सादगी, शुचिता और राष्ट्र चेतना का नया संदेश

प्रधानमंत्री जी का आव्‍हान- राष्‍ट्र चेतना की विजय

प्रो. राजकुमार आचार्य

By : स्वदेश डेस्क
प्रधानमंत्री जी का आव्‍हान- राष्‍ट्र चेतना की विजय

Special News

राजनीति में शुचिता की जो बात दीनदयाल जी उपाध्याय एवं श्यामा प्रसाद जी मुखर्जी करते थे और स्वयं प्रमाणिक थे वही बात वर्तमान प्रधानमंत्री श्री मोदी कर रहे हैं। यह भारतीय लोकतंत्र को, जनप्रतिनिधियों को, समाज और राष्ट्र को दिशा देने वाले कार्य है। प्रधानमंत्री जी का यह कहना कि देश के वर्तमान हालात में हमें पेट्रोल, डीजल का उपयोग मितव्ययिता से करना चाहिए। जिससे विदेशी मुद्रा की बचत हो सके। इसके साथ उन्होंने एक साल तक सोने खरीदने से बचने, वेबजह विदेशी यात्राओं आदि से परहेज की बात कही है। इससे न केवल देश के विकास हेतु हम सबका गिलहरी की भांति सहयोग होगा। बल्कि देश में राजनेताओं के आचरण व्यवहार में प्रदर्शन प्रभाव से मुक्ति भी दिखाई देगी जो आगे जाकर धीरे-धीरे कथनी करनी के अंतर को काम करेगी। प्रधानमंत्री जी ने न केवल आह्वान किया है बल्कि स्वयं के वाहन काफि‍लों में कमी करके कड़ा संदेश दिया है जो स्तुतय है  और अनुकरणीय है। आज देश जिस तेजी से आगे बढ़ रहा है। उसको लेकर सभी क्षेत्रों में गीता के श्लोक-- 

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन: ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ (3.21)

अर्थात श्रेष्ठ (महान या आदर्श) पुरुष जो जो आचरण व्यवहार करते हैं, सामान्‍य मनुष्य भी वैसा ही आचरण करते हैं। वे पुरुष जिस आदर्श या प्रमाण को स्थापित करते हैं, समाज (जनता) उसी का अनुसरण करने लगता है।

समाज के मार्गदर्शकों, नेताओं और बड़ों का आचरण बेहद महत्वपूर्ण होता है। वे अपने कर्मों और आदर्शों से समाज की दिशा तय करते हैं, क्योंकि आम लोग हमेशा उन्हें ही अपना आदर्श मानकर उनके पद चिन्‍हों पर चलते हैं। आज देश के विभिन्न राज्यों में जिस दल की सरकारें है और उनके शीर्ष नेताओं के आचरण व्यवहार का सीधा असर देश भर के जन प्रतिनिधियों को प्रभावित करता है। उनके द्वारा वाहनों के लंबे काफिलों को कम करने का संदेश यह न केवल फिजूलखर्ची रोकना होगी बल्कि प्रदर्शन प्रभाव से हटाकर समाज को सादा सरल उपयोगी और आवश्यक साधनों के प्रयोग की ओर अमुख करता है। तीसरे अध्याय के 21वें श्लोक को प्रातः स्मरणीय ब्रह्मलीन स्वामी रामसुखदास जी महाराज ने कहा है की श्रेष्ठ मनुष्य जो जो आचरण करता है, दूसरे मनुष्य वैसा वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण देता है, दूसरे मनुष्य उसी के अनुसार आचरण करते हैं। और यही आदर्श वर्तमान प्रधानमंत्री जी ने प्रस्तुत किया है जिससे आज मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री, मंत्रियों सहित देश के अन्य जनप्रतिनिधि अपने कार्यों, नीतियों से प्रामाणिक रूप से सिद्ध कर रहे हैं। 

