भारत में पानी का महत्व

देश में कोई वाटर यूनिवर्सिटी क्यों नहीं है ?

प्रख्यात पर्यावरण कार्यकर्ता  पद्मश्री उमाशंकर पांडे से हाल ही में वरिष्ठ लेखक और स्तंभकार डॉ. दिनेश पाठक  की विस्तृत बातचीत हुई। पर्यावरण दिवस के अवसर पर प्रस्तुत हैं इसके मुख्य अंश

By : स्वदेश डेस्क
देश में कोई वाटर यूनिवर्सिटी क्यों नहीं है ?

भारत में स्कूली और उच्च शिक्षा को मिलाकर लगभग 28 करोड़ बच्चे अध्ययनरत हैं। 1212 विश्वविद्यालय, उच्च तकनीकि शिक्षा संस्थान आदि हैं। देश में 45000 से अधिक कॉलेज हैं, 12 लाख से अधिक विद्यालय इंटर तक के हैं। 15 लाख के लगभग विद्यालय हैं कला संगीत, स्पोर्ट्स के महाविद्यालय और विश्वविद्यालय हैं, कृषि के 75 से अधिक विश्वविद्यालय, महाविद्यालय और कृषि विज्ञान केंद्र इत्यादि हैं। लेकिन जल का एक भी महाविद्यालय या विश्वविद्यालय नहीं है !

मैं पूछता हूं भाई, जिंदगी की पहली ज़रूरत है पानी, तो देश में कोई ‘वाटर यूनिवर्सिटी क्यों नहीं है’?

वाटर लाइब्रेरी नहीं है, वॉटर म्यूजियम नहीं है, कितनी बड़ी विडंबना है यह ? कारण है, क्योंकि हमने अभी तक जल का महत्व ही नहीं समझा है।

हमारे पुरखे, हमसे अधिक समझदार थे। वे पहाड़ के ऊपर तालाब बनाते थे, पहाड़ के ऊपर कुआं बनाते थे। माउंट आबू में आप देखो, कालिंजर के किले को देखो, आप झांसी के तालबेहट को देखो नीचे पानी नहीं है लेकिन पहाड़ के ऊपर पानी भरा हुआ है। ग्वालियर किले पर सूरजकुंड को देखो।

जब हम जमीन से एक किलो पानी लेते हैं तो बदले में सिर्फ 50 ग्राम पानी देते हैं। हमें वर्षा का 33 प्रतिशत पानी रोकना चाहिए जबकि हम सिर्फ 6 प्रतिशत रोक पाते हैं।देशभर में तमाम नदियां या तो खत्म हो गई हैं या खत्म होने की कगार पर हैं। कई बड़े-बड़े शहर नदियों के किनारे बसाए गए थे, आज हालात यह हैं कि शहर तो दिन पर दिन बढ़ते जा रहे हैं लेकिन नदियां समाप्त हो गई हैं। बस्तियां तालाब के किनारे, पोखर के किनारे कुओं के किनारे बसती थीं। वो बस्तियां तो आज और अधिक विकसित हो गईं हैं लेकिन वो तालाब जिनके कारण वहां बस्ती बसी थी वो समाप्त हो गए हैं।

इसलिए मेरा एक ही नारा है, ‘खेत पर मेड़ और मेड़ पर पेड़’। खेत में पानी रोकने के लिए मेड़ बनाओ मेड़ पर पेड़ लगाओ। पेड़ से अतिरिक्त आमदनी लो और जो पत्ते पेड़ के, खेत में झरें उनसे जैविक खाद बनाओ। कुछ पेड़ ऐसे हैं जिन्हें पानी का बेटा कहा जा सकता है। जैसे बरगद अपने नीचे पांच लाख लीटर पानी रखता है, पीपल अपने नीचे चार लाख लीटर पानी रखता है, जामुन अपने नीचे तीन लाख  लीटर पानी रखता है। अर्जुन का पेड़ नदी के किनारे लगाना चाहिए, तालाब के किनारे पर बरगद का और पीपल का पेड़ लगाना चाहिए, नीम लगाना चाहिए, जामुन लगाना चाहिए। जब तालाब को जरूरत हो तो पानी तालाब को दे दे और जब जरूरत पेड़ को हो तो वो तालाब से पानी ले ले।

पेड़ तीन तरह के होते हैं, एक पेड़ वे होते हैं जो पशु के मित्र होते हैं, एक पेड़ होते हैं जो पक्षी के मित्र होते हैं और एक पेड़ होते हैं जो मानव के मित्र होते हैं।

हमारे यहां 39900 प्रकार के पेड़ पाए जाते हैं। पेड़ औषधि देता है, हवा देता है और स्वयं शंकर है, विष यानी कार्बन डाई ऑक्साइड पीकर अमृत यानी ऑक्सीजन देता है। पेड़ साधु इसलिए हैं कि आप उन्हें पत्थर भी मारो तो वह फल देते हैं। पेड़ काटने वाला भी धूप में पेड़ की छाया में ही बैठता है।

