अनुराग तागड़े
राष्ट्रों के इतिहास में ऐसे क्षण बार-बार आते हैं जब उन्हें यह तय करना होता है कि वे अपनी ऊर्जा विकास, आत्ममंथन और भविष्य निर्माण में लगाएंगे या फिर अतीत की शिकायतों और काल्पनिक शत्रुओं के सहारे जनता का ध्यान भटकाने में। दुर्भाग्य से पाकिस्तान आज भी दूसरे रास्ते पर चलता दिखाई देता है।हाल के दिनों में पाकिस्तान के सैन्य और राजनीतिक प्रतिष्ठान द्वारा प्रचारित शब्द "फितना-अल-हिंदुस्तान" इसी मानसिकता का प्रतीक है। यह शब्द केवल एक सुरक्षा या कूटनीतिक अवधारणा नहीं, बल्कि एक ऐसा राजनीतिक आख्यान है जिसके माध्यम से पाकिस्तान अपने आंतरिक संकटों का दोष भारत पर डालने का प्रयास कर रहा है। बलूचिस्तान में बढ़ते असंतोष, आतंकवादी घटनाओं, आर्थिक संकट और प्रशासनिक विफलताओं को समझने के बजाय उन्हें भारत-प्रेरित षड्यंत्र के रूप में प्रस्तुत करना आसान है; किंतु आसान रास्ते अक्सर सही रास्ते नहीं होते।
पाकिस्तान का सबसे बड़ा संकट भारत नहीं, उसकी अपनी नीतियां हैं
यदि किसी राष्ट्र की मुद्रा लगातार दबाव में हो, विदेशी मुद्रा भंडार संकट में हो, उद्योग निवेश से वंचित हो रहे हों और युवा वर्ग रोजगार के लिए विदेशों की ओर देख रहा हो, तो यह किसी बाहरी शत्रु की नहीं बल्कि आंतरिक नीतिगत असफलताओं की कहानी होती है।आज पाकिस्तान का आम नागरिक सीमा पार की राजनीति से अधिक अपने घर के बजट को लेकर चिंतित है। कराची, लाहौर, रावलपिंडी, पेशावर और क्वेटा जैसे शहरों में मध्यम वर्ग की सबसे बड़ी चिंता भारत नहीं बल्कि जीवन-यापन की बढ़ती लागत है। बिजली के बिल, ईंधन की कीमतें, गैस शुल्क, खाद्यान्न और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की बढ़ती कीमतों ने आम परिवारों की आर्थिक स्थिति को चुनौतीपूर्ण बना दिया है।पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान को बार-बार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के दरवाजे पर जाना पड़ा। यह स्थिति किसी विदेशी षड्यंत्र का परिणाम नहीं, बल्कि वर्षों की आर्थिक कुप्रबंधन, सीमित कर आधार, बढ़ते ऋण और अस्थिर नीतियों का परिणाम है। कोई भी राष्ट्र केवल उधार लेकर समृद्ध नहीं बन सकता।
आसिम मुनीर और सत्ता का सैन्यीकरण
पाकिस्तान के वर्तमान सेना प्रमुख आसिम मुनीर के कार्यकाल में सेना की भूमिका को लेकर देश के भीतर और बाहर व्यापक चर्चा हुई है। पाकिस्तान का राजनीतिक इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि वहां सेना केवल सुरक्षा संस्था नहीं रही, बल्कि कई बार सत्ता संरचना का केंद्रीय तत्व बन गई।जब किसी लोकतंत्र में निर्वाचित संस्थाओं से अधिक प्रभाव गैर-निर्वाचित संस्थाओं का हो जाता है, तब जवाबदेही कमजोर पड़ने लगती है। ऐसी परिस्थितियों में शासन की विफलताओं का विश्लेषण करने के बजाय बाहरी खतरों का प्रचार अधिक सुविधाजनक हो जाता है।"फितना-अल-हिंदुस्तान" इसी प्रवृत्ति का हिस्सा प्रतीत होता है। यह जनता को यह विश्वास दिलाने का प्रयास है कि देश की लगभग हर समस्या का स्रोत सीमा के उस पार है। किंतु वास्तविकता यह है कि आर्थिक नीतियां, प्रशासनिक निर्णय और राष्ट्रीय प्राथमिकताएं इस्लामाबाद और रावलपिंडी में तय होती हैं, नई दिल्ली में नहीं।
महंगाई : आम पाकिस्तानी की सबसे बड़ी लड़ाई
किसी भी राष्ट्र की वास्तविक स्थिति उसके सरकारी बयानों से नहीं, बल्कि उसके बाजारों और रसोईघरों से समझी जा सकती है।आज पाकिस्तान का सामान्य नागरिक बढ़ती कीमतों से जूझ रहा है। आटा, चीनी, खाद्य तेल, दूध, सब्जियां और अन्य आवश्यक वस्तुएं आम परिवारों के बजट पर भारी दबाव डाल रही हैं। परिवहन लागत में वृद्धि ने हर वस्तु को महंगा बना दिया है। बिजली और गैस की बढ़ती दरों ने उद्योगों और घरेलू उपभोक्ताओं दोनों को प्रभावित किया है।जब किसी देश में युवा नौकरी के बजाय पलायन के अवसर खोजने लगें, जब परिवार अपनी बचत को दैनिक खर्चों में समाप्त करने लगें और जब व्यापारिक समुदाय भविष्य को लेकर आश्वस्त न हो, तब यह संकेत होता है कि आर्थिक संकट केवल आंकड़ों का विषय नहीं रहा, बल्कि सामाजिक समस्या बन चुका है।विडंबना यह है कि ऐसे समय में जनता को आर्थिक सुधारों का रोडमैप देने के बजाय भारत-विरोधी आख्यान अधिक सुनाए जा रहे हैं।
