डॉ. मुखर्जी की 125वीं जयंती मनाई गई

राष्ट्र प्रथम के अमर पुरोधा डॉ. मुखर्जी

भारत के पूर्व नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती पर उनके योगदान और बलिदान को याद किया गया। उनके जीवन और कार्यों की सराहना की गई।

By : स्वदेश डेस्क
राष्ट्र प्रथम के अमर पुरोधा डॉ. मुखर्जी

नरेंद्र मोदी

 

डॉ. मुखर्जी के जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य भारत की एकता और अखंडता की रक्षा करना था। देश के विभाजन के समय उन्होंने पश्चिम बंगाल को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में जम्मू-कश्मीर के प्रश्न पर भी उन्होंने राष्ट्रहित में संघर्ष किया। जेल और नजरबंदी भी उन्हें अपने मार्ग से नहीं डिगा सकी। नजरबंदी के दौरान ही उनका निधन हुआ।

आज, 6 जुलाई का दिन राष्ट्रवाद और निस्वार्थ सेवा के आदर्शों में विश्वास रखने वाले करोड़ों देशवासियों के लिए बहुत विशेष है। आज हम डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती मना रहे हैं। उनका जीवन साहस, विद्वता और मां भारती के प्रति अटूट समर्पण का प्रेरणादायक उदाहरण है। उनके व्यक्तित्व में जनसेवा, उच्च नैतिक मूल्यों और राष्ट्रभक्ति का अद्भुत संगम था। आधुनिक भारत के कुछ ही नेताओं में इतने विविध गुण एक साथ देखने को मिलते हैं।

डॉ. मुखर्जी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था, जहां उन्हें सुख-सुविधाओं से भरपूर जीवन सहज ही मिल सकता था। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी अपने समय के महान शिक्षाविदों में गिने जाते थे। लेकिन तमाम सुविधाओं के बावजूद उन्होंने त्याग और राष्ट्रसेवा का मार्ग चुना। उनका दृढ़ विश्वास था कि चाहे अंग्रेजी शासन का विरोध हो, सांप्रदायिकता से संघर्ष हो या मानवीय संकटों का सामना, वे अपने समय की चुनौतियों के सामने मूकदर्शक नहीं रह सकते।

जीवन में उन्हें कई व्यक्तिगत आघात भी सहने पड़े। पहले उन्होंने अपने छोटे बच्चे को खोया और बाद में उनकी पत्नी का भी निधन हो गया। किंतु इन दुखद परिस्थितियों ने उनके संकल्प को कमजोर नहीं किया। इसके विपरीत, राष्ट्रसेवा के प्रति उनका समर्पण और अधिक दृढ़ होता गया।

डॉ. मुखर्जी के जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य भारत की एकता और अखंडता की रक्षा करना था। देश के विभाजन के समय उन्होंने पश्चिम बंगाल को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में जम्मू-कश्मीर के प्रश्न पर भी उन्होंने राष्ट्रहित में संघर्ष किया। जेल और नजरबंदी भी उन्हें अपने मार्ग से नहीं डिगा सकी। नजरबंदी के दौरान उनका निधन हुआ, किंतु उनका बलिदान राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्र की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन गया। आचार्य विनोबा भावे ने कहा था कि डॉ. मुखर्जी ने उस उद्देश्य के लिए अपना बलिदान दिया, जिस पर उन्हें पूर्ण विश्वास था। दशकों बाद, वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 और 35(ए) का हटाया जाना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि के रूप में देखा गया।

डॉ. मुखर्जी ने हमेशा राष्ट्रहित और भारतीय मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने और शिक्षा व्यवस्था में ऐसे परिवर्तन किए, जो राष्ट्रहित और भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप थे। उनका मानना था कि शिक्षण संस्थान केवल बाबू या कम वेतन वाले कर्मचारी तैयार करने की फैक्ट्री नहीं हैं। वे चाहते थे कि विद्यार्थी नेतृत्व के लिए तैयार हों, स्वशासी संस्थाओं, विधायिकाओं तथा वित्त, व्यापार और उद्योग जैसे क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का परिचय दें।

उनके नेतृत्व में कलकत्ता विश्वविद्यालय में लाइब्रेरी सुविधाओं का विस्तार हुआ, विज्ञान अनुसंधान को प्रोत्साहन मिला, ऐतिहासिक अध्ययन और कृषि शिक्षा को बढ़ावा मिला। उन्होंने खेलकूद, शिक्षक प्रशिक्षण और छात्र कल्याण पर भी विशेष ध्यान दिया। विद्यार्थियों में विश्वविद्यालय के प्रति गौरव की भावना विकसित करने के लिए उन्होंने 24 जनवरी को स्थापना दिवस मनाने की परंपरा शुरू की तथा गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर से विश्वविद्यालय के लिए एक गीत लिखने का अनुरोध भी किया।

