जब पतंगों की डोर बन जाए मौत का फंदा

जब पतंगों की डोर बन जाए मौत का फंदा

By : Swadesh Bhopal
जब पतंगों की डोर बन जाए मौत का फंदा

मकर संक्रांति भारतीय लोक-परंपराओं का ऐसा पर्व है, जो प्रकृति, आस्था और सामाजिक उल्लास को एक सूत्र में पिरोता है। तिल-गुड़ की मिठास, स्नान-दान की परंपरा और खुले आसमान में उड़ती रंग-बिरंगी पतंगें इस पर्व की पहचान हैं। लेकिन बीते कुछ वर्षों से, और विशेषकर इस वर्ष, मकर संक्रांति की खुशियों पर एक काली छाया साफ दिखाई देने लगी है चीनी मांझा। यह वही पर्व है, जो कभी सौहार्द और आनंद का प्रतीक था, लेकिन आज वही कई परिवारों के लिए दर्द, आंसू और मौत का कारण बनता जा रहा है।

चीनी मांझा, जिसे प्रतिबंधित किया जा चुका है, अब केवल पतंग उड़ाने का साधन नहीं रहा, बल्कि यह एक जानलेवा हथियार में बदल चुका है। मध्यप्रदेश के इंदौर, उज्जैन और रीवा से लेकर उत्तरप्रदेश और कर्नाटक तक, देश के अलग-अलग हिस्सों से आई घटनाएं बताती हैं कि यह समस्या किसी एक राज्य या शहर तक सीमित नहीं है। गले कटने, चेहरे पर गंभीर चोटें आने और यहां तक कि मौत की खबरें यह साबित करती हैं कि यह सिर्फ ‘दुर्घटना’ नहीं, बल्कि सामूहिक लापरवाही और प्रशासनिक ढिलाई का परिणाम है।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि प्रतिबंध के बावजूद चीनी मांझे की खुलेआम बिक्री और उपयोग जारी है। सवाल उठता है कि जब कानून मौजूद है, तो उसका प्रभाव जमीन पर क्यों नहीं दिखता? क्या त्योहारों के दौरान विशेष निगरानी की आवश्यकता नहीं होती? क्या प्रशासन की जिम्मेदारी केवल आदेश जारी करने तक सीमित रहनी चाहिए? सच्चाई यह है कि जब तक सख्त कार्रवाई, नियमित छापेमारी और उदाहरणात्मक दंड नहीं होंगे, तब तक इस समस्या पर अंकुश लगाना कठिन है।

लेकिन केवल प्रशासन को दोष देना भी पर्याप्त नहीं होगा। समाज और नागरिकों की भूमिका इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। परंपरा के नाम पर अगर हम दूसरों की जान जोखिम में डालते हैं, तो यह परंपरा नहीं, बल्कि संवेदनहीनता है। पतंग उड़ाना कोई अपराध नहीं है, लेकिन ऐसी सामग्री का उपयोग करना, जो किसी की जान ले सकती है, निश्चित रूप से अपराध की श्रेणी में आता है।

हमें यह समझना होगा कि आनंद और आस्था तभी सार्थक हैं, जब वे सुरक्षित हों। रीवा में एक किशोर की मौत यह याद दिलाती है कि खतरा केवल मांझे तक सीमित नहीं है। बिजली की हाईटेंशन लाइनों के पास पतंग उड़ाना भी उतना ही जानलेवा है। यह घटना बताती है कि जागरूकता की कमी कितनी भयावह साबित हो सकती है। बच्चों से लेकर बड़ों तक, सभी को यह समझाने की जरूरत है कि उत्सव का उल्लास लापरवाही में नहीं बदलना चाहिए।

समाधान केवल प्रतिबंध या चेतावनी में नहीं है, बल्कि व्यापक जन-जागरूकता में है। स्कूलों, कॉलोनियों, सामाजिक संगठनों और मीडिया के माध्यम से यह संदेश पहुंचाया जाना चाहिए कि चीनी मांझा क्यों खतरनाक है और इसके क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं। पर्यावरण के अनुकूल और सुरक्षित सूती धागे को बढ़ावा देना, सामूहिक पतंगबाजी के लिए सुरक्षित स्थान तय करना और त्योहारों के दौरान आपात चिकित्सा व्यवस्था को मजबूत करना भी जरूरी कदम हैं।

मकर संक्रांति जैसे लोकपर्व हमें प्रकृति के साथ संतुलन और समाज के साथ सह-अस्तित्व का संदेश देते हैं। यदि वही पर्व मौत और मातम का कारण बनने लगें, तो यह पूरे समाज के लिए आत्ममंथन का विषय है। परंपराएं बचनी चाहिए, लेकिन समय के साथ उनमें जिम्मेदारी और जागरूकता का समावेश भी उतना ही आवश्यक है। तभी पतंगें फिर से खुशियों का संदेशवाहक बनेंगी, न कि किसी की जिंदगी की आखिरी डोर।

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