पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लगातार चौथी बार सत्ता में वापसी की कोशिश में हैं। साल 2021 के बाद अप्रैल 2026 में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में दूसरी बार भाजपा जहां ममता बनर्जी को कड़ी टक्कर देती दिख रही है तो वहीं ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ाने की पूरी तैयारी कर ली है। ओवैसी ने पश्चिम बंगाल के वर्चित मुस्लिम नेता हुमायूं कबीर की जनता उन्नयन पार्टी (जेयूपी) के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। जिससे ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का कोर वोटर यानि मुस्लिम वोट बैंक बिखरने की संभावना बढ़ गई है।
अपने इस वोट बैंक को बचाए रखने के लिए ममता बनर्जी ने भाजपा के नाम से मुस्लिम समाज को डराना शुरू कर दिया है। मुस्लिम समाज को आगाह करते हुए एक चुनावी रैली में ममता बनर्जी ने साफ तौर पर कहा कि 'हम हैं इसलिए आप सुरक्षित हैं। अगर हम किसी दिन न रहे तो एक सैकंड लगेगा मुस्लिम समाज को डरा रहीं ममता बनर्जी जब एक समुदाय इकट्ठा होकर आएगा और आपको घेर लेगा... फिर एक सेकंड में 12 बजा देगा, यानी खत्म कर देगा। दरअसल पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से बहुस्तरीय और जटिल रही है। यहां जाति, धर्म, क्षेत्रीय अस्मिता और राजनीतिक रणनीति एक साथ मिलकर चुनावी नतीजों को प्रभावित करते हैं। एआईएमआईएम और जेयूपी के साथ गठबंधन इसी जटिलता में एक नए आयाम जोड़ना वाला है। यह नया गठबंधन मुस्लिम बोट बैंक की पुनर्सरचना कर परिणामों की प्रभावित कर सकता है।
पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी चुनाव परिणामों पर निर्णायक प्रभाव डालती है। राज्य में टीएमसी के लिए मुस्लिम फैक्टर चुनावी राजनीति का सबसे मजबूत आधार है। पश्चिम बंगाल में मुस्लिम समुदाय का पूरी आबादी में लगभग 27 से 30 प्रतिशत हिस्सा है। ध्यान देने वाली बात यह है कि मुस्लिम मतदाता पश्चिम बंगाल की करीब 100 से 120 विधानसभा सीटों पर काफी हद तक निर्णायक भूमिक निभाते हैं। ऐसे में असदुद्दीन ओवैसी और हुमायूं कबीर के बीच नए गठबंधन के दूरगामी राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं। यानि मुस्लिम वोट बैंक बिखरने का बड़ा खामियाजा टीएमसी उम्मीदवारों को भुगतना पड़ सकता है। टीएमसी से निष्कासित विधायक हुमायूं कबीर मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद का निर्माण करा रहे हैं। हिन्दू वोट बैंक को साधने की नीयत से ममता बनर्जी ने हुमायू कबीर को इसी बात पर पार्टी से निकाल दिया था।
इसके बाद हुमायूं कबीर ने अपनी अलग से जनता उन्नयन पार्टी बनाकर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी से गठबंधन कर लिया है। यह गठबंधन ममता बनर्जी के मुस्लिम समीकरण को चुनौती देता नजर आ रहा है। हुमायूं कबीर का यह दावा कि यह टीएमसी में मुस्लिम समाज को पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है। दावा एक ऐसी बहस को जन्म देता है जो टीएमसी के पारंपरिक वोट बैंक में असंतोष पैदा कर सकता है। हुमायूं कबीर द्वारा बड़ी संख्या में उम्मीदवार उतारना इस बात का संकेत है कि वे केवल प्रतीकात्मक उपस्थिति नहीं, बल्कि वास्तविक चुनावी चुनौती पेश करना चाहते हैं। ओवैसी की बात करें तो उनकी राजनीति अक्सर उन राज्यों में प्रभाव डालती रही है। जहां मुस्लिम वोटों का एक बड़ा हिस्सा किसी एक दल के साथ जुड़ा होता है।
पश्चिम बंगाल में उनकी एंट्री भी इसी रणनीति का हिस्सा है। एआईएमआईएम की मुस्लिम समाज में पकड़ मानी जाती है। ऐसे में हुमायूं कबीर से जुड़कर उन्होंने मुस्लिमों की धार्मिक भावना को भी हवा दे दी है। ओवैसी-कबीर के बीच गठबंधन से मुस्लिम वोटों में बिखराव से कई सीटों पर परिणाम बदल सकता है। अगर मुस्लिम वोटों का छोटा हिस्सा भी टीएमसी से हटकर इस नए गठबंधन की ओर चला गया तो यह सीधे तौर पर टीएमसी को नुकसान और भाजपा के लिए फायदे का कारण बन सकता है।