Karnataka Politics: Siddaramaiah vs DK Shivakumar

कर्नाटक के नीतीश बनेंगे सिद्धारमैया, लेकिन कौन बनेगा सम्राट

कर्नाटक में कांग्रेस नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाओं के बीच सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच सत्ता संघर्ष तेज माना जा रहा है। क्या कांग्रेस बिहार मॉडल अपनाएगी?

By : स्वदेश डेस्क
कर्नाटक के नीतीश बनेंगे सिद्धारमैया, लेकिन कौन बनेगा सम्राट

उमेश चतुर्वेदी

समंदर की सतह ऊपर से कई बार शांत दिखती है, लेकिन सतह के भीतर कई बार हलचलें तेज होती हैं। आज के दौर की राजनीति में भी कई बार ऐसा ही नजर आता है। कर्नाटक की सत्ताधारी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का आधिकारिक बयान सतह पर शांति का संकेत देता है, लेकिन अंदरखाने में जारी खींचतान से संभव है कि जब तक आप इसे पढ़ रहे हों, कर्नाटक की राजनीति बदल चुकी हो।कांग्रेस संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने भले ही आधिकारिक तौर पर कह दिया हो कि राज्य में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर कोई चर्चा नहीं हो रही, लेकिन हकीकत यह है कि पार्टी आलाकमान ने सिद्धारमैया को हटाने का मन बना लिया है।

कर्नाटक में “मैसूर बॉय” के रूप में मशहूर रहे सिद्धारमैया जीवन के आठवें दशक में हैं। सालभर बाद वे अस्सी की उम्र पार कर चुके होंगे। वैसे भी कर्नाटक में 1985 के बाद कोई सरकार सत्ता में वापसी नहीं कर पाई है। अब कांग्रेस को लगता है कि यदि उसे इस इतिहास चक्र को तोड़ना है, तो उसे सिद्धारमैया को हटाकर पार्टी के भरोसेमंद और उनकी तुलना में युवा चेहरे डीके शिवकुमार को सत्ता सौंपनी होगी।इसके लिए पार्टी ने सिद्धारमैया को सम्मानजनक विदाई का प्रस्ताव दिया है। उन्हें राज्यसभा भेजकर सदन में विपक्ष का उपनेता बनाने का प्रस्ताव है। साथ ही, भावी डीके शिवकुमार सरकार में उनके बेटे यतींद्र सिद्धारमैया को शामिल करने की भी चर्चा है। ठीक उसी तरह, जैसे बिहार में नीतीश कुमार को राज्यसभा भेजा गया और उनके बेटे निशांत को सम्राट सरकार में शामिल किया गया।

भारतीय जनता पार्टी के लिए दक्षिण भारत के राज्य अब भी चुनौती बने हुए हैं। दक्षिण में कर्नाटक ही अकेला ऐसा राज्य है, जहां भाजपा अपना परचम लहराती रही है। इस लिहाज से कर्नाटक भाजपा के लिए दक्षिण का दुर्ग ही नहीं, बल्कि दक्षिण के चक्रव्यूह को तोड़ने का मुख्य द्वार भी है।2028 के विधानसभा चुनावों में वापसी और दक्षिण में अपनी मजबूत पैठ बनाने की कोशिश में भाजपा अभी से जुट गई है। लेकिन इसके विपरीत कांग्रेस अपने घर के झगड़े तक ठीक से सुलझा नहीं पा रही है।मई 2023 में सत्ता में वापसी के समय कांग्रेस में तय हुआ था कि सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच ढाई-ढाई साल के लिए सत्ता का बंटवारा होगा। लेकिन जब ढाई साल की मियाद पूरी हुई, तो सिद्धारमैया ने कुछ वैसे ही सत्ता छोड़ने से इनकार कर दिया, जैसे पिछली सदी में भाजपा के लिए मायावती ने उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री पद छोड़ने में आनाकानी की थी।

कांग्रेस ने नवंबर 2018 के चुनावों के बाद छत्तीसगढ़ में भी ऐसा ही फॉर्मूला बनाया था, जिसमें भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव के बीच ढाई-ढाई साल के लिए सत्ता का बंटवारा होना था। लेकिन भूपेश बघेल ने भी सत्ता छोड़ने से इनकार कर दिया। सत्ता बचाने के लिए उन्होंने, बताया जाता है कि, प्रियंका गांधी तक अपनी पहुंच मजबूत की। परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस में आंतरिक कलह बढ़ी और 2023 के विधानसभा चुनावों में पार्टी उम्मीदों के विपरीत प्रदर्शन कर बैठी। राष्ट्रीय स्तर पर अपनी वापसी के लिए कांग्रेस के लिए जरूरी है कि जिन राज्यों की सत्ता उसके पास है, उन्हें बचाए रखे। कर्नाटक में सत्ता बनाए रखने की पहली शर्त है गुटबाजी खत्म करना। लेकिन जिस तरह सिद्धारमैया अड़े रहे, उससे नेतृत्व परिवर्तन आसान नहीं दिख रहा था।हालांकि डीके शिवकुमार पूरी शिद्दत से सत्ता संभालने की जुगत में जुटे हुए हैं। शिवकुमार कांग्रेस के संकटमोचक माने जाते हैं। पार्टी पर जब भी कहीं संकट आया, उन्होंने आगे बढ़कर उसे संभालने की कोशिश की और ज्यादातर मामलों में सफल भी रहे। इसलिए कांग्रेस भी चाहती है कि सिद्धारमैया की जगह उन्हें मौका देकर अपने भविष्य को सुरक्षित करे।