बलूचिस्तान : प्रश्नों को दबाने से समाधान नहीं मिलता
बलूचिस्तान पाकिस्तान के लिए केवल एक प्रांत नहीं, बल्कि उसकी राष्ट्रीय एकता की सबसे बड़ी परीक्षा है। प्राकृतिक गैस, खनिज संपदा और सामरिक महत्व से भरपूर यह क्षेत्र लंबे समय से असंतोष, राजनीतिक विवाद और सुरक्षा चुनौतियों का केंद्र रहा है।बलूच समाज के भीतर वर्षों से प्रतिनिधित्व, संसाधनों में हिस्सेदारी और विकास से जुड़े प्रश्न उठते रहे हैं। इन प्रश्नों का उत्तर राजनीतिक संवाद, संवेदनशील प्रशासन और विकास आधारित दृष्टिकोण में निहित है।लेकिन जब हर असहमति को विदेशी साजिश घोषित कर दिया जाता है, तब समस्या का समाधान और कठिन हो जाता है। "फितना-अल-हिंदुस्तान" जैसी शब्दावली इस वास्तविकता को छिपा नहीं सकती कि किसी भी क्षेत्र में स्थायी शांति केवल सैन्य उपायों से नहीं आती; उसके लिए विश्वास और न्याय भी आवश्यक है।
अफगानिस्तान : बदलता क्षेत्रीय समीकरण
पाकिस्तान की एक और चिंता अफगानिस्तान के साथ उसके जटिल संबंध हैं। दशकों तक अफगान नीति को अपनी रणनीतिक दृष्टि से देखने वाला पाकिस्तान आज स्वयं एक ऐसे पड़ोसी का सामना कर रहा है जिसके साथ उसका विश्वास संकट गहरा रहा है।सीमा विवाद, आतंकवाद और सुरक्षा संबंधी मतभेद दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित करते रहे हैं। इसके विपरीत भारत और अफगानिस्तान के बीच संबंध मुख्यतः विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना परियोजनाओं पर आधारित रहे हैं।
अफगान संसद भवन, सलमा बांध, सड़क परियोजनाएं और छात्रवृत्ति कार्यक्रम इस सहयोग के प्रतीक हैं। यही कारण है कि अफगान समाज के अनेक वर्ग भारत को विकास साझेदार के रूप में देखते हैं। पाकिस्तान के लिए यह असहजता का विषय हो सकता है, किंतु किसी राष्ट्र की सकारात्मक छवि आरोपों से नहीं, कार्यों से बनती है।
आखिर असली "फितना" क्या है?
यह प्रश्न केवल पाकिस्तान के लिए नहीं, हर राष्ट्र के लिए महत्वपूर्ण है।क्या असली संकट वह पड़ोसी है जिसे बार-बार दोषी ठहराया जा रहा है?या फिर वह मानसिकता है जो हर विफलता का कारण बाहर खोजती है?क्या असली समस्या भारत है?या वह व्यवस्था जो शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग और रोजगार के बजाय सुरक्षा विमर्श को ही राष्ट्रीय पहचान बना देती है?क्या असली संकट बाहरी षड्यंत्र है?या वह राजनीतिक संस्कृति जो आत्मालोचना को देशद्रोह और प्रश्न पूछने को षड्यंत्र मानने लगती है?
इन प्रश्नों के उत्तर पाकिस्तान को स्वयं खोजने होंगे।
आत्ममंथन ही समाधान है
दक्षिण एशिया का भविष्य संघर्ष में नहीं, सहयोग में है। भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और क्षेत्र के अन्य देशों की युवा आबादी विकास, रोजगार, तकनीक और अवसर चाहती है; अंतहीन वैमनस्य नहीं।"फितना-अल-हिंदुस्तान" जैसे नारे कुछ समय के लिए राजनीतिक लाभ दे सकते हैं, लेकिन वे न तो महंगाई कम कर सकते हैं, न निवेश बढ़ा सकते हैं, न रोजगार पैदा कर सकते हैं और न ही जनता का विश्वास जीत सकते हैं।किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके हथियारों में नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के आत्मविश्वास में होती है। और नागरिकों का आत्मविश्वास तब बढ़ता है जब सरकारें समस्याओं का समाधान करती हैं, न कि उनके लिए नए दोषी खोजती हैं। पाकिस्तान के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती भारत नहीं, बल्कि स्वयं से ईमानदार संवाद की है। जिस दिन वह यह साहस कर पाएगा, उसी दिन उसके विकास का वास्तविक अध्याय शुरू होगा।