मलक्का का बढ़ता सामरिक महत्व

क्या मलक्का जलडमरूमध्य बन सकता है 'होर्मुज'?

भारतीय नौसेना की मौजूदगी से मलक्का जलडमरूमध्य का महत्व बढ़ा है। यह जलडमरूमध्य चीन के सामरिक स्थिति के लिए काफी अहम है, जिससे इंडोनेशिया और मलेशिया भी प्रभावित हैं।

By : स्वदेश डेस्क
क्या मलक्का जलडमरूमध्य बन सकता है 'होर्मुज'?

मेजर सरस त्रिपाठी

पिछले सप्ताह भारतीय प्रधानमंत्री की इंडोनेशिया यात्रा इस अर्थ में भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है कि इंडोनेशिया और मलेशिया, हिंद महासागर में भारत के महत्वपूर्ण रणनीतिक सहभागी हो सकते हैं। क्या भारत, हिंद महासागर से चीन सागर की ओर जाने वाले सभी व्यापारिक जहाजों को 'स्ट्रेट ऑफ मलक्का' (Strait of Malacca) के पास रोक सकता है? अधिकांश रणनीतिकारों ने इस विषय पर उसी प्रकार नहीं सोचा, जिस प्रकार होर्मुज के बंद होने और उसके परिणामों के बारे में सोचा गया।

भूगोल का अच्छा ज्ञान रखने वाले ही जानते हैं कि इंडोनेशिया भारत से मात्र 150 किलोमीटर दूर है। जी हां, सिर्फ 150 किलोमीटर। भारत की मुख्य भूमि से हजारों किलोमीटर दूर, मलेशिया और इंडोनेशिया के निकट भारत का 572 द्वीपों वाला अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह है, जहां स्थित भारतीय सेना और नौसेना हिंद महासागर तथा प्रशांत महासागर को जोड़ने वाले सबसे महत्वपूर्ण जलडमरूमध्य, यानी 'स्ट्रेट ऑफ मलक्का' पर अत्यंत प्रभावी भूमिका निभाते हैं।मलक्का जलडमरूमध्य न केवल हिंद महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ने वाली प्रमुख कड़ी है, बल्कि चीन सागर (China Sea) को हिंद महासागर से जोड़ने वाला सबसे महत्वपूर्ण मार्ग भी है। चीन का लगभग 25 प्रतिशत तेल आयात इसी जलडमरूमध्य से होकर होता है। यदि भारत अकेले भी चाहे, तो चीन की कठिनाइयों में असहनीय वृद्धि कर सकता है। यदि इंडोनेशिया, सिंगापुर और मलेशिया मिलकर इस जलडमरूमध्य को अवरुद्ध कर दें, तो चीन की स्थिति बहुत कमजोर हो जाएगी।

चीन की विस्तारवादी नीति के कारण ये सभी देश इस समय उससे असहमत हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ ने चीन और इंडोनेशिया के बीच चल रहे नतुना द्वीप विवाद पर जो निर्णय दिया था, उसे चीन ने नहीं माना, जिससे इंडोनेशिया उसके खिलाफ हो गया। इस क्षेत्र में इंडोनेशिया, मलेशिया, सिंगापुर, वियतनाम, लाओस आदि किसी भी देश से चीन के संबंध बहुत अच्छे नहीं हैं। युद्ध की स्थिति में चीन के लिए सबसे बड़ी चिंता यही है कि हिंद महासागर से होकर जाने वाले उसके तेल के टैंकरों का क्या होगा।इसके अतिरिक्त, चीन का कम-से-कम 40 प्रतिशत व्यापार (खनिज तेल और गैस को छोड़कर) इसी जलडमरूमध्य से होकर दक्षिण एशिया, मध्य एशिया, अफ्रीका और यूरोप की ओर जाता है। उसके पास इसका कोई व्यवहारिक विकल्प भी नहीं है। अपनी इस भौगोलिक कमजोरी को दूर करने के लिए चीन चीन-म्यांमार-बांग्लादेश आर्थिक गलियारे (Economic Corridor) जैसे विकल्प तलाश रहा है। वह आर्कटिक महासागर के रास्ते यूरोप पहुंचने का मार्ग भी खोज रहा है, लेकिन इस मार्ग की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सर्दियों में यह नौवहन (Navigable) के लिए उपयुक्त नहीं रहता। उस दौरान यहां बर्फ की विशाल चट्टानें किसी भी व्यापारिक जहाज के लिए बड़ी बाधा बन जाती हैं।

