राजनीति में दल-बदल की समस्या

लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं दल-बदल का खेल

भारतीय राजनीति में विभिन्न दलों के बीच बढ़ते दल-बदल के कारण लोकतंत्र की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं। इससे राजनीतिक स्थिरता प्रभावित हो रही है।

By : स्वदेश डेस्क
लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं दल-बदल का खेल

राजकुमार सिंह
दो साल बाद विपक्षी दलों को अपने गठबंधन 'इंडिया' की याद तो आई, पर उनकी मुश्किलें कम होती नहीं दिख रहीं। 15 साल तक पश्चिम बंगाल पर निष्कंटक राज करने वाली ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के दो-तिहाई विधायक और सांसद छोड़कर जा चुके हैं, तो उद्धव ठाकरे की शिवसेना में एक और विभाजन की औपचारिकता ही शेष है। 'ऑपरेशन टाइगर' की चर्चाओं के बीच उद्धव ठाकरे द्वारा 18 जून को बुलाई गई बैठक में लोकसभा के नौ में से सिर्फ तीन सांसद ही आए। छह सांसदों ने अलग गुट के रूप में मान्यता के लिए लोकसभा अध्यक्ष को पत्र भी लिख दिया है, तो पार्टी नेतृत्व ने व्हिप का उल्लंघन कर बैठक में अनुपस्थिति पर कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है।

संकेत हैं कि निकट भविष्य में शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) को एक और विभाजन झेलना पड़ सकता है। वैसे, पवार की बेटी और राजनीतिक उत्तराधिकारी सुप्रिया सुले के समधी उद्योगपति अरुण लखानी के भाजपाई होने से पारिवारिक संबंध भी बनाए जा चुके हैं। 'श्रीमान ईमानदार' अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी में भी एक और विभाजन की खबर कभी भी आ सकती है। अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी में विभाजन की अटकलों को खुद उत्तर प्रदेश सरकार के दो बड़े मंत्रियों ने हवा दे दी है। संभावित बागियों का आंकड़ा भी बताया जा रहा है और नेता भी।

कोई नहीं जानता कि छोटे और क्षेत्रीय दलों में विभाजन का यह खेल कब रुकेगा। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह खेल पहली बार नहीं खेला जा रहा। सबसे पुराने दल कांग्रेस में विभाजन का लंबा इतिहास है। वामपंथी दल भी कम नहीं टूटे। समाजवादी-लोकदल धारा के राजनीतिक दल तो जाने ही जुड़ने और टूटने के लिए जाते हैं।छोटे दलों में विभाजन के इस बड़े खेल का मकसद संसद में परिसीमन विधेयक पारित करवाना बताया जा रहा है। यह विधेयक पिछली बार सरकार के पास दो-तिहाई बहुमत न होने के चलते गिर गया था। इसलिए यह समझना भी मुश्किल नहीं होना चाहिए कि इस खेल का असली खिलाड़ी कौन है।

बेशक, विभाजन और दलबदल का ऐसा सुनियोजित खेल लोकतंत्र के हित में हरगिज नहीं है, लेकिन इसके लिए सिर्फ प्रायोजकों को जिम्मेदार ठहराना भी समस्या का समाधान नहीं। राजनीति की सामान्य समझ रखने वाला भी समझ सकता है कि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को लगातार चौथी बार सत्ता का जनादेश मिल गया होता तो वहां सब कुछ सामान्य चल रहा होता। अभिषेक बनर्जी को खलनायक के रूप में पेश करने वाले उनके समक्ष यथावत दंडवत हो रहे होते।कहावत भी है कि सफलता आपकी तमाम खामियों को ढंक देती है, लेकिन याद रखिए—ढंक देती है, दूर नहीं करती। सत्ता का प्रलोभन या भय ऐसे ज्यादातर मामलों में मुख्य कारण होता ही है, लेकिन मूल दल और नेता का आचरण भी बगावत के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार करने में अहम भूमिका निभाता है।

अगर ठाकरे परिवार के प्रति निष्ठा की मिसाल मानी जाने वाली शिवसेना टूट सकती है, 'पॉवर पॉलिटिक्स' के बड़े 'प्लेयर' मराठा क्षत्रप शरद पवार की राकांपा टूट सकती है, वाम मोर्चा के 34 साल पुराने शासन को उखाड़ फेंकने के बाद लगातार तीन बार मुख्यमंत्री रहीं ममता बनर्जी की तृणमूल टूट सकती है, तो किसी को भी इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि उसका दल नहीं टूट सकता।किसी दल के सत्तापक्ष या विपक्ष में बैठने का फैसला उस दल का नेतृत्व नहीं, जनता करती है। पर दल कैसे चले और जनता के मुद्दों से जुड़ा रहे, यह तय करना निश्चय ही नेतृत्व का काम है।नवीनतम विभाजन शिवसेना में हुआ है, इसलिए उसी से बात शुरू करते हैं। बाल ठाकरे द्वारा गठित शिवसेना का 60वां स्थापना दिवस मनाए जाने से एक दिन पहले ही यह छठा विभाजन हुआ। किसी भी संगठन में अनुशासन जरूरी है, मगर उसका आतंक बन जाना अच्छा नहीं। बाल ठाकरे के समय शिवसेना नेताओं-कार्यकर्ताओं ही नहीं, आम आदमी के लिए भी आतंक का पर्याय बनी रही।

