राजनीतिक दलों में टूट-फूट

दलीय टूट-फूट के सवालों से मुठभेड़ जरूरी

भारतीय राजनीतिक दलों में दल-बदल की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिससे लोक विश्वास पर गहरा असर पड़ सकता है। पार्टियों को अपनी निष्ठा और सिद्धांतों पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।

By : स्वदेश डेस्क
दलीय टूट-फूट के सवालों से मुठभेड़ जरूरी

उमेश चतुर्वेदी

डॉ. लोहिया ने यह बात समाजवादियों से कही थी, लेकिन लगता है कि उनकी बात आज के विपक्षी दलों ने ज्यादा शिद्दत से मान ली है। लोहिया ने कहा था, "सुधरो या टूट जाओ।" लोहिया की इस अपील को उनके समाजवादी चेलों ने तो माना ही, अब गैर-समाजवादी अनुयायी भी इसे स्वीकार कर चुके हैं। चार मई को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद सबसे बड़ी टूट उस ममता की पार्टी में हुई, जिन्हें राजनीतिक मैदान का योद्धा माना जाता था। जो झुकना नहीं जानतीं। पहले उनके 80 में से 53 विधायक टूट गए और विधानसभा में उन्होंने अपना अलग गुट बना लिया। इसके बाद लोकसभा में उनके 29 में से 20 सांसद भी टूट गए। दिलचस्प यह है कि उन्होंने एक अनाम-सी पार्टी नेशनल सिटिजन्स पार्टी में अपना विलय कर लिया। ममता की राह पर उद्धव ठाकरे की शिवसेना के भी सांसद चल पड़े हैं और हो सकता है कि इन पंक्तियों के प्रकाशित होने तक उनके नौ में से छह लोकसभा सांसद पाला बदलकर एकनाथ शिंदे की शिवसेना के धनुष पर तीर चढ़ा रहे हों। सुगबुगाहट तमिलनाडु की द्रविड़ मुनेत्र कषगम के संसदीय दल में भी टूट-फूट की दिख रही है। इस बीच सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेता ओमप्रकाश राजभर ने अखिलेश यादव की अगुआई वाली समाजवादी पार्टी में भी टूट की भविष्यवाणी कर दी है।

भारतीय राजनीति में दल-बदल कोई नई बात नहीं है। अतीत में भी दल-बदल होते रहे हैं। हरियाणा में तो तकरीबन पूरा विधायक दल ही दूसरे दल में समा गया था। उसी के बाद से दलबदल के लिए भारतीय राजनीति में ‘आयाराम-गयाराम’ का मुहावरा चल पड़ा था। लेकिन पश्चिम बंगाल के चुनावों के बाद जिस तरह दल-बदल या दलों में टूट-फूट हो रही है, वह अप्रत्याशित है। इतने बड़े पैमाने पर राजनीतिक दलों में भगदड़ पहले नहीं हुई थी। पहले किसी एक या दो दल में ऐसा होता था। ऐसा लग रहा है कि जैसे बीजेपी विरोधी दलों को दल-बदल या टूट-फूट वाली छूत की बीमारी लग गई है। प्रभावित दल इस टूट-फूट के लिए बीजेपी को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। उनका आरोप है कि बीजेपी टूटने वाले नेताओं को मोटी रकम का लालच दे रही है। उनका यह भी आरोप है कि संवैधानिक सुधारों के लिए चूंकि बीजेपी को संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत है, इसलिए वह धन और बाहुबल का लालच देकर दलों को तोड़ रही है।