युद्ध की स्थिति में चीन को भारत की सेना से उतना भय नहीं है, जितना भारतीय नौसेना से है। भारतीय नौसेना के निशाने पर चीन के तीन कमजोर बिंदु हैं पहला स्ट्रेट ऑफ मलक्का, दूसरा ग्वादर पोर्ट और तीसरा हॉर्न ऑफ अफ्रीका स्थित जिबूती पोर्ट। चीन के लिए सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण ये तीनों स्थान भारतीय नौसेना की निगरानी में हैं। इसके लिए भारतीय नौसेना को न तो अधिक युद्धाभ्यास (Manoeuvre) करने की आवश्यकता है और न ही अपने विशेष आर्थिक क्षेत्र (Exclusive Economic Zone-EEZ) से बाहर जाने की। अपने विशेष आर्थिक क्षेत्र में रहते हुए भी भारत चीन के इन तीनों कमजोर बिंदुओं पर प्रभावी कार्रवाई कर सकता है। संभव है कि चीन को लद्दाख की तुलना में हिंद महासागर में संभावित चुनौती का अधिक भय हो।

स्ट्रेट ऑफ मलक्का से प्रतिवर्ष लगभग एक लाख जलपोत गुजरते हैं, जिनमें सबसे अधिक चीन के होते हैं। यह लगभग 800 किलोमीटर लंबा जलमार्ग है, जिसका सबसे संकरा हिस्सा मात्र 2.8 किलोमीटर चौड़ा है और इसकी अधिकतम गहराई 84 फुट है। विश्व की व्यापारिक नौवहन व्यवस्था में 'मलक्कामैक्स' (Malaccamax) शब्द का प्रयोग होता है, जिसका अर्थ है कि 84 फुट से अधिक ड्राफ्ट (Draught) वाला कोई भी जहाज मलक्का जलडमरूमध्य से नहीं गुजर सकता। इस प्राकृतिक सीमा के बावजूद मलक्का स्ट्रेट का कोई व्यवहारिक विकल्प नहीं है, इसलिए इसका सामरिक महत्व अत्यधिक है।

यदि इसका कोई विकल्प है तो वह सुंदा जलडमरूमध्य (Sunda Strait) है, जो जावा और सुमात्रा द्वीपों के बीच से होकर गुजरता है। इस मार्ग से जाने में कम-से-कम तीन दिन अधिक लगते हैं और इसकी गहराई भी मलक्का से कम है। सुंदा जलडमरूमध्य से जाने पर चीन की लगभग 1000 नॉटिकल मील अतिरिक्त दूरी बढ़ जाती है। इसके अलावा उसकी समस्याएं कम नहीं होतीं, क्योंकि यह मार्ग भी इंडोनेशिया के द्वीपों के बीच से होकर गुजरता है और इंडोनेशिया के साथ चीन के संबंध बेहतर नहीं हैं। इस मार्ग की दूसरी चुनौती ऑस्ट्रेलिया की निकटता है। भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के 'क्वाड' (QUAD) सहयोग के कारण चीन की रणनीतिक मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।

दक्षिण चीन सागर (South China Sea) में अमेरिका के दो विशाल विमानवाहक पोत पहले से ही तैनात रहते हैं यूएसएस निमिट्ज (USS Nimitz) और यूएसएस रोनाल्ड रीगन (USS Ronald Reagan)। हालांकि ईरान युद्ध के कारण इनकी तैनाती में बदलाव होता रहा है। भारत ने अपने युद्धपोतों के अलावा आईएनएस कोहासा (INS Kohassa) नामक नया (तीसरा) नौसैनिक अड्डा भी विकसित किया है, जो मलक्का जलडमरूमध्य के काफी निकट है। अंडमान-निकोबार में भारत के दो अन्य नौसैनिक अड्डे पहले से मौजूद हैं।

इस बात की संभावना बहुत कम है कि चीन भारत के साथ युद्ध का जोखिम उठाएगा। यदि उसने इस भूगोल की अनदेखी करते हुए ऐसा दुस्साहस किया, तो उसके लिए युद्ध आसान नहीं होगा। लद्दाख में यदि वह स्थिति संभाल भी ले, तब भी हिंद महासागर उसके लिए वास्तविक अर्थों में 'वाटरलू' साबित हो सकता है। जिस प्रकार विश्व की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति होने का दावा करने वाले अमेरिका को ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी के दौरान चुनौती दी, उसी प्रकार मलक्का क्षेत्र में भारत के साथ इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे साझेदार भी मौजूद हैं।

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