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'गन-तंत्र' से गणतंत्र की ओर बढ़ता नक्सल गलियारा

मध्यप्रदेश भाजपा ने मिशन 2027 के तहत राजनीतिक समीक्षा अभियान शुरू करने की तैयारी तेज कर दी है। मंत्रियों के प्रदर्शन, हार वाली सीटों और निकाय चुनाव रणनीति पर फोकस रहेगा।

By : स्वदेश डेस्क
'गन-तंत्र' से गणतंत्र की ओर बढ़ता नक्सल गलियारा

अराधिता सिंह

मध्य भारत के कई हिस्सों विशेषकर छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों में दशकों तक ऐसी स्थिति बनी रही, जहाँ कागजों पर तो भारतीय राज्य मौजूद था, लेकिन जमीनी स्तर पर जीवन माओवादी नियंत्रण से संचालित होता था। सड़क, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और प्रशासनिक ढाँचा वहीं तक सीमित रह जाते थे, जहाँ तक सुरक्षा बल सुरक्षित महसूस करते थे। कई गाँव ऐसे थे, जहाँ सरकारी अधिकारी वर्षों तक नहीं पहुँच पाए। इस प्रशासनिक शून्य को नक्सलियों ने अपने समानांतर तंत्र जन अदालत, उगाही और निगरानी व्यवस्था से भर दिया था।

हाल के वर्षों में यह परिदृश्य तेजी से बदला है। केंद्र सरकार ने मार्च 2026 तक नक्सलवाद के उन्मूलन का लक्ष्य तय करते हुए सुरक्षा अभियानों, प्रशासनिक पहुँच और विकास योजनाओं को साथ लेकर काम शुरू किया। इसका असर अब बस्तर, गढ़चिरौली, झारखंड और ओडिशा के कई इलाकों में दिखाई देने लगा है। जहाँ कभी भय और हिंसा का माहौल था, वहाँ अब धीरे-धीरे सामान्य जीवन लौट रहा है।

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में स्थायी सुरक्षा शिविरों की स्थापना राज्य की वापसी का सबसे स्पष्ट संकेत बनी है। इन शिविरों ने केवल सुरक्षा नहीं दी, बल्कि प्रशासनिक गतिविधियों को भी संभव बनाया। जो सड़कें कभी बारूदी सुरंगों और नक्सली गश्त के कारण बंद रहती थीं, वे अब लोगों और व्यापारियों के लिए खुल रही हैं। पहली बार ब्लॉक अधिकारी, शिक्षक और स्वास्थ्यकर्मी नियमित रूप से अंदरूनी गाँवों तक पहुँच पा रहे हैं। इससे ग्रामीणों में यह विश्वास बढ़ा है कि राज्य केवल चुनावों के समय दिखाई देने वाली शक्ति नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा भी हो सकता है।

राज्य की यह वापसी केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तन भी है। लंबे समय तक ग्रामीण भय के कारण नक्सलियों के आदेश मानते रहे। अब वही लोग सरकारी योजनाओं, राशन, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए आगे आ रहे हैं। जन अदालत जैसी समानांतर व्यवस्थाएँ कमजोर पड़ रही हैं और लोग फिर से औपचारिक संस्थाओं पर भरोसा करने लगे हैं। भय आधारित नियंत्रण की जगह धीरे-धीरे नागरिकता और अधिकारों की भावना विकसित हो रही है।विकास इस बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बनकर सामने आया है। सड़क, पुल, मोबाइल टावर और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएँ अब उन क्षेत्रों तक पहुँच रही हैं, जहाँ दशकों तक इनका अभाव था। आंगनवाड़ी, स्कूल और स्वास्थ्य उपकेंद्र फिर से संचालित हो रहे हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली और कल्याणकारी योजनाओं की पहुँच ने उस वंचना को कम किया है, जिसका फायदा माओवादी संगठन वर्षों तक उठाते रहे।

छत्तीसगढ़ की ‘नियाद नेल्लानार’ जैसी पहलें, प्रधानमंत्री आवास योजना, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना और कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम अब दूरस्थ गाँवों तक पहुँच रहे हैं। इन योजनाओं ने स्थानीय लोगों के दृष्टिकोण में बड़ा बदलाव पैदा किया है। जहाँ पहले राज्य केवल सुरक्षा बलों के रूप में दिखाई देता था, वहीं अब वह विकास और अवसरों के माध्यम से भी उपस्थित है। यही कारण है कि कई क्षेत्रों में जनसमर्थन धीरे-धीरे नक्सलियों से हटकर प्रशासन की ओर बढ़ रहा है।स्थानीय अर्थव्यवस्था भी पुनर्जीवित हो रही है। साप्ताहिक हाट फिर से सक्रिय होने लगे हैं। व्यापारी अब बिना भय के गाँवों तक पहुँच पा रहे हैं। वन उपज का संग्रह अधिक संगठित तरीके से हो रहा है और आदिवासियों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिल रहा है। इससे नक्सली उगाही का प्रभाव घटा है। छोटे व्यवसाय जैसे मोबाइल रिपेयर सेंटर, परिवहन सेवाएँ और मैकेनिक की दुकानें भी उभरने लगे हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बदलाव युवाओं की सोच में दिखाई देता है। जो युवा कभी नक्सली दलम में शामिल होने को ही अपना भविष्य मानते थे, वे अब शिक्षा, रोजगार और सुरक्षा बलों में भर्ती की ओर देख रहे हैं। बेहतर सड़क और संचार व्यवस्था ने उन्हें बाहरी दुनिया से जोड़ा है। इससे नक्सलियों की भर्ती क्षमता कमजोर हुई है और संगठन के भीतर वैचारिक थकान तथा अविश्वास बढ़ा है।आदिवासी समुदाय और राज्य के बीच संबंधों में भी बदलाव आ रहा है। लंबे समय तक आदिवासी समाज राज्य को दूरस्थ और दंडात्मक शक्ति के रूप में देखता था। अब वन अधिकारों की मान्यता, सामुदायिक दावों की स्वीकृति और सांस्कृतिक आयोजनों को बढ़ावा मिलने से सम्मान और सहभागिता की भावना मजबूत हुई है। महिलाएँ अब बिना भय के स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच पा रही हैं और बच्चों को स्कूलों में शिक्षक दिखाई दे रहे हैं।

हालाँकि चुनौतियाँ अभी समाप्त नहीं हुई हैं। नक्सली संगठन अभी भी छिटपुट हमलों के माध्यम से अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश कर सकते हैं। दशकों से मौजूद भय और अविश्वास को समाप्त होने में समय लगेगा। आत्मसमर्पण कर चुके कैडरों का पुनर्वास भी एक जटिल प्रक्रिया है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि विकास और प्रशासनिक उपस्थिति निरंतर बनी रहे। केवल एकबारगी योजनाएँ स्थायी समाधान नहीं बन सकतीं।भारत के लिए यह केवल एक सुरक्षा सफलता नहीं, बल्कि लोकतंत्र के विस्तार का महत्वपूर्ण क्षण है। वास्तविक जीत तब होगी, जब बस्तर, गढ़चिरौली और झारखंड के दूरस्थ गाँवों का नागरिक भी स्वयं को उतना ही सुरक्षित, जुड़ा और सम्मानित महसूस करे, जितना किसी बड़े शहर का नागरिक करता है। जहाँ राज्य निरंतर उपस्थित रहता है और सम्मानजनक जीवन के अवसर देता है, वहाँ उग्रवाद धीरे-धीरे अपनी प्रासंगिकता खो देता है।

 

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