बाद के वर्षों में यही राष्ट्रभावना भारतीय जनसंघ की स्थापना में भी दिखाई दी। उस समय देश में कांग्रेस का व्यापक प्रभाव था, किंतु उन्होंने महसूस किया कि भारत को ऐसे राजनीतिक विकल्प की आवश्यकता है, जो विकास के साथ-साथ देश की सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़ा हो। शायद इसी भावना से पार्टी का चुनाव चिह्न 'दीपक' रखा गया। एक छोटा-सा दीपक भी अपने आसपास के गहन अंधकार को दूर करने की शक्ति रखता है। जनसंघ ने अपने सक्रिय काल में और उसके बाद भी इसी भावना को साकार किया।

भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में उनका कार्यकाल भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। वे उद्योग को केवल आर्थिक प्रगति का माध्यम नहीं, बल्कि सम्मान, अवसर और आत्मविश्वास का आधार मानते थे। उन्होंने दामोदर वैली कॉरपोरेशन, सिंदरी उर्वरक संयंत्र और सुदृढ़ औद्योगिक नीति जैसी ऐतिहासिक पहलों के माध्यम से आधुनिक औद्योगिक भारत की नींव रखी। साथ ही, उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि हथकरघा, कुटीर उद्योग, कारीगरों और कपड़ा उद्योग से जुड़े श्रमिकों जैसे भारत के पारंपरिक सामर्थ्य की उपेक्षा न हो।

यहां मैं अपना एक निजी अनुभव भी साझा करना चाहता हूं। आत्मनिर्भर भारत की भावना के साथ जिस सिंदरी संयंत्र की स्थापना के लिए डॉ. मुखर्जी ने अथक प्रयास किए थे, उसकी दशकों तक उपेक्षा होती रही। मुझे संतोष है कि हमारी सरकार को उसके पुनरुद्धार का अवसर मिला। उस कार्यक्रम में उपस्थित होना मेरे सार्वजनिक जीवन के सबसे विशेष और अविस्मरणीय क्षणों में से एक रहा।

भारत की प्राचीन परंपरा सदैव संवाद और विचार-विमर्श का सम्मान करती आई है। डॉ. मुखर्जी इस लोकतांत्रिक भावना के सशक्त प्रतीक थे। उन्होंने पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल में इसलिए शामिल होना स्वीकार किया, क्योंकि वे मानते थे कि स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों में राष्ट्र निर्माण का दायित्व राजनीतिक मतभेदों से कहीं ऊपर है। उन्होंने पूरी निष्ठा से अपनी जिम्मेदारियां निभाईं, किंतु जब उन्हें लगा कि कुछ राष्ट्रीय प्रश्नों पर अलग मार्ग अपनाना आवश्यक है, तो उन्होंने पूरी गरिमा के साथ अपने पद से इस्तीफा दे दिया और अपने राजनीतिक आदर्शों के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया।

पचहत्तर वर्ष पहले जब पहला संविधान संशोधन लाया गया, तब डॉ. मुखर्जी उसके सबसे मुखर आलोचकों में थे। उनका मानना था कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आघात है। समय के साथ उनकी आशंकाएं सही सिद्ध हुईं। बाद के वर्षों में देश ने आपातकाल और 42वें संविधान संशोधन जैसे घटनाक्रम भी देखे, जिन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों को गंभीर चुनौती दी।

डॉ. मुखर्जी अपनी मानवीय संवेदनाओं और सेवाभाव के लिए भी विशेष रूप से स्मरण किए जाते हैं। वर्ष 1943 में बंगाल के भीषण अकाल के दौरान उन्होंने स्वयं को पीड़ितों की सेवा में समर्पित कर दिया। लोगों तक भोजन पहुंचाने के लिए अनेक कैंटीन और राहत केंद्र स्थापित किए गए। ब्रिटिश शासन की असंवेदनशीलता से वे अत्यंत व्यथित थे और उन्होंने अपनी पीड़ा को 'पंचाशेर मन्वंतर' नामक पुस्तक में भी व्यक्त किया।

1942 में मेदिनीपुर में आए विनाशकारी चक्रवात के समय भी उन्होंने राहत कार्यों का नेतृत्व किया। कोलकाता के एक कॉलेज में युवाओं को संबोधित करते हुए डॉ. मुखर्जी ने कहा था, "आप जो भी कार्य करें, उसे पूरी गंभीरता, लगन और ईमानदारी से करें। किसी भी काम को कभी अधूरा न छोड़ें। तब तक स्वयं को संतुष्ट न मानें, जब तक आपने उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान न दे दिया हो।"

आज जब भारत विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य की ओर तेजी से अग्रसर है, तब उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम प्रतिदिन उस भारत के निर्माण के लिए निरंतर प्रयास करें, जिसकी उन्होंने परिकल्पना की थी—एक ऐसा भारत जो सशक्त हो, एकजुट हो, आत्मविश्वास से भरपूर हो और संवेदनशील भी। मुझे पूरा विश्वास है कि देश के युवा इस संकल्प को साकार करने में अपनी ऊर्जा, प्रतिभा और समर्पण के साथ अग्रणी भूमिका निभाएंगे।

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