PM Modi and Shastri Duty Call Analysis

संकट में कर्तव्यः शास्त्री व मोदी का संदेश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और लालबहादुर शास्त्री के संकट कालीन आह्वान की समानताओं और संदेश पर विशेष विश्लेषण। जानिए राष्ट्रहित और त्याग की राजनीति का अर्थ।

By : स्वदेश डेस्क
संकट में कर्तव्यः शास्त्री व मोदी का संदेश

विवेक शुक्ला

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हैदराबाद में एक जनसभा को संबोधित करते हुए देश की जनता से अपील की कि पश्चिम एशिया संकट के बीच एक वर्ष तक गैर-जरूरी सोने की खरीदारी टालें, ईंधन की बचत करें, वर्क फ्रॉम होम अपनाएं, अनावश्यक विदेश यात्राएं स्थगित करें, खाने के तेल और उर्वरकों पर निर्भरता कम करें तथा स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता दें। यह आह्वान वैश्विक तेल संकट, विदेशी मुद्रा दबाव और आर्थिक सुरक्षा को मजबूत करने के उद्देश्य से किया गया।

इसी तरह 1965 के भारत-पाक युद्ध और अकाल की छाया में लालबहादुर शास्त्री ने जनता से सप्ताह में एक समय का भोजन त्यागने की अपील की थी। दोनों आह्वान इसलिए खास हैं क्योंकि ये संकट के समय व्यक्तिगत त्याग, सामूहिक एकता और राष्ट्र-प्रथम की भावना को केंद्र में रखते हैं। इनमें गहरी समानताएं हैं, लेकिन संदर्भ, पैमाने और दृष्टिकोण में कुछ असमानताएं भी दिखती हैं।शास्त्रीजी की पत्नी ललिता शास्त्री ने इस लेखक को 1987 में अपने जनपथ स्थित आवास में बताया था कि शास्त्रीजी की अपील का पूरे देश में असर हुआ था। पूरा देश तब उनके साथ खड़ा था। जहां आजकल शास्त्री स्मारक है, वहीं ललिताजी 1993 में अपनी मृत्यु तक रहीं। शास्त्रीजी के बंगले से ही दो बंगले निकले, जिनमें से एक में सोनिया गांधी रहती हैं।

वैश्विक संकट और आर्थिक आत्मनिर्भरता:पश्चिम एशिया (ईरान-अमेरिका/इजराइल तनाव और होर्मुज स्ट्रेट प्रभावित) में चल रहे संघर्ष के कारण वैश्विक तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। भारत, जो 85 प्रतिशत कच्चे तेल का आयात करता है, उस पर विदेशी मुद्रा भंडार का दबाव बढ़ रहा है।मोदीजी ने स्पष्ट कहा, “सोने की खरीद विदेशी मुद्रा खाती है... देशहित में हम तय करें कि सालभर सोना न खरीदें।” उन्होंने कोविड काल की याद दिलाते हुए वर्क फ्रॉम होम, वर्चुअल मीटिंग्स, पब्लिक ट्रांसपोर्ट, कारपूलिंग, इलेक्ट्रिक वाहनों और स्वदेशी सामानों पर जोर दिया।यह अपील इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत सोने का दूसरा सबसे बड़ा आयातक है, जहां लगभग 70-80 बिलियन डॉलर का सालाना आयात होता है। यह कदम रुपए को मजबूत रखने, फॉरेक्स रिजर्व बचाने तथा आत्मनिर्भर भारत अभियान को गति देने वाला हो सकता है।

