Strategic Maturity vs Surrender Politics

रणनीतिक परिपक्वता बनाम ‘समर्पण’ की राजनीति

राम माधव, अध्यक्ष, इंडिया फाउंडेशन

By : स्वदेश डेस्क
रणनीतिक परिपक्वता बनाम ‘समर्पण’ की राजनीति

​​​​सोशल मीडिया के इस युग में किसी भी बात को सन्दर्भ से बाहर निकाल कर उसे प्रस्तुत कर देना एक खतरे के रूप में उत्पन्न हो गया है, अमूमन जिससे अर्थ का ‘अनर्थ’ होने में समय नहीं लगता है. वाशिंगटन डीसी में पिछले सप्ताह एक सम्मेलन में मेरे द्वारा दी गयी एक टिप्पणी को लेकर मचे बवाल को इसी परिपेक्ष में देखा जाना चाहिए. मेरे वक्तव्य के एक हिस्से को लेकर देश में एक अजीब-सी राजनीतिक बहस शुरू हो गयी। दरअसल बात मैंने ईरान और रूस से तेल आयात को लेकर कही थी और इसमें रूस के संदर्भ में मुझसे तथ्यात्मक भूल हुई। वास्तविकता यह है की भारत ने वहां से आयात बंद किया ही नहीं था। मैंने तुरंत अपनी गलती स्वीकार की और क्षमा मांगी। लेकिन राजनीति में सत्य से ज्यादा उपयोगी उसका शोर होता है। मोदी जी की विदेश नीति की सफलताओं से हतोत्साहित कांग्रेस ने इस प्रसंग को पकड़ कर फिर वही पुराना आरोप दोहराना शुरू कर दिया कि भारत सरकार ने अमरीका के आगे “आत्मसमर्पण” कर दिया है। कांग्रेस की यह बयानबाज़ी कुछ वैसी ही है की जैसे चोर कोतवाल को डांटे।

गौरतलब है की ईरान से तेल आयात में जो कटौती हुई थी, वह उसी दौर में हुई थी जब मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए-2 की सरकार थी। सनद रहे की 2010 तक ईरान भारत का दूसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता था। करीब 15 प्रतिशत आयात वहीं से आता था। फिर 2012 में अमरीका ने ‘एनडीएए कानून’ के जरिए भारत समेत कुछ देशों पर दबाव बनाया कि वे ईरान से तेल खरीदना बंद करें, नहीं तो प्रतिबंध झेलें। इसके लिए तत्कालीन अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन स्वयं भारत आईं और मनमोहन सरकार को अमरीका के निर्णय को मानने के लिए कहा। परिणामस्वरुप भारत ने ईरान से आयात घटाकर 5 प्रतिशत से भी नीचे कर दिया। इतना ही नहीं, भारतीय रिजर्व बैंक की एशियन क्लियरिंग यूनियन की व्यवस्था भी समाप्त कर दी गई, जिससे ईरान को डॉलर या यूरो में भुगतान असंभव हो गया। उसी दबाव में लीबिया और सूडान जैसे देशों से भी तेल आपूर्ति रोक दी गई।

तब भारतीय जनता पार्टी विपक्ष में थी। पार्टी चाहती तो इस मुद्दे का राजनीतिक लाभ ले सकती थी, परन्तु  उसने न तो मनमोहन सिंह को “सरेंडर सिंह” कहा, न ही राजनीति को उस स्तर तक गिरने दिया। अपितु उस समय की जटिल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को समझते हुए संयम रखा। दुर्भाग्य वश, आज मौजूदा विपक्ष में ऐसी परिपक्वता पूर्ण रूप से नदारद है।

हालाँकि इस बयान को लेकर प्रतिक्रिया केवल विपक्ष से नहीं आई, बल्कि सत्तारूढ़ पक्ष के कुछ समर्थकों ने भी यह मान लिया कि मैंने विपक्ष द्वारा फैलाई जा रही “समर्पण” की झूठी कथा को ही समर्थन दिया है। यहीं से एक गंभीर संकेत उभरता है। भारत-अमरीका संबंधों को लेकर हमारे अपने समाज में एक बेचैनी है, एक अविश्वास है। दुर्भाग्य यह कि वाशिंगटन में दिए गए मेरे भाषण का असल आशय चर्चा में ही नहीं आया। मैंने वहां अमेरिकी नीति-निर्माताओं से साफ कहा कि भारत में आज अमरीका को लेकर जनधारणा नकारात्मक होती जा रही है। लम्बे समय से भारत-अमरीका संबंध तीन प्रमुख स्तंभों पर खड़े थे। जिसमे पहला स्तंभ है, भूराजनैतिक समझ। दूसरा है, आर्थिक साझेदारी और तीसरा स्तंभ है, लोगों के बीच का जुड़ाव। तीनों ही स्तम्भ आज डगमगाते दिख रहे हैं।

