष्यवाणी से बाजार में गिरावट और फिर सप्ताह की शुरुआत में तनाव बढ़ाकर अपने करीबियों को शेयर बाजार से मुनाफा दिलाने के आरोप अमेरिकी मीडिया में चर्चा में हैं।कभी ट्रंप स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने पर अमेरिका को बेपरवाह बताते हुए अन्य देशों पर उसे खुलवाने का दबाव बनाते दिखे, तो कभी 48 घंटे में इसे न खोलने पर ईरान को पाषाण युग में पहुंचाने की धमकी देते नजर आए। कभी चार दिन का अल्टीमेटम देकर उसे 10 दिन तक बढ़ाया गया, तो कभी फिर ईरानी सभ्यता के अंत की बात कही गई।

जाहिर है, किसी जिम्मेदार लोकतांत्रिक देश के राष्ट्रपति से ऐसा आचरण अपेक्षित नहीं है, लेकिन यही हमारे समय का यथार्थ है। अनेक बार हमले के लक्ष्य हासिल कर लेने और ईरान का सैन्य ही नहीं, शासकीय ढांचा भी नष्ट करने के दावे करने वाले ट्रंप अगर अब 40 दिनों बाद 15 दिनों के संघर्ष विराम पर सहमत हो गए हैं, तो उसकी सफलता को लेकर आश्वस्त होना आसान नहीं है।ध्यान रहे कि पिछले साल भी ऐसा संघर्ष विराम हुआ था और इस साल भी संवाद के जरिए समाधान की कोशिशों के बीच ईरान पर हमला किया गया। इस संघर्ष विराम की सफलता पर संदेह के अन्य दो बड़े कारण शर्तें और मध्यस्थता कराने वाला देश हैं।ईरान ने संघर्ष विराम को युद्ध की समाप्ति में बदलने के लिए जो 10 शर्तें रखी हैं, उन्हें मान लेना अमेरिका द्वारा हार स्वीकार करने जैसा होगा। आदत के मुताबिक ट्रंप ने अपनी जीत का दावा करते हुए भी ईरान की शर्तों का खंडन नहीं किया है।

इजरायल ने लेबनान में संघर्ष विराम लागू करने से इनकार किया है, जबकि मध्यस्थता कर रहा पाकिस्तान कह रहा है कि संघर्ष विराम के दायरे में लेबनान भी शामिल है। बेशक कर्ज के जाल में फंसा और खस्ता अर्थव्यवस्था वाला पाकिस्तान लंबे समय से मध्य पूर्व की इस स्थिति में अवसर तलाश रहा था, लेकिन मध्यस्थता के लिए सबसे जरूरी चीज होती है विश्वसनीयता, जो उसके पास सीमित है।ऐसे में यह सवाल उठता है कि ईरानी सभ्यता के अंत के अल्टीमेटम की समयसीमा समाप्त होने से ठीक पहले हुए इस संघर्ष विराम में क्या पाकिस्तान केवल एक मुखौटा है और असली भूमिका किसी अन्य शक्ति ने निभाई है?

 

संबंधित सामग्री

भोपाल में कल BJP की लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ विशाल पदयात्रा, राजनाथ की जगह JP नड्डा करेंगे शुभारंभ

भोपाल में कल BJP की लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ विशाल पदयात्रा, राजनाथ की जगह JP नड्डा करेंगे शुभारंभ

भोपाल में 4 नवंबर को भाजपा की पदयात्रा निकलेगी। राजनाथ सिंह की जगह अब जेपी नड्डा इसका शुभारंभ करेंगे। अटल पथ पर तैयारियां तेज हैं।

Nov 03, 2026
MP Promotion Hold: एमपी के सरकारी कॉलेजों में 500 सहायक प्राध्यापकों का प्रमोशन अटका, तीन साल से फाइल लटकी

MP Promotion Hold: एमपी के सरकारी कॉलेजों में 500 सहायक प्राध्यापकों का प्रमोशन अटका, तीन साल से फाइल लटकी

एमपी के सरकारी कॉलेजों में 2004 और 2005 में भर्ती करीब 500 सहायक प्राध्यापकों का प्रमोशन अटका है। प्राध्यापक संघ ने अपर मुख्य सचिव को पत्र लिखकर जल्द निपटारा मांगा है।

Nov 03, 2026
संघ ने राजनारायण बसु की 200वीं जयंती पर किया याद, स्वदेशी और सामाजिक सुधार के अग्रदूत को श्रद्धांजलि अर्पित की

संघ ने राजनारायण बसु की 200वीं जयंती पर किया याद, स्वदेशी और सामाजिक सुधार के अग्रदूत को श्रद्धांजलि अर्पित की

आरएसएस ने स्वदेशी और सामाजिक सुधार के अग्रदूत राजनारायण बसु की 200वीं जयंती पर उन्हें याद किया। इंदौर बैठक में सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने बयान जारी किया।

Nov 03, 2026
वनडे वर्ल्ड कप 2027 में भारत पाकिस्तान मैच के 34 हजार टिकटों के लिए 84 लाख से ज्यादा आवेदन आए हैं। फाइनल के 79 लाख आवेदन

वनडे वर्ल्ड कप 2027 में भारत पाकिस्तान मैच के 34 हजार टिकटों के लिए 84 लाख से ज्यादा आवेदन आए हैं। फाइनल के 79 लाख आवेदन

वनडे वर्ल्ड कप 2027 में भारत पाकिस्तान मैच के 34 हजार टिकटों के लिए 84 लाख से ज्यादा आवेदन आए हैं। फाइनल के 79 लाख आवेदनों से भी यह मांग ज्यादा है।

Nov 03, 2026
Digital Arrest: जांजगीर में डिजिटल अरेस्ट के नाम पर बुजुर्ग से 32 लाख की ठगी, इंदौर से दो आरोपी गिरफ्तार

Digital Arrest: जांजगीर में डिजिटल अरेस्ट के नाम पर बुजुर्ग से 32 लाख की ठगी, इंदौर से दो आरोपी गिरफ्तार

जांजगीर में सीबीआई अफसर बनकर बुजुर्ग को डिजिटल अरेस्ट करने और 32 लाख ठगने के मामले में पुलिस ने इंदौर से दो आरोपी पकड़े हैं। एक आरोपी पहले पंजाब से पकड़ाया था।

Nov 03, 2026