Padma Awards Shift Towards Grassroots Recognition

पद्म सम्मान की नई परंपरा : प्रसिद्धि नहीं, प्रतिबद्धता

पद्म पुरस्कारों में अब जमीनी स्तर पर काम करने वाले अनसुने नायकों को पहचान मिल रही है। नई चयन प्रक्रिया को भारतीय लोकतंत्र की सकारात्मक दिशा माना जा रहा है।

By : स्वदेश डेस्क
पद्म सम्मान की नई परंपरा : प्रसिद्धि नहीं, प्रतिबद्धता

भारत की लोकतांत्रिक संरचना में पुरस्कारों का महत्व केवल प्रतीकात्मक नहीं होता। वे उस समाज की वैचारिक दिशा तय करते हैं, जो अपने नायकों का चयन करता है। पद्म पुरस्कारों का इतिहास भी इसी कसौटी पर परखा जाता रहा है। लंबे समय तक यह धारणा बनी रही कि ये सम्मान सत्ता के गलियारों में तय होते हैं। दिल्ली की पहचान, प्रभावशाली लॉबी, वैचारिक निकटता और राजनीतिक सुविधा चयन प्रक्रिया पर हावी रहती थी। परिणामस्वरूप देश के दूरस्थ हिस्सों में काम कर रहे असाधारण लोग राष्ट्रीय पहचान से वंचित रह जाते थे।

पिछले कुछ वर्षों में इस सोच में निर्णायक परिवर्तन दिखाई दिया है। प्रधानमंत्री आदरणीय नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में पद्म पुरस्कारों की प्रकृति बदली है। अब यह सम्मान सत्ता के परिचित चेहरों की सूची नहीं लगता, अपितु भारत के मौन परिश्रम का सार्वजनिक अभिनंदन प्रतीत होता है। यही सबसे बड़ा बदलाव है।आज जब पद्म पुरस्कारों की घोषणा होती है, तब चर्चा किसी फिल्मी चमक या राजनीतिक समीकरण से अधिक उन लोगों पर होती है, जिन्होंने जीवन का बड़ा हिस्सा समाज के बीच बिताया। कोई आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा का दीप जला रहा था, कोई लोककला को बचाने में लगा था, कोई नदियों को पुनर्जीवित कर रहा था, तो कोई दिव्यांग बच्चों के जीवन में आशा भर रहा था। यह परिवर्तन आकस्मिक नहीं है। इसके पीछे शासन की वैचारिक प्राथमिकता बदलने का संकेत मौजूद है।

पहले पुरस्कारों के चयन पर अक्सर यह आरोप लगता था कि वे ‘एलीट क्लब’ के विस्तार भर हैं। राजधानी के प्रभावशाली वर्गों में चर्चित नाम राष्ट्रीय सम्मान तक सहज पहुंच बना लेते थे। कई बार विवाद इस कारण खड़े हुए कि जिन व्यक्तियों का योगदान सीमित था, वे सम्मानित हो गए, जबकि दशकों तक जनसेवा करने वाले लोग उपेक्षित रह गए। उस दौर में पुरस्कारों की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक था। समाज के भीतर यह भावना गहराती गई कि पद्म सम्मान प्रतिभा से अधिक पहुंच का परिणाम बन गए हैं।यूपीए शासनकाल में अनेक चयन ऐसे रहे, जिन पर सार्वजनिक बहस हुई। आरोप लगे कि विचारधारात्मक झुकाव, राजनीतिक समीकरण और प्रभावशाली नेटवर्क चयन प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। देश ने यह भी देखा कि कुछ नामों की घोषणा होते ही विवाद शुरू हो जाते थे। प्रश्न उठता था कि क्या वास्तव में यही भारत के सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि हैं? लोकतंत्र में सम्मान की गरिमा तब कम होती है, जब जनता चयन प्रक्रिया पर भरोसा खोने लगे।

इसके विपरीत वर्तमान दौर में एक अलग दृष्टि दिखाई देती है। जनप्रिय प्रधानमंत्री आदरणीय नरेंद्र मोदी जी ने कई बार सार्वजनिक मंचों से ऐसे ‘अनसुने नायकों’ का उल्लेख किया है, जो कैमरों और चर्चा की चमक-दमक से दूर रहकर समाज निर्माण कर रहे हैं। पद्म पुरस्कारों में उसी सोच का विस्तार दिखता है। अब देश का सामान्य नागरिक यह महसूस करता है कि यदि उसका कार्य असाधारण है, तो दिल्ली की सिफारिश के बिना भी देश उसे पहचान सकता है।यह बदलाव प्रशासनिक सुधार भर नहीं है। यह भारत की सांस्कृतिक चेतना का पुनर्संतुलन है। लंबे समय तक राष्ट्रीय विमर्श महानगरों के इर्द-गिर्द सीमित रहा। गांव, वनांचल, लोकभाषाएं, पारंपरिक ज्ञान और जमीनी समाजसेवा को वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे अधिकारी थे। आज पद्म पुरस्कार उस उपेक्षित भारत को राष्ट्रीय मंच दे रहे हैं। इससे सम्मान की प्रतिष्ठा भी बढ़ी है और समाज का आत्मविश्वास भी।

महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि अब पुरस्कारों को लेकर जनता में अपनापन दिखाई देता है। जब किसी छोटे गांव का शिक्षक, किसी जनजातीय क्षेत्र की महिला कार्यकर्ता या किसी लोक कलाकार को सम्मान मिलता है, तब पूरा समाज गौरव अनुभव करता है। यही लोकतांत्रिक सम्मान की असली सफलता है। पुरस्कार तब सार्थक बनते हैं, जब वे सत्ता की शोभा न बनकर समाज की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करें।आलोचना और तुलना राजनीति का स्वाभाविक हिस्सा है, फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि वर्तमान व्यवस्था ने पद्म पुरस्कारों की विश्वसनीयता को नए स्तर पर स्थापित किया है। चयन प्रक्रिया में विविधता बढ़ी है। जमीनी योगदान को महत्व मिला है। देश के दूरस्थ हिस्सों से प्रतिभाएं सामने आई हैं। इससे यह संदेश गया है कि राष्ट्र निर्माण का श्रेय कुछ स्थापित चेहरों तक सीमित नहीं है।

भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में सम्मान व्यवस्था की निष्पक्षता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि पुरस्कार समाज के वास्तविक कर्मयोगियों तक पहुंचते हैं, तो वह आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता है। विश्व के सर्वाधिक लोकप्रिय जननेता श्री नरेंद्र मोदी जी की सरकार ने पद्म पुरस्कारों को उसी प्रेरणा का माध्यम बनाया है। यह बदलाव राजनीतिक विमर्श से ऊपर उठकर भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का संकेत देता है।

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