Bengal Violence Biggest Challenge Now

बंगाल में राजनीतिक हिंसा रोकना सबसे बड़ी चुनौती

पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद हिंसा और राजनीतिक तनाव नई सरकार के सामने बड़ी चुनौती बन गया है। बदलते जनादेश, प्रशासन और लोकतांत्रिक माहौल पर विशेष विश्लेषण।

By : स्वदेश डेस्क
बंगाल में राजनीतिक हिंसा रोकना सबसे बड़ी चुनौती

अवधेश कुमार

पश्चिम बंगाल से चार तरह की चिंताजनक तस्वीरें सामने आईं। पहली, तमाम कोशिशों के बावजूद हिंसा की घटनाएं लगातार होती रहीं। दूसरी, तृणमूल कांग्रेस और उसकी नेता ममता बनर्जी ने विनम्रता से जनादेश स्वीकार करने के बजाय यह कहना जारी रखा कि उनकी 100 सीटें चुनाव आयोग ने “लूट लीं”। तीसरी, विपक्षी नेताओं ने सबसे अधिक समर्थन और सहानुभूति तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी को दी।केरल में माकपा नेतृत्व वाले वाम मोर्चे की सत्ता चली गई, लेकिन वहां ऐसी प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली। तमिलनाडु में भी सामान्य लोकतांत्रिक व्यवहार दिखाई दिया। वहां के नेताओं ने न चुनाव आयोग पर आरोप लगाए और न ही हार स्वीकारने से इनकार किया।

पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार बनने के बाद उम्मीद जगी है कि चुनाव बाद की हिंसा पर नियंत्रण होगा। चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में चुनाव हुए, जिनमें पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु में सत्तारूढ़ दलों की हार हुई। लेकिन जैसा डरावना माहौल बंगाल में देखने को मिला, वैसा कहीं और नहीं दिखा।हालांकि बंगाल में एक चौथी तस्वीर भी सामने आई, जिसने पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया। प्रदेश के कई हिस्सों में लोग चुनाव परिणाम के बाद विजय उत्सव मनाते नजर आए। कहीं विजय जुलूस निकले, कहीं होली खेली गई और कहीं कीर्तन हुए। ऐसा लगा मानो लोग किसी दबाव से मुक्त हुए हों।इन आयोजनों में महिलाएं, पुरुष, दलित, जनजाति, युवा और किशोर सभी शामिल थे। खास बात यह रही कि इनमें से अधिकांश कार्यक्रम भाजपा द्वारा आयोजित नहीं थे, बल्कि स्वतःस्फूर्त थे। बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी शामिल थे, जिनका भाजपा से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था।

यह तस्वीर बताती है कि 15 वर्षों के तृणमूल शासन के खिलाफ व्यापक असंतोष था और लोग बदलाव चाहते थे। साथ ही यह भी स्पष्ट हुआ कि हिंसा की खबरों से कहीं बड़ा सकारात्मक जनमत पूरे प्रदेश में मौजूद है। यही उम्मीद जगाता है कि बंगाल हिंसा के दौर से बाहर निकल सकता है।हालांकि यह परिवर्तन अपने आप नहीं होगा। कई स्थानों पर हिंसा उन मकानों, जमीनों और कार्यालयों को लेकर हुई, जिन पर तृणमूल नेताओं के कब्जे की शिकायतें थीं। लोग उन्हें मुक्त कराने के लिए सड़कों पर उतर आए। कुछ धर्मस्थलों को लेकर भी ऐसे दृश्य सामने आए।कई गांवों में लोगों ने नारे लगाए और गुस्से में तृणमूल समर्थकों के साथ हाथापाई की घटनाएं भी हुईं। यह भी हिंसा है और इसे रुकना चाहिए। लेकिन इससे यह भी स्पष्ट होता है कि तृणमूल शासन में दादागिरी और माफियागिरी के खिलाफ लोगों में गहरा आक्रोश था।दूसरी ओर, यदि विजय जुलूसों पर बमों से हमला हो, लोगों को खींचकर पीटा जाए या सत्ता परिवर्तन के नाम पर हत्या और प्रतिशोध की राजनीति चले, तो यह साफ संकेत है कि प्रदेश में स्वस्थ लोकतांत्रिक माहौल नहीं है।