एक बारगी मान भी लें कि बीजेपी की शह पर ये टूट-फूट हो रही है, तो एक प्रश्न जरूर उठता है कि आखिर राजनीतिक दलों ने ऐसे नेताओं को अपना सांसद या विधायक बनाने के लिए कैसे चुना? क्या उनके चयन में कोई गलती रही? सवाल यह भी उठता है कि जो टूट रहे हैं, क्या सांसद या विधायक बनाने को लेकर जब उनका चयन किया जा रहा था, तब उनकी कौन-सी खासियत देखी गई थी? क्या दल के प्रति उनकी निष्ठा, उनके चरित्र आदि का ध्यान नहीं रखा गया? सवाल यह भी उठता है कि क्या बाहुबल या धनबल ही उनके चयन की बड़ी योग्यता मानी गई? इन सवालों का ईमानदारी से जवाब प्रभावित दल भले ही न दें, लेकिन यह छिपी हुई बात नहीं है कि भारतीय राजनीति में संसद या विधानसभा में नुमाइंदगी के लिए दलीय निष्ठा की बजाय दूसरे कारकों का ज्यादा ध्यान रखा जा रहा है। इसमें चुनाव जीतने की क्षमता, चुनाव में खर्च करने की सामर्थ्य और जरूरत पड़ने पर पार्टी के लिए धन और बाहुबल के साथ खड़े होने की शक्ति भी देखी जाती है। कई बार तो सिर्फ पैसे के दम पर ही टिकट हासिल कर लिए जाते हैं। यही वजह है कि मौका मिलते ही ये नेता अपनी निष्ठा बदलने में देर नहीं लगाते।

निश्चित तौर पर राजनीतिक दलों के गठन की बुनियाद उनका राजनीतिक और सामाजिक विचार तथा सिद्धांत होता है। इसके बावजूद लगातार महंगी होती चुनाव प्रक्रिया ने विचारधारा की राजनीति को पीछे खिसका दिया है। विचारधारा की दुहाई तभी तक दी जाती है, जब तक उसकी राह में धनबल या बाहुबल नहीं आता, और जब तक सत्ता उससे दूर रहती है। अगर विचारधारा से विचलन के बाद सत्ता आती दिखती है, तो राजनीतिक दल और नेता भी अपनी उस विचारधारा को कुछ वक्त के लिए ताक पर रख देते हैं।

सिद्धांत और निष्ठाएं भी तब तक के लिए टाल दी जाती हैं। जब दलीय आधार पर ऐसा होता है, तो निजी स्तर पर किसी सांसद और विधायक को आर्थिक लाभ या सत्ता में भागीदारी का मौका मिलेगा, तो वह क्यों न टूटेगा? सवाल यह है कि जब दल और उसका अगुआ ही अपनी निष्ठा और विचारधारा को सत्ता के लिए किनारे रख देगा, तो मौका मिलने पर उसका सांसद और विधायक ऐसा क्यों नहीं कर सकता? उद्धव ठाकरे के संसदीय दल में बिखराव की बड़ी वजह सत्ता के लिए पार्टी के सिद्धांतों से समझौता और कांग्रेस का साथ लेना रहा है। टूट रहे सांसदों को लेकर आरोप लगाने वाले दलों को भी सोचना होगा कि आखिर उन्होंने किस तरह के लोगों को चुना? सवाल यह है कि जब पैसे लेकर टिकट दिए जाएंगे, जब दल और विचारधारा की निष्ठा के बजाय चुनावी टिकट हासिल करने के अन्य कारण होंगे, तो फिर इस प्रक्रिया से चुनकर आए सांसदों और विधायकों की खरीद-फरोख्त पर सवाल कैसे उठाए जा सकते हैं? उन्हें दलीय निष्ठा के प्रति कैसे बांधे रखा जा सकता है?

दलीय टूट-फूट का अभी कोई बड़ा नुकसान भले ही नहीं दिख रहा हो, लेकिन आने वाले दिनों में इसका एक बड़ा असर लोक विश्वास के दरकने के रूप में दिख सकता है। आज का मतदाता बहुविध सूचनाओं के तमाम स्रोतों से लैस है। उसकी राजनीतिक समझ मीडिया क्रांति से पहले के मतदाताओं की तुलना में कहीं ज्यादा विकसित है। उसका सामान्य ज्ञान कमजोर भले ही हो सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया और उसमें आ रहे निष्ठागत बदलावों की पृष्ठभूमि को वह समझ रहा है। ऐसे में उसका भरोसा मौजूदा राजनीतिक तंत्र से उठ सकता है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया से उसका भरोसा टूटना लोकतंत्र के लिए खतरनाक हो सकता है।

