अनुराग उपाध्याय
अभिनेता संजय मेहता- 'रंगमंच से सिनेमा तकः सच, संवेदना और साधना की यात्रा
थिएटर की गहराई, सिनेमा की व्यापकता और समाज के प्रति सच्चाई की प्रतिबद्धता - इन तीनों के संगम का नाम है संजय मेहता। फिल्म धुरंधर 2 में अपने चर्चित किरदार "अब्दुल भूटोवी 'से सुर्खियों में आए मेहता अभिनय को केवल पेशा नहीं, बल्कि साधना मानते हैं। उनके विचारों में भारतीय रंगमंच की जड़ों से । जुड़ी समझ, सिनेमा की सामाजिक भूमिका और कलाकार की नैतिक जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से झलकती है। उनका मानना है कि नाट्यशास्त्र केवल कला नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाला शास्त्र है ! - और यही सोच उन्हें एक सजग और संवेदनशील कलाकार बनाती है। रंगमंच । दिवस पर उन्होंने 'स्वदेश' से रंगमंच के विभिन्न पहलुओं पर बात की।
प्रस्तुत है बातचीत के अंश-
धुरंधर 2: सफलता से परे सच्चाई की जीत
फिल्म धुरंधर 2 संजय मेहता के करियर का अहम मोड़ साबित हुई। बड़े बजट में बनी इस फिल्म की अप्रत्याशित सफलता ने उन्हें भी चौंकाया। हालांकि शुटिंग के दौरान उन्हें फिल्म की संभावनाओं का अंदाजा था, लेकिन इतनी बड़ी उपलब्धि की उम्मीद नहीं थी। वे इस सफलता का श्रेय फिल्म की कहानी और उसकी सच्चाई को देते हैं। फिल्म में ऐसे संवेदनशील और जटिल विषयों को उठाया गया है, जो आमतौर पर सार्वजनिक विमर्श से दूर रहते हैं। यही कारण है कि जहां दर्शकों ने इसे सराहा, वहीं कुछ वर्षों ने इसे प्रोपेगेंडा के रूप में भी देखा।
थिएटरः जहां सीखना कभी खत्म नहीं होता
संजय मेहता के लिए रंगमंच केवल अभिनय का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन का विद्यालय है। उनका मानना है कि थिएटर से जुड़ने वाला व्यक्ति लगातार सीखता रहता है। वे अपने गुरु 'बाबा कानून साहब' की परंपरा को याद करते हुए कहते हैं कि पहले थिएटर में किरदार की तैयारी और प्रस्तुति की गहराई पर विशेष ध्यान दिया जाता था, जो अब कम होता जा रहा है। थिएटर कलाकार को अनुशासन, नैतिकता और संवेदनशीलता सिखाता है, जो किसी भी क्षेत्र में सफलता के लिए जरूरी है।
ज्ञान ही सफलता की असली नींव
मेहता का स्पष्ट मानना है कि किसी भी क्षेत्र में पहचान बनाने के लिए ज्ञान सबसे महत्वपूर्ण आधार है। यह ज्ञान केवल औपचारिक शिक्षा से नहीं, बल्कि निरंतर सीखने की प्रक्रिया से आता है, किताबे, कहानियां और उपन्यास पढ़ने से। उनके अनुसार, यही निरंतर अध्ययन व्यक्ति को बेहतर कलाकार ही नहीं, बल्कि एक जागरूक और संवेदनशील इंसान भी बनाता है।
किरदार से आत्मा तकः अभिनय की सच्ची परिभाषा
एक अभिनेता के रूप में संजय मेहता हर भूमिका को पूरी ईमानदारी से निभाने में विश्वास रखते हैं। व्यक्तिगत रूप से स्वयं को सनातनी मानने के बावजूद उन्होंने 'अब्दुलभूटोवी' जैसे मुस्लिम किरदार को पूरी संवेदनशीलता के साथ जिया। वे मानते हैं कि जब कोई कलाकार किसी किरदार में उत्तरता है, तो वह खुद को उसी रूप में महसूस करने लगता है, और यही असली अभिनय है।