अटल बिहारी वाजपेयी ने 2000 में न्यूयॉर्क में अटलांटिक काउंसिल में भारत और अमरीका को “स्वाभाविक सहयोगी” कहा था। तब यह साझेदारी चीन और इस्लामी आतंकवाद जैसी पारस्परिक चुनौतियों को लेकर साझा दृष्टि पर आधारित थी। आज स्थिति यह है कि खुद अमरीका की प्राथमिकताएं स्पष्ट नहीं हैं। सात दशकों में निर्मित उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बिखर रही है, लेकिन इसके बीच अमरीका कहां खड़ा है, यह न भारत समझ पा रहा है, न उसके नाटो सहयोगी, और न यूरोप। यूक्रेन हो या गाजा, अमेरिकी नीति एक धुंध की तरह है। आर्थिक मोर्चे पर पिछले दो दशकों में दोनों देशों के बीच व्यापार 220 अरब डॉलर तक पहुंचा है। अमरीका भारत का सबसे बड़ा व्यापार साझेदार बन चुका है, जिसको गति प्रदान करने में आईटी और रक्षा जैसे क्षेत्रो ने इंजन का कार्य किया है। लेकिन पिछले एक वर्ष में एकतरफा टैरिफ और नई एच-1बी वीजा नीति ने इस साझेदारी में तनाव भर दिया है। इसको लेकर भारतीय पेशेवरों पर काफी दबाव बढ़ा है।

तीसरा स्तंभ यानि दोनों राष्ट्रों की जनता के बीच संबंध को लेकर भी संशय और अविश्वास के बादल मंडरा रहे है। अमरीका में प्रवासन को लेकर बहसें जिस दिशा में जा रही हैं, उससे भारतीय प्रवासी समुदाय असहज है। सबसे शिक्षित और कानून का पालन करने वाले भारतीय-अमरीकी समुदाय के ऊपर ऑनलाइन और व्यक्तिगत धमकियां बढ़ रही हैं। यह केवल नीतिगत नहीं, बल्कि मानवीय संकट भी है।

ऐसे समय में मैंने अमरीकी नीति-निर्माताओं को तीन सूत्र सुझाए हैं, जिसका आधार है - परस्पर सम्मान, परस्पर संवेदनशीलता और परस्पर हित। विडंबना देखिए, यही तीन बातें भारत ने कुछ वर्ष पहले चीन से कही थीं। परन्तु आज उन बातों को अमरीका के संदर्भ में भी दोहराना पड़ रहा है।

सबसे पहला आधार, सम्मान। जब सर्वोच्च स्तर से भारत के सन्दर्भ में “हेलहोल” या “लैपटॉप वाले गैंगस्टर” जैसे शब्द प्रयोग किये जाते हैं, तो वह केवल शब्द नहीं रहते, बल्कि रिश्तों में अविश्वास का जहर घोलते हैं। दूसरा आधार, संवेदनशीलता। भारत जब “रणनीतिक स्वायत्तता” की बात करता है, तो उसका उपहास होता है। लेकिन इसके विपरीत अमरीका अपने हितों के लिए किसी से भी संबंध बनाता है, बिना दूसरों की संवेदनाओं की परवाह किए। तीसरा आधार है कि हमें यह पुनः परिभाषित करना होगा कि हमारे साझा हित क्या हैं।

यह सब कहना आत्मसमर्पण नहीं है। बल्कि इसे कहने का मूल आशय या भाव यह है कि इस संबंध को नए सिरे से संतुलित करने की जरूरत है। एक ओर जहाँ अमरीका पश्चिम का अग्रणी देश है, तो वहीँ भारत भी वैश्विक दक्षिण की एक प्रमुख आवाज के रूप में उभरा है। लोकतंत्र, उदारता और स्थिर विश्व-व्यवस्था, ये दोनों देशों के साझा मूल्य हैं। इन्हें बचाने के लिए इस संबंध का मजबूत होना आवश्यक है।

आज अमेरिकी प्रशासन में भारत को गहराई से समझने वाले लोगों की कमी दिखती है। लेकिन छह महीने पहले भारत आए अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर इस खालीपन को भरने की क्षमता रखते हैं। 1960 के दशक में जॉन केनेथ गैल्ब्रेथ और 2000 के दशक में रॉबर्ट ब्लैकविल जैसे राजदूतों की तरह गोर की भी व्हाइट हाउस तक सीधी पहुंच है। यह निकटता कई बार काम आती है, और हाल के महीनों में उसके संकेत भी मिले हैं। गोर ने कम समय में ही सरकारी और गैर-सरकारी, दोनों स्तरों पर सक्रिय संवाद से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। उनका सहज व्यवहार भारतीय जनमत को भी प्रभावित कर रहा है। भारत के विश्व की अनेक शक्तियों से संबंध हैं, लेकिन अमरीका के साथ संबंध सबसे महत्वपूर्ण है। आज जब विश्व अनिश्चितताओं से भरा है, भारत ने संयम और सिद्धांतों पर आधारित “रणनीतिक धैर्य” दिखाया है। विपक्ष को इसे समझना चाहिए और “समर्पण” की राजनीति से ऊपर उठना चाहिए। 

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