West Asia Crisis and India’s Village Model

पश्चिम एशिया संकट और संस्कृति से जुड़े देश 

पश्चिम एशिया संकट ने दुनिया को फिर प्रकृति, गांव और संतुलित विकास की याद दिलाई है। जानिए क्यों भारतीय ग्राम व्यवस्था आज भी संकट में सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है।

By : स्वदेश डेस्क
पश्चिम एशिया संकट और संस्कृति से जुड़े देश 

उमेश चतुर्वेदी

आपने निर्णयों और घोषणाओं से चौंकाते रहे प्रधानमंत्री मोदी ने इस बार देश के सामने औचक कोई योजना प्रस्तुत नहीं की। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध या युद्ध जैसे हालात की वजह से उपजे संकट से देश को सचेत करने के लिए प्रधानमंत्री देश को धीरे-धीरे तैयार कर रहे हैं। सोने की खरीददारी एक साल के लिए टालने, वर्क फ्रॉम होम यानी घर से काम करने, सार्वजनिक परिवहन से चलने के साथ ही खाद्य तेलों के कम इस्तेमाल की उनकी अपीलें एक तरह से देश को सचेत करने और आगामी संकट से जूझने के लिए तैयार करने की कोशिश ही है। प्रधानमंत्री और पूरी सरकार भले ही यह कहती रही हो कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट के बावजूद देश के सामने बड़ा संकट नहीं है, लेकिन प्रधानमंत्री की अपील से देश को भावी संकटों का आभास हो गया है। बेशक यह संकट 1991 के आर्थिक संकट जैसा नहीं हो, लेकिन मौजूदा माहौल में उसकी अनदेखी भी नहीं की जा सकती।

इन अपीलों के तत्काल बाद सोने के आयात शुल्क बढ़ाने और दूध की कीमतों में बढ़ोत्तरी ने संकेत दे दिए हैं कि आने वाले दिनों में कीमतों में और उछाल आ सकता है। स्विटजरलैंड की ठंडी वादियों से उन्होंने आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाने का संकेत देकर गर्मी बढ़ा दी है। साफ है कि अगर ट्रंप और ईरान के बीच तनातनी जारी रही और पश्चिम एशिया संकट का जल्द कोई समाधान नहीं निकला तो वैश्विक संकट बढ़ेगा और इसकी परिधि में भारत भी आएगा। प्रधानमंत्री की अपीलों का मतलब साफ है कि आने वाले दिनों में चुनौतियों का सामना करने के लिए देश मानसिक रूप से तैयार रहे।

जब भी ऐसे संकट आते हैं, सरकारें उनका फौरी समाधान खोजती हैं, और उसमें सफल भी रहती हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बार भी कुछ ऐसा ही होगा। वैश्विक स्तर पर

विकास का हमने जो मॉडल अपना रखा है, उसमें शहरीकरण पर जोर है। इस मॉडल ने भारी उत्पादन और उसके उतने ही उपभोग की व्यवस्था को भी बढ़ावा दिया है। इसमें प्राकृतिक संसाधनों का प्राकृतिक और सीमित उपयोग की पारंपरिक व्यवस्था पीछे छूट गई है। इस मॉडल के जरिए आ रहे विकास में ऊर्जा की खपत ज्यादा है। चाहे वह विद्युत ऊर्जा हो या पेट्रोलियम। ऊर्जा के अंधाधुंध खर्च आधारित इस विकास मॉडल की गति का बुनियादी माध्यम पेट्रोलियम ही है। कई बार तो बिजली का उत्पादन भी पेट्रोलियम यानी जीवाश्म आधारित गैसों के जरिए ही होता है। चूंकि पश्चिम एशिया संकट में दुनिया को सचल बनाए रखने वाली इसी जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों पर संकट है, इसलिए पूरी दुनिया त्रस्त हो रही है। आधुनिक विकास मॉडल ने दुनिया को विश्व ग्राम में तब्दील कर दिया है, इस लिहाज से भारत भी वैश्विक ग्राम का एक मोहल्ला ही है तो फिर वह इस संकट से कैसे उबर सकता है।

हालांकि भारतीय संस्कृति और व्यवस्था उपभोग केंद्रित नहीं रही है। यहां प्रकृति के सीमित एवं मर्यादित इस्तेमाल की परंपरा रही है। इस परंपरा को भारतीय ग्राम व्यवस्था ने हजारों साल तक अपनाए रखा। गांवों को भी शहरों की तर्ज पर विकसित करने की कोशिश हो रही है। मौजूदा वैश्विक मॉडल गांव को पारंपरिक तरीके का गांव नहीं रहने देना चाहता, बल्कि उसे स्थानीय स्तर का शहर बनाना चाहता है। इसमें दो राय नहीं कि इस वैश्विक विकास मॉडल के चलते गांव ना तो पारंपरिक रूप से गांव रह पाए हैं और ना ही शहर बन पाए हैं। अगर मान लें कि हमारी सभ्यता पांच हजार साल की ही है तो हमारे गांवों में पांच हजार साल से जारी संस्कृति के गुणसूत्र यानी जीन हैं। इसी वजह से आज भी गांव भारतीय समाज की धुरी बने हुए हैं। कुछ वैसे ही जैसे बछड़े का खूंटा होता है। इसीलिए जब भी संकट की आशंका बढ़ती है, शहरों का वह तबका, जिसकी जड़ें या नाभिनाल गांवों में अब भी है, जो महज रोजी-रोटी के लिए शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर है, उसे उम्मीद अपने गांव की तरफ ही दिखती है। फिर वह लौटने लगता है। औद्योगिक केंद्रों से कामगारों का इन दिनों कोरोना काल की तरह गांवों की ओर पलायन नहीं हो रहा है, लेकिन वापसी तो इस बार भी हो ही रही है। लोगों को उम्मीद है कि बिना रसोई गैस के भी उनके गांव में साधारण ही सही भोजन तो जरूर मिल जाएगा, बिजली ना भी रहे तो भी वहां रात गुजारी जा सकेगी।

