धरती माता को बुखार, है कोई सुनने वाला!

धरती माता को बुखार, है कोई सुनने वाला!

जयराम शुक्ल

By : Swadesh Bhopal
धरती माता को बुखार, है कोई सुनने वाला!

हाड़ कंपा देने वाली ठंड पड़ रही है। रेगिस्तानी इलाकों में ओस की बूंदें जमने लगी हैं। मौसम का मिज़ाज कुछ ऐसा है कि समझ नहीं आता.यह ठंड है या कोई चेतावनी। हमारी उमरिया (बांधवगढ़) और पचमढ़ी जैसे इलाकों में अब वैसी ठंड पड़ रही है, जिसकी कल्पना कभी नहीं की गई थी। जहां कभी बिना पंखे के भी गर्मी काट ली जाती थी, वहां अब कंबल और हीटर की ज़रूरत पड़ रही है।

हे प्रभु! तुम्हारी यह कैसी माया है.कहीं धूप, कहीं साया। धरती माता का ताप और ठंड साल-दर-साल असंतुलित होता जा रहा है। मौसम वैज्ञानिक कह रहे हैं कि आने वाले वर्षों में औसत तापमान और गिरेगा, लेकिन गर्मियों की मार और ज्यादा पड़ेगी। भोपाल, जिसे कभी “एयरकंडीशंड सिटी” कहा जाता था, वहां पारा सर्दियों में चार डिग्री से नीचे चला जाता है और गर्मियों में 45 डिग्री सेल्सियस को छू लेता है।

बीस पच्चीस साल पहले अमरकंटक और पचमढ़ी जैसे इलाकों में एसी का नामोनिशान नहीं था। आज बिना एसी के वहां रहना मुश्किल हो गया है। अमरकंटक की हरियाली, उसकी नदियां, उसके फूल सब जैसे झुलस गए हों। नौतपा अब नौ दिन का नहीं रहा, पूरा अप्रैल,मई उसी की चपेट में रहता है। लगता है, आने वाले समय में ऋतुओं के नाम तक बदलने पड़ेंगे।

पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र कहा करते थे“धरती माता को बुखार आ गया है।” जैसे मनुष्य को बुखार तब आता है जब उसकी प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ जाती है, वैसे ही धरती भी मनुष्य के अत्याचारों से बीमार हो चुकी है। फर्क बस इतना है कि इंसान अस्पताल चला जाता है, दवाइयां खा लेता है, लेकिन धरती माता कहां जाए? उसकी पीड़ा कौन सुने?

भारतीय परंपरा में धरती माता हर युग में अपनी व्यथा प्रकट करती आई है। रामायण में भी भूमि की पीड़ा का उल्लेख मिलता है। जब धरती असुरों के अत्याचार से त्रस्त होती है, तो विष्णु अवतार लेते हैं। इन पौराणिक कथाओं को केवल कथा न समझें, इनके भीतर गहरे संकेत छिपे हैं। रामायण को यदि पर्यावरणीय दृष्टि से पढ़ा जाए, तो वह आज के समय की किताब बन जाती है।

दंडकारण्य केवल एक वन नहीं था, वह प्रकृति का प्रतीक था। खर-दूषण और राक्षस दरअसल उस व्यवस्था के प्रतिनिधि थे, जो जंगलों को उजाड़ रही थी। आज के समय में वही भूमिका खनन कंपनियां और पूंजीवादी ताकतें निभा रही हैं। विशाल मशीनों के पंजों से धरती को नोचा जा रहा है, नदियों को मोड़ा जा रहा है, पहाड़ों को खोखला किया जा रहा है।

राम ने जिन शक्तियों को साथ लिया,केवट, भील, कोल, किरात, वानर, भालू, वे सभी प्रकृति के संरक्षक थे। यह शोषितों और प्रकृति के साथ खड़े होने का प्रतीक था। सोने की लंका दरअसल पूंजीवाद का प्रतीक थी, जहां वैभव था लेकिन संवेदना नहीं। राम द्वारा लंका का विनाश केवल युद्ध नहीं था, वह पूंजी पर प्रकृति की विजय थी।

आज समस्या यह है कि हम समाधान उन हाथों से मांग रहे हैं, जो स्वयं समस्या के सूत्रधार हैं। हम पश्चिम के दृष्टिकोण से प्रकृति को देखने की भूल कर रहे हैं। पश्चिम के लिए प्रकृति एक संसाधन है, हमारे लिए वह माता है। यही ज्ञान और विज्ञान का मूल अंतर है। ज्ञान कहता है, प्रकृति पूज्य है, जीवनदायिनी है। विज्ञान कहता है, प्रकृति उपभोग की वस्तु है।

जब तक हम इस अंतर को नहीं समझेंगे, तब तक धरती माता का बुखार नहीं उतरेगा। आज कोई राम अवतार लेने नहीं आ रहा। अब निर्णय हमें ही करना है, क्या हम रावण की लंका के साथ खड़े हैं या धरती माता के साथ?

धरती माता आज फिर कराह रही है। सवाल सिर्फ इतना है, क्या कोई सुनने वाला है?


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