Tribal Cultural Conclave at Red Fort

जनजातीय सांस्कृतिक समागम : अस्मिता, आस्था और अस्तित्व का राष्ट्रीय उद्घोष

दिल्ली के लाल किले पर होने वाला जनजातीय सांस्कृतिक समागम जनजातीय अस्मिता, संस्कृति और राष्ट्रीय एकात्मता का बड़ा मंच बनने जा रहा है।

By : स्वदेश डेस्क
जनजातीय सांस्कृतिक समागम : अस्मिता, आस्था और अस्तित्व का राष्ट्रीय उद्घोष

रंजना चितले

भारत की सांस्कृतिक आत्मा और शक्ति उन समुदायों में जीवित है, जिन्होंने हजारों वर्षों से प्रकृति, परंपरा और सामुदायिक जीवन के संतुलन को अपने आचरण में संजोकर रखा है। आदि संस्कृति का यही स्वरूप राजधानी दिल्ली के लाल किले पर आयोजित होने जा रहे ‘जनजातीय सांस्कृतिक समागम’ के रूप में सामने आने वाला है। यह मात्र एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की मूल चेतना के पुनर्जागरण का ऐतिहासिक क्षण प्रतीत होता है।

देश के सभी राज्यों से आने वाली सैकड़ों जनजातियों के लाखों प्रतिनिधियों का एक मंच पर एकत्र होना अपने आप में एक विलक्षण अवसर है। यह समागम उस भारत का प्रतिनिधित्व करता है, जिसने सदियों तक जल, जंगल और जमीन के साथ सहअस्तित्व की जीवन पद्धति अपनाई और प्रकृति को पूज्य मानकर जीवन जिया।आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संकट, सामाजिक विघटन और सांस्कृतिक खोखलेपन जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, तब भारतीय जनजातीय समाज का जीवन दर्शन वैश्विक मानवता के लिए एक वैकल्पिक मार्ग प्रस्तुत करता है।भारत की संस्कृति, स्वाभिमान और स्वायत्तता की रक्षा के लिए जनजातीय समाज ने अभूतपूर्व संघर्ष और बलिदान दिए हैं। विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध सबसे पहले शस्त्र उठाने वालों में जनजातीय वीर अग्रणी रहे। भारत में स्वाधीनता का अंकुर स्वतंत्रता-प्रिय जनजातीय समाज के बीच ही फूटा था। बाद में इसी संघर्ष चेतना को पूरे देश ने स्वीकार किया।

विदेशी आक्रांताओं के खिलाफ संघर्ष में जनजातीय वीरों के अद्वितीय साहस की लंबी श्रृंखला देखने को मिलती है। बिरसा मुंडा, रानी दुर्गावती, टंट्या मामा, सिद्धो-कान्हू, राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह जैसे असंख्य जननायकों ने स्वाधीनता चेतना को जन-जन तक पहुंचाया।इसी कारण अंग्रेजों ने दमन के लिए शिक्षा और सेवा के नाम पर परिवर्तन का अभियान चलाया और जनजातीय समाज को अपराधी घोषित करने का षड्यंत्र रचा। तमाम दबाव और अतिरेक के बावजूद जनजातीय समाज ने अपने अस्तित्व और परंपराओं को सुरक्षित रखा।वर्तमान समय में वैश्वीकरण के प्रभाव से नई संभावनाओं के साथ सांस्कृतिक विघटन का संकट भी उत्पन्न हुआ है। पारंपरिक भाषाएं, लोकगीत, अनुष्ठान और सामुदायिक मूल्य धीरे-धीरे कमजोर पड़ते दिखाई दे रहे हैं। यही कारण है कि आज ‘आस्था’, ‘अस्मिता’ और ‘अस्तित्व’ जनजातीय विमर्श के केंद्रीय विषय बन चुके हैं।

इसी परिप्रेक्ष्य में ‘जनजातीय सांस्कृतिक समागम’ अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। यह आयोजन केवल लोकनृत्य, वेशभूषा और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का मंचन नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने के संकल्प और सांस्कृतिक आत्मविश्वास की सार्वजनिक अभिव्यक्ति है।इस समागम में देशभर से आने वाले जनजातीय समुदाय अपने पारंपरिक नृत्य, वाद्ययंत्र, लोकगीत, धार्मिक अनुष्ठान और सांस्कृतिक प्रतीकों का प्रदर्शन करेंगे। यह आयोजन भारत की सांस्कृतिक विविधता और एकात्मता का जीवंत उदाहरण बनेगा।वनवासी कल्याण आश्रम और जनजातीय सुरक्षा मंच के प्रयासों से आयोजित होने वाला यह समागम निश्चित रूप से जनजातीय अस्मिता, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्रीय एकात्मता के नए अध्याय के रूप में स्मरण किया जाएगा।

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