कोरोना काल में भारत ने महसूस किया था कि गांव भारत की अब भी धुरी हैं। तब गांवों के हालात को बेहतर करने और गांवों में ही कामधंधे की व्यवस्था करने की बातें खूब हुई थीं। कोरोना ने सिखाया था कि हमें प्रकृति की ओर लौटना चाहिए। गांव उसी प्राकृतिक व्यवस्था के अंग हैं। लेकिन जैसे ही संकट बीता, हमने अपनी सोच को अचानक से झटक दिया और फिर उपभोग आधारित व्यवस्था की ओर कदम बढ़ा लिए। महज छह साल के भीतर नियति ने दुनिया के सामने खुद की ओर झांकने का मौका दिया है। पिछली बार नियति के चक्र से परेशान विश्व ने अपनी संस्कृति, प्रकृति और उनके अंतरसंबंधों की ओर उम्मीदभरी निगाहों से देखा और परखा था। लेकिन जैसे ही संकट का वक्त खत्म हुआ, दुनिया उसी करें पर चलने लगी।

पश्चिम एशिया संकट ने एक बार फिर अवसर दिया है कि प्रकृति और संस्कृति के मेल वाली व्यवस्था पर विचार करें। वैश्विक ग्राम की अवधारणा के दौर में समूची व्यवस्था पीछे की ओर लौट तो नहीं सकती, लेकिन वह संतुलन बनाने की कोशिश जरूर कर सकती है। जिसमें ऊर्जा के आधुनिक संसाधनों के अंधाधुंध प्रयोग को सीमित करने की चिंता होगी। ऊर्जा के अंधाधुंध इस्तेमाल आधारित विकास का मॉडल के विकल्प को भी सोचने की बात होगी। गांधी जी ने कहा है कि पृथ्वी सबकी आवश्यकताओं को पूरा कर सकती है, लेकिन लोभ को नहीं। उन्होंने उपभोक्तावाद और औद्योगीकरण के दुष्प्रभावों को पहले ही भांप लिया था। इसीलिए वे हर वस्तु के नैतिक उपयोग और जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन बनाए रखने पर जोर दिया। दीनदयाल उपाध्याय भी एकात्म मानववाद में मनुष्य से उम्मीद करते हैं कि उसे प्रकृति का शोषण करने की बजाय उससे तालमेल बिठाकर जीवन को आगे बढ़ाना चाहिए। एकात्म मानबबाद में वे मानते हैं कि प्रकृति के संसाधनों का उपयोग जरूरत के अनुसार किया जाना चाहिए, लालच के कारण नहीं। वैसे भी भारतीय परंपरा में पेड़, नदी, पानी, पहाड़ सभी पूजनीय हैं। इसका बुनियादी आधार है, प्रकृति से तालमेल। लेकिन पूरी दुनिया इस तालमेल को ही भूल रही है। अंधाधुंध विकास की अवधारणा भी एक तरह से इस तालमेल का नकार ही है।

कोरोना संकट के दौरान प्रकृति से सामंजस्य पर जोर देने के विचार को गति मिली थी। पश्चिम एशिया संकट उसकी फिर से याद दिला रहा है। जरूरत है कि उस विचार को ना सिर्फ गति दी जाए, बल्कि उसे वास्तविकता के धरातल पर भी उतारने के प्रयास हों। जब ऐसा होगा तो भविष्य में जब भी आज जैसे संकट सामने आएंगे, अफरातफरी नहीं होगी। क्योंकि उसमें संकट के समाधान की माकूल राह भी होगी। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इस तरह से देश और दुनिया सोचने को तैयार है?

कोरोना काल में भारत ने महसूस किया था कि गांव मारत की अब भी धुरी है। तब गांवों के हालात को बेहतर करने और गांवों में ही कामधंधे की व्यवस्था करने की बातें खूब हुई थी। कोरोना ने सिखाया था कि हमें प्रकृति की ओर लौटना चाहिए। गांव उसी प्राकृतिक व्यवस्था के अंग हैं। लेकिन जैसे ही संकट बीता, हमने अपनी ससेच को अचानक से झाटक दिया और फिर उपभोग आधारित व्यवस्था की ओर कदम बढ़ा लिए। महज छह साल के भीतर नियति ने दुनिया के सामने खुद की ओर झांकने का मौका दिया है।


 

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