रामचरितमानस में म‌करसंक्रांति

रामचरितमानस में म‌करसंक्रांति

अवधेश त्रिपाठी

By : Swadesh Bhopal
रामचरितमानस में म‌करसंक्रांति

बालकाण्ड में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं 

माघ मकरगत रबि जब होई।

तीरथपतिहिं आव सब कोई।

देव दनुज किंनर नर श्रेनीं।

सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं॥

भावार्थ:-माघ में जब सूर्य मकर राशि पर जाते हैं, तब सब लोग तीर्थराज प्रयाग को आते हैं। देवता, दैत्य, किन्नर और मनुष्यों के समूह सब आदरपूर्वक त्रिवेणी में स्नान करते हैं।

तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा।

जाहिं जे मज्जन तीरथराजा।।

मज्जहिं प्रात समेत उछाहा।

कहहिं परसपर हरि गुन गाहा।।

भावार्थ:-तीर्थराज प्रयाग में जो स्नान करने जाते हैं, उन ऋषि-मुनियों का समाज वहाँ (भरद्वाज के आश्रम में) जुटता है। प्रातःकाल सब उत्साहपूर्वक स्नान करते हैं और फिर परस्पर भगवान्‌ के गुणों की कथाएँ कहते हैं।

ब्रह्म निरूपन धरम बिधि बरनहिं तत्त्व बिभाग।

कहहिं भगति भगवंत कै संजुत ग्यान बिराग॥

भावार्थ:-ब्रह्म का निरूपण, धर्म का विधान और तत्त्वों के विभाग का वर्णन करते हैं तथा ज्ञान-वैराग्य से युक्त भगवान्‌ की भक्ति का कथन करते हैं।

उपरोक्त वर्णन में तीन बातें विचारणीय लगती हैं -

1. संक्रांतिकाल

2. पवित्र होना (प्रयागराज में त्रिवेणी स्नान), और

3. चिन्तन

यहाँ पर जीवन के भूत, वर्तमान और भविष्य का समग्रता से विचार किया गया है। मकर संक्रांति का प्राकृतिक महत्व सूर्य के दक्षिणायण से उत्तरायण होने से है। जबकि संक्रमण (संक्रांति) काल मूल्यों में होने वाले परिवर्तन का काल है। परिवर्तन का आधार महज पुराने को त्याग कर नवीन को ग्रहण करने में नहीं है। परिवर्तन का महत्व निकृष्ट को त्याग कर श्रेष्ठ के वरण में है। और इसके लिए छोड़ना - पवित्र होना - विचारना - ग्रहण करना की प्रक्रिया से गुजरना होता है।

प्रयागराज में त्रिवेणी का संगम है। यमुना, सूर्यपुत्री और यम (यमराज) एवं शनिदेव की बहिन है। यम और शनि को दण्ड देने वाले ग्रह माना जाता है। यमुना स्नान, पिछली गलतियों से छुटकारा पाने (छोड़ने) का प्रतीक है। यमुना के लिए "सर्वलोकस्य जननी देवी त्वं पापनाशिनी" कहा गया है। 'विष्णुपगा' गंगा, समस्त कलुष को धोकर पवित्र करती है। जबकि लुप्त हो चुकी सरस्वती को मस्तिष्क में जाग्रत कर विवेक को जगाने का प्रयास है। इसीलिए मकर संक्रांति के दिन त्रिवेणी स्नान का महत्व है।

त्रिवेणी स्नान कर निर्मल हुआ व्यक्ति विद्वानों के साथ सत्संग द्वारा ब्रह्म का निरूपण (जगत को ब्रह्ममय देखना अर्थात् समष्टि का विचार), धर्म (कर्तव्य) का विधान और तत्त्वों (सत्य) के विभाग का वर्णन करते हैं तथा ज्ञान-वैराग्य (यथार्थ को जानकर मिथ्या का त्याग) से युक्त भगवान्‌ की भक्ति (कर्तव्य के प्रति समर्पण) का कथन करते हैं।

पर्वों की प्रतीकात्मकता का विचार कर आचरण ही महत्वपूर्ण है, न कि उन्हें परम्परा के नाम पर बोझ की तरह ढोते जाना।

  

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