सबसे ज्यादा चर्चा शुभेंदु अधिकारी के सहयोगी देवनाथ रथ की हत्या को लेकर हुई। उत्तर 24 परगना के मध्यग्राम में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई। घटना का तरीका बताता है कि यह पूर्व नियोजित हमला था, जिसमें पेशेवर हत्यारों का इस्तेमाल हुआ। इसे सामान्य अपराध नहीं कहा जा सकता।नरेंद्र मोदी ने चुनाव परिणाम की शाम भाजपा मुख्यालय में कहा था कि राजनीतिक हिंसा रुकनी चाहिए और “हमें बदले की नहीं, बदलाव की राजनीति करनी है।” भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने भी चेतावनी दी कि हिंसा में शामिल किसी भी कार्यकर्ता को निष्कासित किया जाएगा।सत्ता संभालने के बाद शुभेंदु अधिकारी ने कानून-व्यवस्था पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया और धीरे-धीरे स्थिति बदलने लगी।चुनाव से जुड़ी हिंसा इस मानसिकता का प्रमाण होती है कि कोई दल हर हाल में केवल अपनी जीत चाहता है। मतदाता खुश है या नाराज, समर्थक है या विरोधी  इससे फर्क नहीं पड़ता। यदि वह दूसरे दल को वोट देना चाहता है, तो उसे डराकर रोकना या बाद में सबक सिखाना लक्ष्य बन जाता है।

पश्चिम बंगाल में इसकी शुरुआत 1970 के दशक में कांग्रेस शासन के दौरान हुई। बाद में वाम मोर्चा इसके विरोध के नाम पर सत्ता में आया, लेकिन राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ हिंसा, दमन, आगजनी और कब्जे की राजनीति जारी रही।ममता बनर्जी ने लंबे समय तक इसके खिलाफ संघर्ष किया और स्वयं भी हिंसा की शिकार रहीं, लेकिन सत्ता में आने के बाद तृणमूल कांग्रेस ने इसी राजनीति को और आक्रामक रूप दे दिया।2018 पंचायत चुनाव के दौरान और उसके बाद तृणमूल शासन में हिंसा की कई घटनाएं सामने आईं। लूट, आगजनी, हत्या और बलात्कार की घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया। बड़ी संख्या में लोगों को पलायन तक करना पड़ा।2022 विधानसभा चुनाव के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 1900 से अधिक हिंसा की घटनाएं दर्ज कीं, जिनमें कई हत्या के मामले शामिल थे। इनमें से कई मामलों की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को सौंपी गई।

2026 का विधानसभा चुनाव इन सबसे अलग रहा। चुनाव आयोग ने अभूतपूर्व संख्या में केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात किए। अमित शाह ने घोषणा की थी कि ये बल चुनाव के बाद भी दो महीने तक प्रदेश में रहेंगे। प्रशासनिक अधिकारियों के बड़े पैमाने पर तबादले हुए और सुरक्षा का माहौल बनाया गया।इसका परिणाम यह हुआ कि पिछले कई दशकों में पहली बार बंगाल में अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण चुनाव देखने को मिला।फिर भी चुनौती समाप्त नहीं हुई है। तृणमूल कांग्रेस के लंबे शासन के दौरान सत्ता से जुड़े कई निहित स्वार्थ विकसित हो गए थे। टोल वसूली, कट मनी, सिंडिकेट और स्थानीय दबदबे की राजनीति कई लोगों के लिए कमाई का माध्यम बन चुकी थी।सत्ता परिवर्तन के बाद ऐसे तत्व प्रतिशोध की कोशिश करेंगे, यह स्वाभाविक है। दूसरी ओर, जिन लोगों ने इन व्यवस्थाओं का विरोध किया, उनके भीतर भी गुस्सा है। प्रशासन और पुलिस का व्यापक “तृणमूलीकरण” भी स्थिति को जटिल बनाता है।

जब ममता बनर्जी यह कहती हैं कि चुनाव आयोग और सुरक्षा बलों ने मिलकर उन्हें हराया, तो इसका असर उनके समर्थकों पर पड़ना स्वाभाविक है। इससे यह संदेश जाता है कि चुनाव परिणाम को सहज रूप से स्वीकार नहीं किया जाए।इसी कारण पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा को पूरी तरह नियंत्रित करना भाजपा सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। हालांकि दंगाइयों और अपराधियों के खिलाफ तेज कार्रवाई से उम्मीद जरूर जगी है कि बंगाल धीरे-धीरे शांति और स्वस्थ लोकतांत्रिक माहौल की ओर बढ़ेगा।

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