भविष्य का चुनाव सुधार तीन मूल सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए न्यायिक निष्पक्षता, मतदाता को पूर्ण जानकारी और गंभीर अपराधों के प्रति शून्य राजनीतिक सहनशीलता। यही सिद्धांत धनबल पर भी लागू होना चाहिए। चुनावी चंदे और खर्च में पूरी पारदर्शिता, राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों दोनों के व्यय की प्रभावी निगरानी, डिजिटल वित्तीय रिकॉर्ड तथा सीमित स्तर पर सरकारी सहायता से चुनाव प्रचार की व्यवस्था चुनावी प्रतिस्पर्धा को अधिक समान बना सकती है।
पूरे आसार दिख रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार संसद में महिलाओं के 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व और लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाने से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों को आने वाले किसी भी सत्र में पारित करा सकती है। कांग्रेस और उसके सहयोगियों के विरोध के बावजूद क्षेत्रीय दलों का समर्थन मिलने की संभावना है। लेकिन इससे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इससे समाज से जुड़ी योग्य, ईमानदार और स्वच्छ छवि वाली महिलाएं तथा गंभीर आपराधिक आरोपों से मुक्त प्रतिनिधि अधिक संख्या में संसद तक पहुंच पाएंगे? पिछले दिनों राजनीति में सक्रिय एक सुसंस्कृत परिवार की शिक्षित प्रवक्ता ने अनौपचारिक बातचीत में मुझसे यही सवाल पूछा। तत्काल मेरे पास इसका संतोषजनक उत्तर नहीं था। इसलिए इस बार इस मुद्दे के व्यापक पक्षों पर विचार करना उचित लगा।
यदि लोकसभा का परिसीमन करके उसकी संख्या 543 से बढ़ाकर लगभग 816 की जाती है और महिलाओं के लिए लगभग 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित होती हैं, तो भारतीय लोकतंत्र की चुनावी तस्वीर काफी बदल जाएगी। इस मॉडल में लगभग 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। यानी नई लोकसभा में कम-से-कम 273 महिलाएं आरक्षित सीटों के माध्यम से पहुंचेंगी। इसके साथ बहुमत का गणित भी बदल जाएगा। अभी 543 सदस्यीय लोकसभा में बहुमत का आंकड़ा 272 है, जबकि 816 सदस्य होने पर सरकार बनाने के लिए 409 सांसदों का समर्थन आवश्यक होगा।
परिसीमन का दूसरा बड़ा प्रभाव अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आरक्षित सीटों पर पड़ेगा। वर्तमान में लोकसभा में अनुसूचित जाति के लिए 84 और अनुसूचित जनजाति के लिए 47 सीटें आरक्षित हैं। जनसंख्या आधारित नए परिसीमन में अनुसूचित जाति की सीटें लगभग 126 से 136 और अनुसूचित जनजाति की सीटें लगभग 70 तक पहुंचने का अनुमान है। अंतिम संख्या परिसीमन आयोग ही तय करेगा।
महिला आरक्षण का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आरक्षित सीटों में भी लगभग एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इससे अनुसूचित जाति और जनजाति की महिलाओं का संवैधानिक प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित होगा और महिला आरक्षण सामाजिक न्याय के व्यापक उद्देश्य से जुड़ सकेगा।
सबसे बड़ा राजनीतिक असर राज्यों के बीच लोकसभा सीटों के पुनर्वितरण पर पड़ेगा। आबादी के आधार पर उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे अधिक जनसंख्या वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा। संभावित मॉडल में उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर लगभग 120, बिहार की 40 से लगभग 60, महाराष्ट्र लगभग 72, पश्चिम बंगाल 63, तमिलनाडु 59, मध्य प्रदेश लगभग 44 और कर्नाटक लगभग 42 सीटों तक पहुंच सकते हैं। ये केवल संभावित आंकड़े हैं; अंतिम निर्णय सरकार के प्रस्ताव और परिसीमन आयोग की संवैधानिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।
दक्षिण भारत की चिंता भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना ने जनसंख्या नियंत्रण में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया है। इन राज्यों का तर्क है कि यदि केवल वर्तमान आबादी के आधार पर सीटों का बंटवारा हुआ, तो जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों का राजनीतिक महत्व सापेक्ष रूप से घट सकता है। दूसरी ओर, 816 सीटों का मॉडल इस असंतुलन को कम करने के लिए कुल सीटों की संख्या बढ़ाने का रास्ता सुझाता है। इसलिए यह केवल महिला आरक्षण का विषय नहीं, बल्कि भारत के संघीय राजनीतिक संतुलन का भी बड़ा प्रश्न है।