भारतीय जीवन दृष्टि एवं जीवन मूल्यों में भारतीय दर्शन में, सृष्टि, विश्व और परमेष्ठि (आत्मा परमात्मा एवं प्रकृति) के रहस्यों को तर्क एवं अनुभव के आधार पर संपूर्णता से समझने का प्रयास ज्ञान परंपरा में किया गया है जिससे जीवन दृष्टि निर्मित होती है। इससे चिंतन में मनोविज्ञान जन्‍मता है, इसी से मूल्‍य निर्मित होते हैं और इसी को व्यवहार में लाने हेतु आचरण की बात आती है। इस प्रकार का आचरण करने वाले चरित्र और संस्कारों से संपन्न मनुष्यों के समूह से संस्कृति का निर्माण होता है। उक्त विशेषता को ही भारत की सनातन सांस्कृतिक परंपरा चरितार्थ करती है। भारतीय संस्कृति सनातन है। संस्कृति का शाब्दिक अर्थ सम्यक कृति है। सनातन का अर्थ है नित्य नूतन चिरपुरातन अर्थात जो नित्य नया होते हुए भी अपनी परंपराओं से जुड़कर अपने उत्‍स को प्राप्त करता है, वही सनातन है। इसलिए भारतीय संस्कृति के बारे में मार्क ट्वेन ने कहा है कि भारत उपासना पंथों की भूमि, मानव जाति का पालना, भाषा की जन्मस्थली, इतिहास की माता, पुराणों की दादी, परंपराओं की परदादी है। मनुष्य के इतिहास में जो भी मूल्यवान एवं सृजनशील सामग्री है उसका मंजर अकेले भारत में है। मुगलों और अंग्रेजों के आक्रमणों ने इस संस्कृति को नुकसान पहुंचाया है और अब संस्कृति के संवहन, संवर्धन का समय आया है। भारत के वैभव के इस काल में प्रधानमंत्री जी के इस प्रकार के आवाहन न केवल राष्ट्रवाद की भावना को सबल करता है बल्कि हमारी संस्कृति की मूल भावना जिसमें त्याग, तपस्या, बलिदान, साधना के साथ-साथ अहिंसा, सत्य और अपरिग्रह का भाव है, उसके प्रगटीकारण का दृणिकरण का आज समय है। हम समाज में परिवार में संस्कारक्षम वातावरण का निर्माण करें जिससे न केवल भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत की विश्व गुरु की छवि का प्रगटीकारण भी प्रेरणा और आदर्श को स्थापित कर सके। इसी बात को महर्षि अरविंद ने मृत्युंजय भारत पुस्तक में कृण्वन्तो विश्वमार्यम् यानि हमारी शिक्षा, व्यवहार का उद्देश्य सारे विश्व के कल्याण की कामना करने वाले भारत के रूप में होनी चाहिए। और यह सुसंस्कृत मनुष्य के निर्माण में निहित है जो समाज को देश को स्वावलंबन, स्वाभिमान एवं आत्मविश्वास जागृत करने का मार्ग प्रशस्त करने से होगा, अपने कार्य व्यवहार की प्रगटीकारण से होगा। आज देश के सामने जो प्रश्न खड़े हुए हैं ना वो उच्च शिक्षित वर्ग ने ही किए हैं।
 
प्रश्‍न जो उच्‍च शिक्षित है, प्रभावी है उनके द्वारा निर्माण हुए हैं भ्रष्टाचार गरीब व्‍यक्ति नहीं करता देश के साथ गद्दारी अनपढ़ व्‍यक्ति नहीं करता है। इसलिए विद्वान की भाषा अलग है। बुद्धिमान की भी भाषा अलग है। जीवन दृष्टिकोण को आज प्रदर्शनकारी, अर्थ प्रभावी व्यर्थ के आडंबरों से हटकर श्रेष्ठ जीवन मूल्यों के साथ जीवन शैली जीने की है। उसके लिए यह सब आह्वान प्रयोग है। आज राजनीति सेवा का स्वरूप कम है हमारी  ज्ञान परंपरा मैं एक कहानी आती है जिसमें एक महात्मा निर्जन स्थान पर ध्यान साधना में थे। इसी बीच एक घुड़सवार जो संपन्न दिखाई देता है थका-हारा, भूखा-प्यास वहां पहुंचकर महात्मा से पानी मांगता है तो महात्मा उसे हाथ के इशारे से कुछ दूर पर एक पेड़ था, उसकी ओर इशारा करके कहते हैं कि उस वृक्ष के नीचे जाकर जो तुम्हारी इच्छा हो मांगलो पूरी हो जाएगी। प्यासा आदमी वहां जाकर पानी भोजन की मांग करता है और पूर्ति होने पर विश्राम की इच्छा करता है तो बिस्तर भी आ जाता है। नींद से जागने पर उसे दिखाई देता है कि साधु महात्मा उठकर जाने को तत्पर है तो वह आवाज देकर रोकता है और पूछता है कि आप कहां जा रहे हैं और वह वृक्ष क्या है वह मुस्कान कर जवाब देते हैं कि वह कल्‍प वृक्ष है जो भी कामना मनुष्य करता है उसकी पूर्ति वह कर देता है। और मेरे भोजन का समय हो गया है तो मैं जाकर व्यवस्था करूंगा। आश्‍चर्य से देखकर घुड़सवार कहता है कि आप अन्य व्यवस्था करने क्यों जा रहे हैं इस कल्प वृक्ष से अपनी कामना पूर्ति क्यों नहीं करते तो। साधु कहता है कि वह मेरा अधिकार नहीं है। मैं साधनारत जीवन का साधक हूं। पुरुषार्थ से ही आवश्यकता पूरी करता हूं। इस कहानी में राजनीतिक, सामाजिक व्‍यक्तियों के लिए सीधा संदेश है कि सरकारी सुविधाओं रूपी कल्‍प वृक्ष का उपयोग जनता रूपी घुड़सवार के लिए है और अपना स्वयं का जीवन महात्मा की भांति साधना रुपी सेवा के माध्यम से करना चाहिए। 