दल बदलने वाले अपने प्रतिनिधि के बारे में वह सवाल उठा सकता है कि जिस सोच के साथ उसने उसे वोट दिया, उसका प्रतिनिधि उसी सोच के साथ गद्दारी कर रहा है। कई बार मतदाता स्थानीय कारणों के साथ-साथ अपनी वैचारिक निष्ठा के चलते भी मत देता है। हो सकता है कि राष्ट्रीय स्तर पर किसी दल विशेष को बड़ा समर्थन मिला हो, लेकिन उसी दल विशेष के किसी स्थानीय प्रतिनिधि को स्थानीय निष्ठाओं, जरूरतों और कारकों के साथ-साथ वैचारिक कारणों से मतदाताओं का समर्थन न मिला हो। इसका मतलब यह है कि राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन हासिल करने वाले दल के कार्यक्रमों और योजनाओं की बजाय स्थानीय योजनाओं को लेकर लोगों की अपनी अलग दृष्टि या अलग चाहत है। स्थानीय मतदाताओं का भरोसा उसे इसी वजह से मिला है। लेकिन यदि उसका प्रतिनिधि अपनी निष्ठा बदल लेता है, तो स्थानीय मतदाता खुद को आहत और ठगा हुआ महसूस कर सकता है।

चूंकि इन दिनों दलीय टूट-फूट व्यापक स्तर पर हो रही है, इसलिए मतदाताओं पर इसका व्यापक असर पड़ सकता है। इसके चलते मतदाता आहत महसूस कर सकते हैं और इसे विश्वासघात भी मान सकते हैं। इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भरोसा कमजोर हो सकता है। मौजूदा राजनीतिक तंत्र को मतदाताओं के मनोभावों को इस नजरिए से भी समझना होगा। भारतीय लोकतंत्र को भरोसेमंद बनाने की राह राजनीतिक दलों को ही खोजनी होगी। क्योंकि लोहिया की टूटने की अपील के पीछे भी सुधार की भावना थी। लेकिन सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दल संपूर्णता में इस सवाल से मुठभेड़ करने को तैयार हैं?

संबंधित सामग्री

'नसीरुद्दीन शाह दिमागी नक्सल, देर से पता चला', किरेन रिजिजू ने Video शेयर कर कहा ये लोकतंत्र के लिए खतरनाक

'नसीरुद्दीन शाह दिमागी नक्सल, देर से पता चला', किरेन रिजिजू ने Video शेयर कर कहा ये लोकतंत्र के लिए खतरनाक

नसीरुद्दीन शाह ने खुद को 'दिमागी नक्सल' बताते हुए केंद्र सरकार पर सवाल उठाए। उनके वीडियो पर केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।

Oct 29, 2026
बाल ठाकरे से राहुल गांधी तक, कानून की कसौटी

बाल ठाकरे से राहुल गांधी तक, कानून की कसौटी

भारतीय राजनीतिक नेताओं, जैसे बाल ठाकरे और राहुल गांधी, की कानूनी जवाबदेही और चुनावी आचरण का विश्लेषण। कानून धर्म और जाति के उपयोग पर कैसे नियंत्रण करता है।

Oct 19, 2026
भारत में बांग्लादेश-फ्रांस जैसी हिंसा फैलाने की थी योजना-किरेन रिजिजू

भारत में बांग्लादेश-फ्रांस जैसी हिंसा फैलाने की थी योजना-किरेन रिजिजू

नेहा बोरा के बांग्लादेश के Gen-Z आंदोलन से प्रेरित होने वाले बयान पर केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने सवाल उठाए। BJP ने राहुल गांधी और विपक्ष पर गंभीर आरोप लगाए।

Oct 18, 2026