राजनीतिक आंदोलनों का विश्लेषण

मुखौटे के पीछे की मंशा को भी समझिए...

2011 और 2026 के बीच राजनीतिक आंदोलनों में समानताएं और अंतरों का विश्लेषण। दोनों आंदोलनों की शुरुआत सोशल मीडिया से हुई और उनके पीछे जनमानस की भूमिका अहम रही।

By : नरेंद्र कुमार
मुखौटे के पीछे की मंशा को भी समझिए...

यह सवाल अचानक सामने आ जाए कि 2011 और 2026 में क्या अंतर है? गणित के छात्र को दोनों वर्षों के बीच पंद्रह साल का अंतर दिखेगा, लेकिन राजनीति शास्त्र के जानकारों की नजर में दोनों वर्षों में कई समानताएं हैं, तो कुछ अंतर भी हैं। पहली समानता यह है कि दोनों ही वर्षों में सोशल मीडिया के जरिए आंदोलन खड़े हुए। पहले आंदोलन का मुद्दा था भ्रष्टाचार का विरोध और दूसरे का शिक्षा की बदहाली का विरोध। दोनों आंदोलनों का मुखौटा सामाजिक जीवन में अपनी साख बना चुकी शख्सियतें रहीं। पहले आंदोलन का चेहरा महाराष्ट्र के रालेगांव सिद्धि में सामाजिक कार्य कर चुके अन्ना हजारे रहे, तो बाद वाले आंदोलन का ऐसा ही चेहरा लद्दाख में सामाजिक कार्य से साख हासिल कर चुके सोनम वांगचुक रहे। दोनों ने आंदोलन के दौरान भूख हड़ताल की और दोनों आंदोलनों को धार इनकी भूख हड़ताल से मिली। यह बात और है कि आंदोलन के जोर पकड़ने के बाद दोनों आंदोलनों के असल चेहरों ने अपने मुखौटों को दूर कर दिया। 2011 के असल आंदोलनकारी 'परिवर्तन' और 'कबीर' नाम से एनजीओ चला रहे थे, तो 2026 के आंदोलनकारी उन्हीं के कभी प्रवक्ता रहे।

अब सवाल उठता है कि दोनों आंदोलनों में अंतर क्या रहा? दोनों में एक बड़ा अंतर है। पहले आंदोलन में निशाने पर कांग्रेस थी और दूसरे आंदोलन से उपजी आग पर कांग्रेस अपनी रोटी सेंकने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी लगातार इस मुद्दे पर छात्रों से संवाद कर रहे हैं। इन कार्यक्रमों में उनके निशाने पर प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ रहता है। लोकतंत्र में विरोध और मतभेद होना चाहिए। विपक्ष का काम ही है कि वह लोक से जुड़े मुद्दों को उठाए और सरकार को आगाह करे। लेकिन इस विरोध की भी अपनी मर्यादा होती है। सवाल यह है कि कांग्रेस की ओर से उठ रहे विरोध के सुरों में वह मर्यादा दिख रही है या नहीं?

कांग्रेस नेतृत्व की ओर से जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है, उसे लोकतांत्रिक तो कतई नहीं कहा जा सकता। कांग्रेस के कुछ प्रवक्ता सड़कछाप भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। हाल ही में एक प्रवक्ता अमित शाह की औकात खुलेआम देख रहे थे। बरसों तक पार्टी के पिछलग्गू कार्यकर्ता की भूमिका में रहे और औकात नापने वाले नेता अब सांसद बन चुके हैं। जब ऐसे लोगों को सांसद बनाकर कांग्रेस की ओर से पुरस्कृत किया जाएगा, तो ऐसी भाषा परिपाटी ही बन जाएगी। दूसरे छुटभैये टाइप नेता भी ऐसी भाषा का खुलकर प्रयोग करेंगे। उन्हें लगेगा कि ऐसी भाषा से खुश होकर पार्टी आलाकमान उन्हें सांसद या विधायक बनाकर पुरस्कृत कर सकता है।

रही बात शिक्षा के मुद्दे उठाने की, तो उस पर भी विचार किया जाना जरूरी है। शिक्षा में गिरावट की शुरुआत तो अरसा पहले ही हो गई थी। 2004 में यूपीए की सरकार बनने के बाद देश में सिर्फ 38 डीम्ड विश्वविद्यालय थे, लेकिन मनमोहन सरकार के दौरान शिक्षा की दुकानों की बाढ़ आ गई और 2009 आते-आते देश में 118 डीम्ड विश्वविद्यालय हो गए। इनमें ज्यादातर शिक्षा और डिग्री की दुकानों की तरह काम करने लगे थे। आज तो इनकी संख्या और ज्यादा हो गई है। यूपीए शासनकाल में पश्चिम के नामी विश्वविद्यालयों और संस्थानों को भारत में शाखा खोलने के लिए प्रेरित किया जाना शुरू हुआ। इसका विरोध 2009 में जीव विज्ञान के लिए नोबेल पुरस्कार जीत चुके भारतीय मूल के जीव विज्ञानी वेंकट रामाकृष्णन ने किया था। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा था कि पश्चिम के उत्कृष्ट विश्वविद्यालयों ने सिंगापुर या दुबई जैसी जगहों पर शाखाएं खोलीं, लेकिन वे अपने मूल कैंपस की तरह शिक्षा देने में सफल नहीं रहे।

