Middle East War: What is Pyrrhic Victory?

मध्यपूर्व संघर्ष और 'पाइरिक विक्ट्री'?

मध्यपूर्व संघर्ष में ‘पाइरिक विक्ट्री’ की चर्चा तेज। जानिए ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच युद्ध में क्यों महंगी पड़ सकती है जीत।

By : स्वदेश डेस्क
मध्यपूर्व संघर्ष और 'पाइरिक विक्ट्री'?

मेजर सरस् त्रिपाठी

सेन्य शब्दावलियों में एक शब्द आता है 'पाइरिक विक्ट्री' जिसका भावार्थ होता है एक ऐसी विजय जो लगभग पराजय के बराबर ही होती है या पराजय से भी अधिक बुरी होती है। मतलब विजय तो तकनीकी रूप से मिल जाती है लेकिन उसका जो मूल्य चुकाना पड़ता है वह पराजय से भी अधिक होता है। ईरान पर आक्रमण करके अमेरिका और इसराइल को अब यह महसूस होने लगा है कि अगर उनकी विजय हो भी गई तो वह 'पाइरिक विक्ट्री' ही होगी। ईरान जानता है कि वह अंततः युद्ध जीत नहीं सकता लेकिन ईरान यह भी अच्छी तरह से जानता है कि अमेरिका और इजरायल के लिए विजय का मूल्य इतना अधिक कर दिया जाए कि उनकी विजय भी पराजय के समान ही हो। अभी तक जो आंकड़े उपलब्ध हैं उसके अनुसार अमेरिका को 3-4 बिलियन डालर का नुकसान हो चुका है। खनिज तेल के बढ़े मूल्यों के कारण ऊर्जा पर खर्च 45% बढ़ गया है। अमेरिका के 15 सैन्य कर्मी मारे गये है और 300 के लगभग गम्भीर रूप से घायल हैं। येनी सफक इंग्लिश रिपोर्ट के अनुसार विश्व बाजार में 11.5 ट्रिलियन डॉलर की गिरावट हुई है। इजराइल को प्रति सप्ताह तीन बिलियन डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं। अभी तक इस्त्रायल जैसे छोटे से देश को 12 बिलियन डॉलर इस युद्ध में झोंकना पड़ा है और उसके 30 लोगों की मृत्यु हुई है। इस्त्रायली रक्षा मंत्रालय ने सरकार से 11.7 बिलियन डॉलर की अतिरिक्त मांग की है। 300 इस्रायली सैनिक/नागरिक घायल हैं और 9000 लोग बेघर हो चुके हैं।

अनुमान है कि एक महीने से चल रहे युद्ध में ईरान का लगभग एक ट्रिलियन डॉलर के मूल्य के बराबर का नुक़सान हो चुका है। इसके अतिरिक्त पूरे मध्य पूर्व में कतर, बहरीन, यूएई, सऊदी अरब, जॉर्डन, सीरिया, इराक इत्यादि देशों में बहुत नुकसान हुआ है। पर्यावरण को जो नुकसान हुआ है वह अमाप्य है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि जितना ढांचागत विनाश हुआ है उसको बनाने में अगले कम से कम 5 वर्ष लग सकते हैं। जो भी उत्पादन की क्षमता थी उसका लगभग 25 से 30% ढांचा नष्ट हो चुका है। यदि युद्ध अभी भी रुक जाता है तो भी विश्व को अपनी जरूरत का 30% उत्पादन प्राप्त नहीं हो पाएगा।

पाइरिक विक्ट्री शब्द की उत्पत्ति प्राचीन रोमन और एपिरस के बीच 280 ईसा पूर्व हुए युद्ध से होती है। एपिरस का राजा पाइरस विजेता तो बना लेकिन पूरा राज्य पंगु हो गया, अर्थव्यवस्था चौपट हो गयी और ग़रीबी ने जनता का जीवन नर्क बना दिया। रोम के लोगों ने जिस बहादुरी से लड़ा उसके कारण पाइरिक की विजय के बावजूद उसमें इतना नुकसान हुआ कि वह पराजय से भी बदतर ही था। तब से इस शब्द को सैन्य शब्दावली में प्रयोग किया जाने लगा।इसी तरह का उदाहरण भारत में भी प्राप्त होता है जब सम्राट अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया था। इस युद्ध में अशोक की विजय तो हुई थी लेकिन इतने सैनिक हताहत और मारे गए थे कि यह विजय पराजय के समान थी। दोनों पक्षों की संपत्ति का इतना नुकसान हुआ था कि अशोक के मन में बहुत ग्लानि पैदा हुई थी और वहीं से भविष्य में कभी भी युद्ध न करने का संकल्प लिया था। उसके बाद अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था।

आधुनिक युग में अमेरिका एक बार पहले ही पाइरिक विक्ट्री में वियतनाम में फंस चुका है, जहां उसको लाभ कुछ नहीं हुआ। 20 साल चले इस युद्ध में अमेरिका ने किसी तरह अपना सम्मान बचाकर बाहर निकलने का प्रबंध किया। यही स्थिति अफगानिस्तान की भी रही। यही कारण है कि ईरान के ऊपर आक्रमण करने का साहस किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति ने 1979 से लेकर आज तक नहीं किया। सही अर्थों में डोनाल्ड ट्रंप का यह निर्णय बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं था। जुनून और अहं के कारण जो उन्होंने यह किया है उसके परिणाम भी सामने आ रहे हैं।  उन्हें कहीं से भी किसी भी प्रकार का सहयोग नहीं मिल रहा है। नाटो सधि के देश भी अपने को अलग कर रहे हैं। स्पेन ने तो अपने सैनिकों को भी मध्य पूर्व से बाहर निकाल लिया है। नाटो में सम्मिलित सभी देशों ने अमेरिका को सहयोग करने से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मना कर दिया है।

अमेरिका से जो मीडिया की रिपोर्ट आ रही है उसमें यह कहा गया है कि 'द प्रेसिडेंट इज टायर्ड ऑफ़ दिस वार'। यानी राष्ट्रपति इस युद्ध से थक चुके हैं। वह अपनी हार नहीं मान रहे हैं लेकिन वह इस युद्ध से निकलना चाहते हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि क्या किया जाए? भूमि पर आक्रमण करने का दुस्साहस अगर अमेरिका और इसराइल करते हैं तो 'पाइरिक विक्ट्री' का मूल्य और बढ़ जाएगा। इजरायल और अमेरिका की तबाही का जो मूल्य है वह और ऊंचा हो जाएगा। ईरान की सेना वियतनाम और अफगानिस्तान की सेना से बहुत अधिक प्रशिक्षित और संख्या में भी बहुत बड़ी है। ईरान के पास लगभग 6 लाख सैनिक अभी रेगुलर आर्मी के है। उसके अलावा ईरान ने यह घोषणा की है कि ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड में 12 वर्ष से ऊपर के जो भी नवयुवक हैं उनको सम्मिलित किया जाएगा। 10 लाख सैनिको को भर्ती की जायेगी। अगर इसराइल और अमेरिका भूमि पर आक्रमण करने का और 'बूट्स आन ग्राउंड' लाने का प्रयास करते हैं तो यह एक 'हाराकीरी' यानी आत्मघाती कदम होगा। ईरान अमेरिका का 'वाटर लू' साबित हो सकता है।

 

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