भारतीय लोकदल के बैनर तले समाजवादी राजनीति शुरू करने वाले सिद्धारमैया बाद में जनता दल के बड़े युवा नेताओं में गिने जाने लगे। शुरुआती दौर में वे रामकृष्ण हेगड़े के करीबी रहे और बाद में चंद्रशेखर के भी नजदीक माने गए।जनता दल के स्वर्णिम दौर में उसके तीन युवा नेताओं की खास पहचान थी। उनमें से दो दक्षिण भारत से थे और तीसरे उत्तर भारत से। यह संयोग ही है कि दो नेता कर्नाटक से थे। इनमें से एमपी प्रकाश अब इस दुनिया में नहीं हैं, जबकि सिद्धारमैया हेगड़े, चंद्रशेखर और एचडी देवेगौड़ा के दौर से गुजरते हुए 2006 में कांग्रेस में शामिल हुए। तीसरे नेता मोहन प्रकाश भी कांग्रेस में ही हैं।जनता दल की जेएच पटेल और कांग्रेस की धर्म सिंह सरकार में उपमुख्यमंत्री रह चुके सिद्धारमैया राज्य की पिछड़ी कुरबा जाति से आते हैं। उनके कांग्रेस में आने के बाद राज्य के पिछड़े वोटरों में पार्टी की पकड़ मजबूत हुई। कांग्रेस आज कर्नाटक की सत्ता में है, तो उसमें सिद्धारमैया की भी बड़ी भूमिका है।

यह भी संयोग ही है कि हाल ही में बिहार की सत्ता से विदा हुए नीतीश कुमार भी जनता दल के युवा चेहरे रहे हैं। हालांकि यह अब तक स्पष्ट नहीं हो पाया है कि बिहार की सत्ता से वे स्वयं हटे या भाजपा के दबाव में उन्हें पद छोड़ना पड़ा। आम धारणा है कि 2025 के विधानसभा चुनावों में ही भाजपा और नीतीश के बीच सत्ता हस्तांतरण की समझ बन चुकी थी।इसके मुकाबले कर्नाटक में कांग्रेस ने खुलकर यह समझ बनाई थी कि सत्ता का बंटवारा सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच होगा। लेकिन राजनीति में कई बार ऐसे भरोसे बाद में टूट जाते हैं या फिर सत्ताधारी द्वारा तोड़ दिए जाते हैं।ऐसा राजस्थान में भी हुआ, जब सचिन पायलट की स्वाभाविक सत्ता की चाहत को अशोक गहलोत ने रोक दिया। पार्टी आलाकमान देखता रह गया। इसकी कीमत अगले चुनाव में कांग्रेस को हार के रूप में चुकानी पड़ी।सिद्धारमैया फिलहाल नीतीश की राह पर चलते नहीं दिख रहे, जबकि कांग्रेस उन्हें उसी राह पर लाने की तैयारी में है। अंदरखाने की खबरें हैं कि उन्हें सत्ता से सम्मानजनक निकास देने की तैयारी चल रही है। यह राह उन्हें राज्यसभा भेजने और संगठन में बड़ी जिम्मेदारी देने की बताई जा रही है।

ठीक वैसे ही, जैसे नीतीश कुमार को राज्यसभा भेजा गया। फर्क सिर्फ इतना है कि नीतीश मान गए थे, लेकिन सिद्धारमैया अभी मानते नहीं दिख रहे। नीतीश जाते-जाते ऐसा राजनीतिक समीकरण बना गए कि भाजपा की अपनी पसंद के नेता की बजाय सम्राट चौधरी को आगे कर सत्ता उनके हाथ में पहुंच गई।अब सवाल यही है कि क्या सिद्धारमैया ने भी अपने लिए कोई “सम्राट” खोज लिया है, जिसे वे आखिरी दौर में आगे कर देंगे, या फिर डीके शिवकुमार को ही सत्ता मिलेगी? कांग्रेस आलाकमान जिस तरह हाल के वर्षों में अपने क्षेत्रीय क्षत्रपों के सामने झुकता दिखा है, उससे संभावना कम ही दिखती है कि वह डीके शिवकुमार के पक्ष में मजबूती से खड़ा हो पाएगा।चूंकि कर्नाटक के “नीतीश” यानी सिद्धारमैया की विदाई लगभग तय मानी जा रही है, इसलिए अब देखना दिलचस्प होगा कि कर्नाटक को कोई नया “सम्राट” मिलता है या फिर डीके शिवकुमार को ही “हाथ” का पूरा साथ मिलता है।

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