निर्देशन और कास्टिंगः टीमवर्क की ताकत
मेहता निर्देशक आदित्य भर की कार्यशैली की सराहना करते हैं, जो हर किरदार को समान महत्व देते हैं। इससे हर कलाकार को अपनी क्षमता दिखाने का अवसर मिलता है। वहीं कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा का भी वे विशेष रूप से उल्लेख करते हैं, जिन्होंने उन्हें इस महत्वपूर्ण भूमिका के लिए चुना।
जेन जी और सिनेमा की नई समझ
उनका मानना है कि आज की जेन जी पीड़ी बेहद जागरूक और समझदार है। ये सिनेमा के माध्यम से प्रस्तुत विचारों को तेजी से समझते है और उनसे जुड़ते हैं। यही कारण है कि धुरंधर 2 ने न केवल भारत में, बल्कि विदेशों में बसे भारतीयों के बीच भी मजबूत पहचान बनाई।
नाट्यशास्त्रः भारतीय रंगमंच की आत्मा
संजय मेहता भारतीय रंगमंच की मूल शक्ति नाट्यशास्त्र को मानते हैं। उनके अनुसार, यह केवल अभिनय का ग्रंथ नहीं, बल्कि संपूर्ण रंग परंपरा का आधार है। नाट्यशास्त्र की उत्पत्ति चारों वेदों के तत्वों से मानी जाती है ऋग्वेद से पाठ, सामवेद से गीत, यजुर्वेद से अभिनय और अथर्ववेद से रस। यह समन्वय भारतीय रंगमंच को विश्व में अद्वितीय बनाता है। वे इसे गर्व का विषय मानते हैं कि नाट्यशास्त्र को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता मिल रही है। लेकिन उनके अनुसार, इससे भी ज्यादा जरूरी है कि हम स्वयं अपनी परंपरा को समझें और उस पर गर्व करें।
हिंदी रंगमंच कभी खत्म न होने वाली धारा
संजय मेहता का विश्वास है कि हिंदी रंगमंच कभी समाप्त नहीं हो सकता। वे खुद लंबे समय तक भोपाल के भारत भवन रंगमंडल से जुड़े रहे हैं और मानते हैं कि कला समय के साथ बदलती जरूर है, लेकिन खत्म नहीं होती।
नुक्कड़ बनाम मंचीय नाटक
उनके अनुसार, नुक्कड़ नाटक मुख्यतः जागरुकता और सूचना देने का माध्यम है, जिसमें विषय की गहराई सीमित होती है। वहीं मंचीय नाटक विस्तृत और गहन प्रस्तुति की मांग करता है, जहां जटिल कथानको और भावनाओं को पूरी तरह उकेरा जा सकता है।
थिएटर की चुनौतियां: बढ़ता खर्च, घटता सहयोग
आज रंगमंच कई चुनौतियों से जूझ रहा है। हॉल के बढ़ते किराए और सरकारी अनुदान में कमी ने नाट्य गतिविधियों को प्रभावित किया है। मेहता का मानना है कि इन परिस्थितियों में कई रेपेटी बंद होने की कगार पर हैं, जो चिंताजनक है।
सरकार और समाज से उम्मीदें
वे सरकार से अपील करते हैं कि थिएटर के किराए कम किए जाएं और अनुदान फिर से शुरू हो। उनके अनुसार, रंगमंच छोटे शहरों और गांवों के कलाकारों को अवसर देता है और उन्हें आर्थिक सहारा भी प्रदान करता है इसलिए इसे बचाना और बढ़ावा देना बेहद जरूरी है।
कला ही असली पहचान
संजय मेहता खुद को एक ऐसे कलाकार के रूप में देखते हैं, जो हर किरदार को पूरी शिद्दत और ईमानदारी से जीता है। 'बाबा' के नाम से पहचाने जाने वाले इस अभिनेता के लिए उनकी असली पहचान उनकी कला, उनका अभिनय और समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारी ही है।