भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी एकता और विविधता है। यहाँ अलग-अलग विचार, मत, पंथ, भाषाएँ, परंपराएँ और जीवन-दृष्टियाँ सदियों से साथ-साथ विकसित होती रही हैं। यही विविधता भारतीय लोकतंत्र को विशिष्ट बनाती है।
लोकतंत्र में हर नागरिक को अपने विचार व्यक्त करने, असहमति जताने और सामाजिक प्रश्नों पर अपनी बात रखने का अधिकार है। लेकिन इसी अधिकार के साथ एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी जुड़ा है क्या विचारों की स्वतंत्रता का अर्थ किसी की आस्था, संस्कृति और परंपरा का अपमान करने की स्वतंत्रता भी है? निश्चित रूप से नहीं।
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। यह स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है। किसी सरकार, संस्था, विचारधारा अथवा सामाजिक व्यवस्था की आलोचना करना नागरिक का अधिकार है। असहमति लोकतंत्र को मजबूत करती है, क्योंकि बिना प्रश्नों और बहस के कोई भी समाज आगे नहीं बढ़ सकता। लेकिन संविधान प्रदत्त स्वतंत्रता निरंकुश नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टाचार, नैतिकता तथा अन्य नागरिकों के अधिकार और सम्मान भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार हैं। यहीं से हमें आलोचना और अपमान के बीच का अंतर समझना होगा।
किसी धार्मिक परंपरा में मौजूद सामाजिक कुरीतियों पर प्रश्न उठाना सुधार की प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है। इतिहास और परंपराओं का आलोचनात्मक अध्ययन भी आवश्यक है। लेकिन किसी धर्म, देवी-देवता, प्रतीक या करोड़ों लोगों की आस्था को जानबूझकर उपहास, अश्लीलता या अपमान का विषय बनाना स्वस्थ लोकतांत्रिक विमर्श नहीं कहा जा सकता।
हाल में जंतर-मंतर पर सनातन धर्म और उसकी आस्थाओं को लेकर जिस प्रकार की फूहड़ता और आपत्तिजनक अभिव्यक्ति देखने को मिली, उसने इसी प्रश्न को फिर सामने ला दिया है। विरोध और असहमति लोकतंत्र का अधिकार हैं, लेकिन विरोध की भाषा और तरीका भी लोकतांत्रिक मर्यादा के अनुरूप होना चाहिए। किसी विचार से असहमति व्यक्त करने के लिए किसी समुदाय की आस्था को अपमानित करना आवश्यक नहीं है।
सनातन परंपरा भारत की सांस्कृतिक स्मृति का एक अत्यंत व्यापक और प्राचीन हिस्सा है। यह केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है। इसके भीतर दर्शन, योग, वेदांत, सांख्य, न्याय, मीमांसा, भक्ति, लोकपरंपराएँ और जीवन को देखने के अनेक दृष्टिकोण समाहित हैं। इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक इसकी निरंतर संवाद और आत्ममंथन की परंपरा रही है। इसलिए सनातन की आलोचना से डरने की आवश्यकता नहीं है; आवश्यकता इस बात की है कि आलोचना तथ्य, तर्क और शालीनता के साथ हो।
सनातन के भीतर सामाजिक सुधार की आवश्यकता को स्वीकार करना और सनातन की मूल सांस्कृतिक-आध्यात्मिक परंपरा का सम्मान करना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। अस्पृश्यता, भेदभाव और अन्य सामाजिक कुरीतियों का विरोध होना चाहिए। लेकिन सामाजिक कुरीतियों के विरोध के नाम पर संपूर्ण सनातन परंपरा को अपमानित करना भी उचित नहीं है। किसी वृक्ष की कुछ सूखी शाखाओं को काटने के लिए पूरे वृक्ष को नष्ट करना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती।
आज सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों ने अभिव्यक्ति को अभूतपूर्व शक्ति दी है। एक व्यक्ति की कही बात कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच सकती है। ऐसे समय में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ अभिव्यक्ति की जिम्मेदारी पर भी चर्चा जरूरी है। हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या हमारी बात किसी व्यवस्था की आलोचना कर रही है या किसी व्यक्ति की गरिमा को चोट पहुँचा रही है? क्या हम किसी विचार का विरोध कर रहे हैं या किसी समुदाय की आस्था का उपहास कर रहे हैं?
यह प्रश्न केवल सनातन के संदर्भ में नहीं है। भारत में हर धर्म और हर समुदाय की आस्था सम्मान की पात्र है। जिस सिद्धांत की अपेक्षा हम अपनी आस्था के लिए करते हैं, वही सम्मान हमें दूसरे की आस्था के लिए भी रखना होगा। यदि हम अपने धर्म के अपमान पर आहत होते हैं, तो हमें दूसरे धर्म के अपमान को भी उचित नहीं ठहराना चाहिए। यही वास्तविक धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक सह-अस्तित्व की भावना है।
दूसरी ओर, सनातन समाज को भी आलोचना सुनने का साहस रखना होगा। हर आलोचना को ‘सनातन पर हमला’ कह देना भी उचित नहीं है। जहाँ तथ्यात्मक प्रश्न हैं, वहाँ तथ्य और तर्क से उत्तर देना चाहिए; जहाँ सामाजिक सुधार की आवश्यकता है, वहाँ आत्ममंथन होना चाहिए; और जहाँ जानबूझकर अपमान या फूहड़ता है, वहाँ शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से उसका विरोध होना चाहिए।
भारत को ऐसी संस्कृति की आवश्यकता है जिसमें विचारों से संघर्ष हो, व्यक्तियों से नहीं; तर्क से उत्तर दिया जाए, गाली से नहीं; सुधार की बात हो, अपमान की नहीं। विचारों की स्वतंत्रता लोकतंत्र की शक्ति है और आस्था का सम्मान सामाजिक शांति की आधारशिला। इनमें से किसी एक को बचाने के लिए दूसरे को समाप्त करने की आवश्यकता नहीं है। दोनों साथ रह सकते हैं और दोनों को साथ रहना चाहिए।
सनातन परंपरा पर प्रश्न पूछे जा सकते हैं, उसकी आलोचना की जा सकती है, उसके भीतर सुधार की माँग की जा सकती है लेकिन करोड़ों लोगों की आस्था को फूहड़ता और अपमान का विषय बनाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का श्रेष्ठ उपयोग नहीं है। आज आवश्यकता ऐसी अभिव्यक्ति की है, जो स्वतंत्र भी हो और जिम्मेदार भी; निर्भीक भी हो और मर्यादित भी। यही लोकतंत्र की परिपक्वता है और यही भारत की सह-अस्तित्व की परंपरा की वास्तविक शक्ति है।

प्रो. रामप्रसाद प्रजापति
(लेखक जेएनयू, नई दिल्ली में प्राध्यापक हैं)