मैं आपको बताना चाहूंगा कि मैंने अपने इस अभियान के लिए इतने वर्षों में सरकार से एक रुपए का भी अनुदान नहीं लिया है। आप पूछेंगे कि फिर कैसे इस अभियान को चला रहे हैं ? बस मैं अपना एक माइक लेता था, लाउडस्पीकर के साथ गांव-गांव जाता था, वहां लोगों को ‘खेत में मेड़ और मेड़ पर पेड़’ अभियान के बारे में बताता था। उन्हीं लोगों को इकट्ठा करके, जन आंदोलन करता था, उन्हीं के साथ काम करता था, उन्हीं के साथ बैठकर उनका भोजन करता था और लौट के अपने घर आ जाता था। दरअसल किसी अच्छे कार्य के लिए हमेशा धन की आवश्यकता नहीं होती है। धन से पहले लोगों का, आम इंसान का मानस बनाने की आवश्यकता अधिक होती है।

विनोबा जी के भूदान यज्ञ अभियान की तरह मैंने सिर्फ मेड़ बंदी यज्ञ अभियान प्रारंभ किया था और उसका नाम रखा था ‘जलग्राम’। बाद में भारत सरकार ने मेरे इस मॉडल पर पूरे देश में लगभग 1500 जलग्राम बनाए और मेरे मॉडल पर ही एक 6000 करोड़ की योजना ‘अटल भूजल योजना’ बनाई गई। सरकार की ओर से पूरे देश के सरपंचों को मेड़ बंदी अभियान के संबंध में एक पत्र लिखा गया और उनसे अनुरोध किया गया कि वह अपने-अपने गांव में इस अभियान को प्रारंभ करें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में चार बार हमारे इस अभियान का उल्लेख किया है।

दूसरी बात भारतवर्ष में प्रति एक मिनट 20000 टन मिट्टी नदी नालों के जरिए, बहकर समुद्र में जा रही है, एक मिनट में 20000 पानी की बोतल दुनिया भर में तैयार होती हैं, एक मिनट में भारत में 16000 पेड़ काटे जाते हैं, छोटे बड़े मिलाकर।

एक प्रासंगिक बात यह भी है कि एक मिनट में लगभग 20 बच्चे भारत में पैदा होते हैं जिनको प्रति मिनट 2000 लीटर ताजा पानी चाहिए यानी एक दिन में 2880000लीटर पानी। एक साल में उन्हें लगभग डेढ़ अरब लीटर ताजा पानी चाहिए। एक मिनट में पांच व्यक्ति परमात्मा के पास जाते हैं। हिंदू धर्म के अनुसार एक व्यक्ति को 5 क्विंटल 5 किलो लकड़ी जलाने के लिए लगती है। अर्थात एक मिनट में 25 क्विंटल लकड़ी एक घंटे में 300 क्विंटल लकड़ी और एक  दिन में 3600 क्विंटल लकड़ी तो इंसान अंत समय में अपने साथ ले जा रहा है। इस हिसाब से, एक छोटा सा परिवार 40 क्विंटल लकड़ी अपने साथ ले गया। सामान्यतः सूखने के बाद एक पेड़ औसतन एक क्विंटल का होता है, यानी लगभग 40 पेड़ एक परिवार अपने साथ ही खत्म कर देता है। सवाल यह है कि इनमें से कितने लोगों ने अपने जीवन में 4 पेड़ भी लगाकर उन्हें पाल पोसकर बड़ा किया ?

आज समाज पानी बेचकर पानीदार बनना चाहता है। दुनिया में सबसे बड़ा बाजार पानी का है ₹100 की बोतल है, ₹500 की बोतल है, 2500 रुपए की बोतल है, ₹5000 की बोतल है। दूध से महंगा, घी से महंगा, पेट्रोल से भी महंगा पानी बिक रहा है। इस देश में पानी का एक बड़ा बाजार खड़ा हो रहा है। उसमें पानी की वैरायटी आ रही है। अल्कलाइन वॉटर, मिनरल वाटर वगैरह। जिन कुओं का पानी पीकर हम बड़े हुए, बलवान हुए और हमने जिनके पानी की पूजा की, गांव के वे कुंए आज रो रहे हैं, क्योंकि गांव भर का कचरा उनमें डाला जा रहा है।

हमारी परंपरा में कुआं पूजन है। आज से 70 साल पहले जब मेरी मां ब्याह के हमारे गांव में आई थी तो कुआं पूजन हुआ था। मैं जब पैदा हुआ था तब कुआं पूजन हुआ था। संतान के जन्म पर गगरी उतारने का एक नेग देवर और भाभी के बीच में बुंदेलखंड में हुआ करता था। हमारे यहां जल देवता होते थे, जल विहार मेले लगते थे, जलोत्सव होते थे, तालाब उत्सव होते थे, सरोवर पर कार्यक्रम चलते थे। तो अब हमको करना क्या है, इन सब चीजों को कैसे छोड़ सकते हैं ?

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