असम में ब्रह्मपुत्र नदी को जलान्तरण करने (संगम बनाने) और अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करने से पहले तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो के रूप में बहने वाली अरुणाचल प्रदेश में पवित्र मां के नाम से पूज्य सियांग नदी, एक जटिल सामाजिक-भू-राजनीतिक संकट का केंद्र बन गई है। इस विवाद के केंद्र में प्रस्तावित सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना (Siang Upper Multipurpose Plan or SUMP) है, जो राज्य द्वारा संचालित नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन (NHPC) द्वारा सियांग नदी पर नियोजित 11,200 मेगावाट की एक विशाल जलविद्युत और जल भंडारण योजना है।
जहां नई दिल्ली इस बांध को हिमालय में चीनी जल-प्रभुत्व का मुकाबला करने के लिए एक रणनीतिक सुरक्षा दीवार के रूप में देखती है, वहीं स्थानीय स्वदेशी समुदाय इसे अपनी भूमि, संस्कृति और अस्तित्व के लिए एक गंभीर खतरा मानते हैं।
परियोजना की पृष्ठभूमि और राज्य की आकांक्षाएं
यद्यपि सियांग के प्रबन्धन के लिए प्रारम्भिक प्रस्ताव इंदिरा गांधी काल के 1982 के हैं, नीति आयोग की सिफारिशों और आधिकारिक तौर पर इसे एक ही मेगा-संरचना में समेकित करने के बाद परियोजना को नई गति मिली। सियांग बेल्ट के तीन जिलों अपर सियांग, सियांग और ईस्ट सियांग में निर्मित होने वाली यह परियोजना भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे बड़ा जलविद्युत बांध बनने की दिशा में अग्रसर है। हालांकि चीन के जिस जल-बंम, मेडोक परियोजना, के प्रभाव को कम करने के लिए यह बनाया जा रहा है, वह इससे लगभग पांच गुना बड़ी है।
यह परियोजना अरुणाचल प्रदेश के उस नीतिगत ढांचे का मुख्य आधार है, जिसने 2025-2035 को जलविद्युत का दशक घोषित किया है, जिसका उद्देश्य राज्य को पूर्वोत्तर भारत का ऊर्जा केंद्र बनाना है। विशाल मात्रा में स्वच्छ बिजली पैदा करने के अलावा, इस जलाशय को लगभग 9.2 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) की लाइव जल भंडारण क्षमता के साथ डिजाइन किया गया है। यह विशाल भंडारण जल के प्रवाह को नियन्त्रित करने, मौसमी बाढ़ को कम करने और अन्तर्राष्ट्रीय कानून के तहत निचले प्रवाह वाले क्षेत्रों (downstream user rights) के अधिकारों को स्थापित करने के लिए बनाया गया है।
निरन्तर चीनी आक्रामकता के विरुद्ध एक रणनीतिक सुरक्षा दीवार
सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना को प्रेरित करने वाली रणनीतिक आवश्यकता वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के साथ भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा से गहराई से जुड़ी हुई है। तिब्बत में उपरिधारा (upstream) क्षेत्र में, चीन ने यारलुंग त्सांगपो के ग्रेट बेंड पर विशाल 60,000 मेगावाट की मेडोग जलविद्युत परियोजना का निर्माण शुरू किया है। इस विशाल चीनी विकास ने नई दिल्ली में जल के हथियार के रूप में उपयोग (water weaponization) और नदी के प्रवाह पर चीनी नियंत्रण को लेकर गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं को जन्म दिया है। यह परियोजना तीन अलग-अलग रणनीतिक क्षमताओं में एक सुरक्षा ढाल के रूप में कार्य करती है:
वॉटर बॉम्ब (जल बम) के खतरे को कम करना
यदि चीन अचानक ऊपरी क्षेत्र से पानी की विशाल मात्रा छोड़ता है, चाहे जानबूझकर या भूकंपीय रूप से सक्रिय क्षेत्र में बांध टूटने के कारण, तो निचली सियांग घाटी और असम के मैदानों को विनाशकारी फ्लैश फ्लड (अचानक आने वाली बाढ़) का सामना करना पड़ सकता है। SUMP की 9.2 BCM भंडारण क्षमता अचानक आई बाढ़ के उफान को अवशोषित करने के लिए एक शॉक एब्जॉर्बर के रूप में काम करेगी।
कृत्रिम सूखा (Artificial Desiccation) को रोकना