शिवसेना में पहला विभाजन 1974 में ही हो गया था, लेकिन वह ठाकरे के प्रभाव को प्रभावित नहीं कर सका। पहला बड़ा विभाजन 1991 में हुआ, जब मनोहर जोशी को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने पर ओबीसी नेता छगन भुजबल ने 17 विधायकों के साथ बगावत कर दी। पहले शिवसेना (बी) बनाने वाले भुजबल फिर कांग्रेस में चले गए। तब शरद पवार भी कांग्रेस में हुआ करते थे।शिवसेना में दूसरा बड़ा विभाजन नारायण राणे ने किया। बाल ठाकरे ने उन्हें मुख्यमंत्री तक बनाया, पर जब उद्धव को आगे बढ़ाया जाने लगा तो 2004 में अलग स्वाभिमान पार्टी बनाते हुए राणे कांग्रेस के रास्ते भाजपा में आ गए। बेटे उद्धव को आगे बढ़ाए जाने से खफा भतीजे राज ठाकरे ने भी 2006 में शिवसेना छोड़कर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) बना ली। मनसे भी कमाल नहीं कर पाई और दशकों बाद पिछले चुनावों में दोनों भाई साथ नजर आए।

उद्धव को सबसे बड़ी चोट एकनाथ शिंदे ने पहुंचाई, जिन्होंने जून 2022 में पार्टी तोड़ते हुए उनसे मुख्यमंत्री की कुर्सी भी छीन ली। वही शिंदे इस नए 'ऑपरेशन टाइगर' के कर्ताधर्ता हैं। पर क्या कभी उद्धव की शिवसेना जनहित के किसी मुद्दे पर सड़क पर संघर्ष करती दिखाई दी?बेशक, पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा के शासन में विपक्ष की भूमिका निभाते हुए ममता की तृणमूल ही दिखी, पर एक बार सत्ता में आने के बाद व्यवस्था बदलने का वादा अधूरा ही रहा। दरअसल, ममता ने भी वाम मोर्चा के चुनाव जीतने वाले और संगठन के जरिए शासन चलाने वाले हथकंडों को ही अपना लिया। नतीजतन हर तरह के भ्रष्टाचार के आरोप लगे।

बेशक, ममता की व्यक्तिगत छवि फिलहाल बेदाग नजर आती है, पर यह कुछ-कुछ वैसा ही है कि ईमानदार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में रिकॉर्ड घोटाले हुए। तमाम वरिष्ठ नेताओं को नजरअंदाज कर ममता ने भतीजे अभिषेक को जिस तरह आगे बढ़ाया और वह निरंकुश हो गए, उससे भी स्थितियां बिगड़ीं।बेशक, अखिलेश यादव को पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को जोरदार झटका देने का श्रेय जाता है, लेकिन उनकी कुल जमा राजनीतिक पहचान मुलायम सिंह यादव का पुत्र होना ही है। पिता के जीवनकाल में ही मुख्यमंत्री बन जाने के बावजूद अखिलेश सपा के जनाधार में कुछ जोड़ना तो दूर, उसे संभाल तक नहीं पाए। माना कि यह सोशल मीडिया का दौर है, पर सपा जैसी पार्टी की पूरी राजनीति वहीं तक सिमट जाना उसकी दिशाहीनता भी बताता है।

शरद पवार देश के अनुभवी राजनेताओं में से एक हैं, पर उनकी राजनीति अपनी बेटी सुप्रिया को स्थापित करने तक सिमट गई है। अजीत पवार उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी माने जाते थे, लेकिन सुप्रिया को आगे बढ़ाने से खफा होकर उन्होंने एक नहीं, दो बार राकांपा तोड़ी। उसके बाद भी दोनों गुटों में विलय की चर्चाएं चलीं।सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाते हुए कांग्रेस छोड़ी, फिर भी लगातार उसी से गठबंधन किया। ऐसे में विचारधारा और विश्वसनीयता पर सवाल उठेंगे ही।झारखंड में पर्याप्त वोट होने के बावजूद कांग्रेस राज्यसभा चुनाव में मात खा गई, तो मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की नीयत और 'इंडिया' गठबंधन के आंतरिक समीकरणों पर भी सवाल उठेंगे ही। इसलिए अपने आंतरिक बिखराव के लिए मोदी सरकार और भाजपा पर उंगली उठाते हुए विपक्षी दलों को खुद भी आत्मचिंतन अवश्य करना चाहिए।

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