अपने कार्य में ईमानदारी और पारदर्शिता समाज को हमेशा प्रेरणा प्रदान करती है। मगध साम्राज्य के संवाहक कौटिल्य जिन्हें हम विष्णुगुप्त या चाणक्य के रूप में जानते हैं। उनके तप और साधना ने ही चंद्रगुप्त जैसे शिष्य और राजा पैदा किए लेकिन चाणक्‍य कैसे थे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। उनके आवास पर एक अतिथि मिलने पहुंचे तब वह कोई कार्य लिखने का कर रहे थे। उस अतिथी ने देखा कि उसके प्रवेश करते ही उन्होंने जो दीपक रोशनी के लिए जल रहा था उसे वहीं रखे एक दूसरे दीपक को रोशन किया और पहले वाले दीपक को बुझा दिया। अपनी व्यक्तिगत चर्चा करके जब वह अतिथि जाने लगे उन्होंने जिज्ञासा वश चाणक्य को पूछा कि महोदय क्या मैं एक जिज्ञासा जान सकता हूं। उन्होंने आत्मियता से हां कहा तब उस अतिथि ने पूछा कि जब आपके पास आया तो वह दीपक जल रहा था और आपने उसे बुझाकर दूसरा दीपक क्यों जलाया जबकि दोनों की रोशनी एक सी है। मुस्कुराकर चाणक्य बोले मित्र जब आप मेरे पास आए थे मैं राजकीय कार्य कर रहा था इसलिए जब राजकीय कार्य बंद करके मैं व्यक्तिगत कार्य हेतु आपसे मिलने बैठा तो पहले वाले दीपक को जिसमें राजकीय तेल था बंद कर दिया और राजाश्रय से प्राप्त मेरे पारिश्रमिक से क्रय किए तेल के दीपक को मैने व्यक्तिगत वार्ता हेतु जलाकर आपसे चर्चा की। वह व्‍यक्ति अन्‍तर्मन से चाणक्य को प्रणाम करके चला गया और उसने मन में विचार किया कि ऐसी साधना, तप, त्यागमय जीवन ही चंद्रगुप्तों का निर्माण कर सकते हैं। राजनीति में ऐसे उदाहरण आज भी है लेकिन अपवादों में यह उदाहरण हमें अपने देश के प्रति कैसा त्याग, समर्पण करना चाहिए सीखाता है और इसी भाव को लेकर प्रधानमंत्री महोदय ने वर्तमान वैश्विक संकट को देखते हुए 2047 के विकसित भारत हेतु हमें कैसी सुचिता और सादगीमय जीवन शैली अपनाना चाहिए, संदेश दिया है। निश्चित ही हम देशवासियों, नागरिकों को देशकाल परिस्थिति जन्य आचरण व्यवहार की ओर जाना चाहिए इससे ही देश विकास और प्रगति करते हुए भी संस्कारमय वातावरण से विश्व को संदेश प्रदान करेगा। 
   
     प्रो. राजकुमार आचार्य 
          कुलगुरु 
जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर

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