लेकिन संसद में सीटें बढ़ाने से लोकतंत्र स्वतः बेहतर नहीं हो जाएगा। चुनाव लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है, पर उसके सामने दो गंभीर चुनौतियां लगातार बनी हुई हैं राजनीति का अपराधीकरण और चुनाव में बढ़ता धनबल। पिछले कई दशकों में निर्वाचन आयोग, सुप्रीम कोर्ट, विधि आयोग और अनेक समितियों ने सुधारों के सुझाव दिए हैं। कुछ कानून बने, कुछ पर न्यायालय के महत्वपूर्ण फैसले आए और कई प्रस्ताव अब भी संसद के सामने लंबित हैं। इसी महीने सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ महत्वपूर्ण दिशानिर्देश दिए हैं।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि केवल आरोप लग जाने से किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ने से नहीं रोका जा सकता। वर्तमान कानून में मुख्य रूप से दोषसिद्धि के बाद ही अयोग्यता लागू होती है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने मतदाताओं को उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि की जानकारी उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। निर्वाचन आयोग ने भी गंभीर आपराधिक मामलों में आरोप तय हो चुके उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोकने का प्रस्ताव रखा है, लेकिन इसके लिए संसद को कानून बनाना होगा।
2013 में सुप्रीम कोर्ट ने राजनीति के अपराधीकरण के विरुद्ध ऐतिहासिक फैसला दिया। इसके अनुसार यदि किसी सांसद या विधायक को ऐसे अपराध में दो वर्ष या उससे अधिक की सजा होती है, तो उसकी सदस्यता समाप्त हो सकती है। यह सुधार महत्वपूर्ण था, लेकिन इसकी सीमा भी स्पष्ट है। दोषसिद्धि होने तक मुकदमे वर्षों चलते रहते हैं और केवल आरोपपत्र या आरोप के आधार पर उम्मीदवार स्वतः अयोग्य नहीं होता।
2018 में सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों को निर्देश दिया कि वे आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि सार्वजनिक करें और यह भी बताएं कि साफ-सुथरे उम्मीदवार के बजाय उसी व्यक्ति को टिकट क्यों दिया गया। 2020 में इन निर्देशों को और कठोर बनाते हुए अदालत ने कहा कि उम्मीदवार चयन के 48 घंटे के भीतर या नामांकन की पहली तारीख से कम-से-कम दो सप्ताह पहले यह जानकारी प्रकाशित की जाए। फिलहाल निर्वाचन आयोग का यह प्रस्ताव विचाराधीन है कि जिन उम्मीदवारों के विरुद्ध ऐसे गंभीर अपराधों में अदालत आरोप तय कर चुकी हो, जिनमें पांच वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है, उन्हें चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया जाए।
भविष्य का चुनाव सुधार तीन मूल सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए न्यायिक निष्पक्षता, मतदाता को पूर्ण जानकारी और गंभीर अपराधों के प्रति शून्य राजनीतिक सहनशीलता। यही सिद्धांत धनबल पर भी लागू होना चाहिए। चुनावी चंदे और खर्च में पूरी पारदर्शिता, राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों दोनों के व्यय की प्रभावी निगरानी, डिजिटल वित्तीय रिकॉर्ड तथा सीमित स्तर पर सरकारी सहायता से चुनाव प्रचार की व्यवस्था चुनावी प्रतिस्पर्धा को अधिक समान बना सकती है।
इसी महीने सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि चुनावों की आवर्ती प्रकृति को देखते हुए उच्च न्यायालय उम्मीदवारों, सांसदों और विधायकों से जुड़े मामलों की शीघ्र सुनवाई के लिए विशेष न्यायालय नामित कर सकते हैं। किसी चुनाव चक्र में उम्मीदवारों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने के लिए संबंधित उच्च न्यायालय की अनुमति आवश्यक होगी। साथ ही न्यायालयों, निर्वाचन आयोग और राज्य सरकारों को लंबित मामलों के त्वरित निपटारे तथा 18 नवंबर 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं।
अंततः चुनाव सुधार का उद्देश्य केवल अपराधियों को रोकना या खर्च कम करना नहीं है। असली लक्ष्य ऐसी संसद और विधानसभाओं का निर्माण होना चाहिए, जिनकी राजनीतिक शक्ति का आधार जनता का विश्वास हो, अपराध, भय और बेहिसाब धन नहीं। निर्वाचन आयोग ने सुधारों का रास्ता दिखाया है और सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक सीमाओं के भीतर महत्वपूर्ण दिशा दी है। अब अगला निर्णायक कदम संसद और राजनीतिक दलों को उठाना होगा, ताकि बढ़ती सदस्य संख्या के साथ लोकतंत्र की गुणवत्ता भी उतनी ही मजबूत हो सके।

आलोक मेहता
(लेखक पद्मश्री सम्मानित वरिष्ठ संपादक हैं।)