‘जय जवान, जय किसान’:1965 का भारत-पाक युद्ध चुनौतीपूर्ण था। 1962 के चीन युद्ध के बाद अर्थव्यवस्था कमजोर थी, विदेशी मुद्रा भंडार सीमित था और अमेरिका ने खाद्यान्न निर्यात रोकने की धमकी दी थी।लालबहादुर शास्त्री ने 19 अक्टूबर 1965 को इलाहाबाद में ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया और राष्ट्रीय अपील की कि सप्ताह में एक दिन एक समय का भोजन न करें। उन्होंने पहले इसे अपने परिवार पर लागू किया और पत्नी ललिता शास्त्री से शाम का खाना न बनाने को कहा।पूरे देश ने ‘शास्त्री व्रत’ अपनाया। रेस्तरां बंद हुए और लोग स्वेच्छा से उपवास रखने लगे। यह आह्वान इसलिए खास था क्योंकि इसने युद्ध के मैदान और खेत दोनों को जोड़ा। सैनिकों का मनोबल बढ़ा और किसानों ने उत्पादन बढ़ाया। भारत ने युद्ध में पाकिस्तान को रोका और दीर्घकाल में हरित क्रांति की नींव पड़ी।

शास्त्रीजी की सादगी अद्भुत थी। वे प्रधानमंत्री रहते हुए सरकारी वेतन नहीं लेते थे। उन्हें पूरा देश अपना नायक मानता था। समानता और असमानता:दोनों नेताओं ने “ऊपर से आदेश” नहीं, बल्कि स्वैच्छिक त्याग की अपील की। शास्त्रीजी ने इसकी शुरुआत अपने परिवार से की। उनकी सादगी प्रसिद्ध थी। वहीं मोदी की “चायवाले से प्रधानमंत्री” की छवि आमजन से जुड़ाव दिखाती है।दोनों आह्वान ‘जय जवान, जय किसान’ की भावना को विस्तार देते हैं। शास्त्रीजी ने इसकी मूल भावना दी, जबकि मोदी ने उसमें ‘जय अनुसंधान’ और आर्थिक सुरक्षा को जोड़ा।शास्त्री का आह्वान हरित क्रांति का आधार बना, जबकि मोदी का आह्वान प्राकृतिक खेती, स्वदेशी और फॉरेक्स सुरक्षा को बढ़ावा दे सकता है। दोनों में ‘भारत माता की जय’ की चेतना दिखाई देती है।जनता ने जिस तरह शास्त्रीजी का साथ दिया था, उसी तरह मोदी के आह्वान पर भी व्यापक चर्चा और समर्थन देखने को मिल रहा है। हालांकि दोनों परिस्थितियों में अंतर भी है। शास्त्रीजी का दौर युद्धकालीन और प्रत्यक्ष अस्तित्व-रक्षा का था, जबकि मोदी का संदर्भ आर्थिक संकट और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ा है।

1965 में भारत एक गरीब देश था, जबकि आज भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में बढ़ रही उभरती शक्ति है।ये दोनों आह्वान भारतीय लोकतंत्र की उस अनूठी परंपरा को दर्शाते हैं, जिसमें प्रधानमंत्री जनता को शासक नहीं, बल्कि सेवक की भूमिका में संबोधित करते हैं। मोदीजी का आह्वान आधुनिक संकट में पुरानी त्याग भावना को प्रासंगिक बनाता है, जबकि शास्त्रीजी का आह्वान यह साबित करता है कि छोटा कद और बड़ा दिल पूरे राष्ट्र को एकजुट कर सकता है।समानता इस भावना में है कि संकट “हमारा” है और समाधान भी “हमारा” ही है। असमानता केवल विकास के चरणों में है। बेशक, 1965 अस्तित्व की लड़ाई थी, जबकि आज स्थिति वैसी नहीं है।भारतीय इतिहास में ऐसे आह्वान विरले ही देखने को मिलते हैं, जो पीढ़ियों को प्रेरित करें। राष्ट्र-प्रथम की भावना में छोटे त्याग बड़े परिणाम लाते हैं। शास्त्रीजी ने कहा था, “भूख से मरना पसंद है, लेकिन स्वाभिमान से समझौता नहीं।” मोदीजी उसी भावना को आर्थिक स्वाभिमान के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं। यह परंपरा भारत को निरंतर मजबूत बनाती रहेगी।

 

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