इसके विपरीत, यदि बीजिंग शुष्क मौसम के दौरान पानी रोकता है या प्रवाह को दूसरी तरफ मोड़ता है, तो चीन निचले इलाकों में गंभीर सूखा उत्पन्न कर सकता है। SUMP द्वारा रखा गया विशाल भंडार अरुणाचल प्रदेश और असम में निचले समुदायों को निरंतर जल प्रवाह की गारंटी देता है।
पूर्व वैध उपयोगकर्ता अधिकार स्थापित करना
प्रथागत अन्तर्राष्ट्रीय जल कानून के तहत, जो देश लाभकारी उपयोग के लिए पहले बुनियादी ढांचे का निर्माण करता है, वह पूर्व विनियोग अधिकार (Prior Appropriation Rights) प्राप्त लेता है। SUMP को पूरा करने से चीन द्वारा सीमा पार नदी के एकतरफा मोड़ के खिलाफ अन्तर्राष्ट्रीय कूटनीतिक मंचों पर भारत की कानूनी स्थिति मजबूत होती है।
स्वदेशी विरोध और स्थानीय संकट
इसके रणनीतिक महत्व के बावजूद, इस परियोजना को तीव्र घरेलू विरोध का सामना करना पड़ रहा है। सियांग बेल्ट के साथ रहने वाले स्वदेशी समुदाय, मुख्य रूप से आदि और गालो आदिवासी समूह ने सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम (SIFF), SUMP-अफेक्टेड यूथ एसोसिएशन, और आदि बाने केबांग जैसे संगठनों के तहत व्यापक विरोध आयोजित किया है।
विरोध के मुख्य कारण
विस्थापन और जलमग्नता
कार्यकर्ताओं का अनुमान है कि 280 मीटर ऊंचा यह विशाल बांध 27 गांवों को जलमग्न कर सकता है और 1,00,000 से 1,50,000 स्वदेशी निवासियों को विस्थापित कर सकता है, जिससे उपजाऊ कृषि भूमि (धान के खेत) और पैतृक होमलैंड नष्ट हो जाएंगे।
सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विलोपन
यह जलाशय केकर मोयिंग जैसे ऐतिहासिक स्थलों को खतरे में डालता है, जो एक प्राकृतिक चट्टानी दर्रा है जहाँ आदि समुदाय ने 19वीं सदी के अन्त और 20वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश औपनिवेशिक विस्तार के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।
भूकंपीय खतरे
पूर्वी हिमालय दुनिया के सबसे संवेदनशील भूकंपीय क्षेत्रों में से एक है, जो 1950 के विनाशकारी असम-तिब्बत भूकंप के लिए जाना जाता है। पर्यावरणविदों का तर्क है कि सक्रिय फॉल्ट लाइनों पर अरबों टन पानी ले जाने वाला एक विशाल जलाशय बनाने से जलाशय-प्रेरित भूकंपीयता (Reservoir-Induced Seismicity) के गंभीर जोखिम पैदा होते हैं।
सहमति की कमी और बल प्रयोग
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि वन अधिकार अधिनियम (2006) के तहत ग्राम सभा की सहमति हासिल किए बिना ही प्रारम्भिक चरण के सर्वेक्षण शुरू कर दिए गए थे। सर्वेक्षण स्थलों को सुरक्षित करने के लिए अर्धसैनिक बलों की तैनाती से तनाव बढ़ा, जिससे पासीघाट में विरोध प्रदर्शन और झड़पें हुईं, जिसमें केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के अधिकारियों पर प्राण घातक हमला हुआ।
अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने दोहराया है कि राज्य सरकार स्थानीय समुदाय की चिंताओं को नजरअन्दाज करके आगे नहीं बढ़ेगी, और उन्होंने व्यापक पुनर्वास योजनाओं व खुले संवाद का आश्वासन दिया है।
हालांकि राष्ट्रीय सम्प्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है, स्वदेशी विरोध को केवल रणनीतिक लक्ष्यों में बाधा के रूप में देखना उन सीमावर्ती आबादी को अलग-थलग करने का जोखिम उठाता है जो भारत की क्षेत्रीय रक्षा की पहली पंक्ति के रूप में कार्य करते हैं। इस संकट को हल करने के लिए, नई दिल्ली को स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति (Free, Prior Informed Choice या FPIC) ढांचे, पारदर्शी पर्यावरण और सामाजिक प्रभाव आकलन (EIA/SIA) को एकीकृत करना होगा और ऐसे लचीले भंडारण विकल्पों की खोज करनी होगी जो राष्ट्रीय सम्प्रभुता और स्वदेशी विरासत दोनों की रक्षा करते हों।

(लेखक संविधान और राष्ट्रीय सुरक्षा विषयों के विशेषज्ञ और पूर्व सैन्य अफसर हैं।)