दिलचस्प है कि उन दिनों विपक्षी बीजेपी ने भी इन पर सवाल नहीं उठाया और राहुल गांधी के भी उर्वर दिमाग में उन दिनों वैसे विचार नहीं आए, जैसे आज आ रहे हैं। ऐसा नहीं कि उनका दिमाग उर्वर नहीं था। तब वे महाराष्ट्र के यवतमाल के एक गांव की किसान कलावती से मिलने गए थे। कलावती के पति ने कर्ज के जाल से मुक्ति की राह आत्महत्या में खोज ली थी। तब कलावती से मिलने को लेकर उन्होंने लोकसभा में जो भाषण दिया था, उसे तत्कालीन मीडिया और कांग्रेसी राजनीति ने भूतोनभविष्यति बताया था। दिलचस्प यह है कि उस दौर के टीवी मीडिया के कर्णधार आज यू-ट्यूबर हो गए हैं। तब राहुल की बलैया लेने वाले आज भी उनकी बलैया ले रहे हैं, जबकि उनके विचार तब के विचारों से ठीक उलट हैं।

देश की शिक्षा में गिरावट की वजहें सिर्फ सरकारी नहीं हैं, भारतीय मानस भी है। अगर परिवार संपन्न है, तो किसी की दिलचस्पी अपने बच्चे को सरकारी और देसी विश्वविद्यालय और कॉलेज में पढ़ाने की नहीं है। सर्वेक्षण करने से पता चल जाएगा कि भारतीय शिक्षा पर सवाल उठाने वालों में से ज्यादातर लोगों के बच्चों ने सरकारी स्कूल का मुंह ही नहीं देखा है। बस गाल बजाने के लिए वे शिक्षा के मुद्दे का इस्तेमाल कर रहे हैं और राहुल गांधी जैसी राजनीति का साथ दे रहे हैं।

तेईस जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद जेन जी का राजनीति के केंद्र में आना अस्वाभाविक नहीं है। राजनीति विजेताओं का सम्मान करती है और जेन जी भी फिलहाल विजेता ही हैं। सरकार और बीजेपी जहां उन्हें पुचकार रही है, वहीं कांग्रेस की अगुआई में विपक्ष उसके सरकार विरोधी मानस को और धार दे रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो उसे मोदी सरकार के खिलाफ उग्र बना रहा है। उसकी गालियों को सही ठहराना उसे उग्र और असभ्य बनाने की ही कोशिश है।

कांग्रेस भले ही आज जेन जी को जगह-जगह उठा रही है, लेकिन हकीकत यह है कि वह जंतर-मंतर पर जारी काकरोच जनता पार्टी के आंदोलन से असहज थी। 18 जुलाई को जब दिल्ली पुलिस ने सोनम वांगचुक को धरना स्थल से उठाकर अस्पताल में दाखिल कराया, तो कांग्रेस के बड़े नेताओं ने दबी जुबान से उसकी आलोचना तक की थी। कुछ बड़े नेताओं ने सरकार को बेवकूफ ठहराते हुए ऑफ द रिकॉर्ड कहा था कि सोनम को बहुत पहले जंतर-मंतर से उठा लेना चाहिए था। भूख हड़ताल से जब सोनम की हालत खराब होने लगी, तो काकरोच जनता पार्टी के समर्थकों और वामपंथी इन्फ्लूएंसरों ने राहुल गांधी की आलोचना तेज कर दी। वामपंथी इकोसिस्टम के यू-ट्यूबर और सोशल मीडिया हैंडलर ने राहुल पर दबाव बनाना शुरू कर दिया कि वे जंतर-मंतर आएं। लेकिन राहुल नहीं आए।

काकरोच जनता पार्टी के 20 जुलाई के संसद मार्च में हिंसा हुई और इसे लेकर माहौल बनने लगा, तो राहुल उसका लाभ उठाने के लिए मैदान में कूद पड़े। प्रधानमंत्री के आधिकारिक निवास का घेराव उनकी औचक रणनीति का हिस्सा रहा। चूंकि उत्तर प्रदेश में कुछ ही महीने बाद विधानसभा का चुनाव है, लोगों को उम्मीद है कि राहुल इसी तरह सक्रिय रहेंगे। हालांकि, उनका अतीत कुछ अलहदा है। वे एक मुद्दा पकड़ते हैं, कुछ दिन तक उसे गरमाए रखते हैं और फिर विदेश उड़ जाते हैं।

जेन जी के हितों में कदम उठने चाहिए। लेकिन उनके आंदोलन के पीछे की कहानियों और विपक्ष की मंशा पर भी ध्यान देना जरूरी है। यह देखा जाना बाकी है कि 2011 की तरह क्या काकरोच जनता पार्टी मुकम्मल राजनीतिक दल के रूप में सामने आएगी या फिर आम आदमी पार्टी का आनुषंगिक संगठन बनकर काम करती रहेगी। वैसे देश में उसकी छवि धीरे-धीरे आम आदमी पार्टी के आनुषंगिक संगठन के रूप में स्थापित होती जा रही है।

उमेश चतुर्वेदी

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हैं।)

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