भाजपा के नए रोल मॉडल: योगी, हेमंत, शुभेंदु

नई भाजपा के रोल मॉडल हैं योगी, हेमंत और शुभेंदु!

उत्तर प्रदेश, असम और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री भाजपा की राजनीतिक दिशा में नए प्रतिमान स्थापित कर रहे हैं। इन्हें दल के नए रोल मॉडल के रूप में देखा जा रहा है।

By : स्वदेश डेस्क
नई भाजपा के रोल मॉडल हैं योगी, हेमंत और शुभेंदु!

प्रो. संजय द्विवेदी

उत्तर प्रदेश एक ऐसे मुख्यमंत्री से रूबरू है, जिसे राजनीति के मैदान में बहुत गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था। उनके बारे में यह धारणा थी कि वे एक खास वर्ग की राजनीति करते हैं और भारतीय जनता पार्टी भी उनकी राजनीतिक शैली से पूरी तरह सहमत नहीं है। लेकिन उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह अपनी पकड़ बनाई है और देश में एक अलग मॉडल खड़ा किया है, वह सर्वत्र चर्चा का विषय है। इससे यह भी साबित हो रहा है कि ‘अपनी राजनीति’ के प्रति भाजपा का आत्मदैन्य कम हो रहा है।

वहीं असम में हेमंत विश्व शर्मा उम्मीदों के चेहरे बनकर उभरे हैं। असम में तीसरी बार सरकार बनाकर भाजपा ने पूर्वोत्तर में इतिहास रच दिया है। इसी तरह गृहमंत्री अमित शाह की रणनीति से पश्चिम बंगाल की विजय ऐतिहासिक कही जा रही है और वहां बने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के ताबड़तोड़ फैसलों ने जनविश्वास की नई लहर पैदा की है। जड़ता को तोड़कर एक नई उम्मीद बनी है। केंद्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के आगमन ने भारतीय राजनीति के परिदृश्य को बदलकर रख दिया है।

वैचारिक हीनग्रंथि से बाहर आई भाजपा

भाजपा का आज तक का ट्रैक हिंदुत्व का वैचारिक और राजनीतिक इस्तेमाल कर सत्ता में आने का रहा है। देश की राजनीति में चल रहे विमर्श में भाजपा बड़ी चतुराई से इस कार्ड का इस्तेमाल तो करती थी, किंतु उसके नेतृत्व में इसे लेकर एक हिचक बनी रहती थी। वह हिचक अटल जी से लेकर आडवाणी तक हर दौर में दिखी है। भाजपा का हर नेता सत्ता पाने के बाद यह साबित करने में लगा रहता था कि वह अन्य दलों के नेताओं से कम ‘सेकुलर’ नहीं है।उत्तर प्रदेश की ‘आदित्यनाथ परिघटना’ दरअसल भाजपा की वैचारिक हीनग्रंथि से मुक्ति को स्थापित करती नजर आती है। नरेंद्र मोदी के राज्यारोहण के बाद योगी आदित्यनाथ का उदय भारतीय राजनीति में एक अलग किस्म की राजनीति की स्वीकृति का प्रतीक है।

एक धर्मप्राण देश में धार्मिक प्रतीकों, भगवा रंग और संन्यासियों के प्रति जैसी विरक्ति मुख्यधारा की राजनीति में दिखाई देती थी, वह अन्यत्र दुर्लभ है। भाजपा जैसे दल भी इस सेकुलर विकार से कम ग्रस्त नहीं थे। धर्म और धर्माचार्यों का इस्तेमाल, धार्मिक आस्था का दोहन और सत्ता पाते ही सभी धार्मिक प्रतीकों से दूरी बनाकर राजनीति का केंद्र तुष्टिकरण बन जाना एक स्थापित परिपाटी रही है। प्रधानमंत्रियों समेत न जाने कितने सत्ताधीशों के ताज जामा मस्जिद में झुके होंगे, लेकिन हिंदुत्व के प्रति उनकी हिचक निरंतर बनी रही।

राजनीतिक व्याख्याओं का बदलता दौर

यह भी कम आश्चर्यजनक नहीं कि एक समय दीनदयाल जी उदार माने जाते थे, तो अटल जी और बलराज मधोक अपनी स्पष्टता के कारण उग्र नेता कहे जाते थे। अटल जी का दौर आया तो लालकृष्ण आडवाणी उग्र कहे जाने लगे। फिर एक समय ऐसा भी आया जब आडवाणी उदार हो गए और नरेंद्र मोदी उग्र माने जाने लगे।आज की व्याख्याएं सुनें तो कहा जाता है कि नरेंद्र मोदी उदार हो गए हैं और योगी आदित्यनाथ तथा गृहमंत्री अमित शाह उग्र माने जाने लगे हैं। अब तो असम के मुख्यमंत्री हेमंत विश्व शर्मा और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी आदित्यनाथ की परंपरा के मुख्यमंत्री कहे जाने लगे हैं।

सेकुलर संक्रमण से मुक्ति ने दी नई पहचान

यह मीडिया और बौद्धिक वर्ग की अपनी-अपनी व्याख्याएं हैं। लेकिन सच यह है कि अटल, मधोक, आडवाणी, मोदी, अमित शाह, आदित्यनाथ, हेमंत विश्व शर्मा और शुभेंदु अधिकारी अलग-अलग विचारधाराओं के प्रतिनिधि नहीं हैं। वे एक विचार के प्रति समर्पित राष्ट्रनायकों की श्रृंखला का हिस्सा हैं। इनमें कोई कम या ज्यादा उदार अथवा कठोर नहीं है।भारतीय राजनीति का विमर्श ऐसा है, जिसमें वास्तविकता से अधिक नाटकीयता पर भरोसा किया जाता है। भारतीय राजनेता की मजबूरी रही है कि वह टोपी पहने, रोजा भले न रखे, लेकिन इफ्तार की दावत अवश्य दे। सरकारी स्तर पर यह प्रहसन लंबे समय तक चलता रहा है।

भाजपा भी इसी राजनीतिक परिवेश में काम करती रही है। उसमें भी इस तरह के रोग रहे हैं। वह भी राष्ट्रनीति के साथ कुछ मात्रा में तुष्टिकरण को गलत नहीं मानती थी। जबकि उसका मूल नारा रहा है “सबको न्याय, तुष्टिकरण किसी का नहीं।” उसका एक और नारा था- “राम, रोटी और इंसाफ।”

अपनी वैचारिक भूमि पर खड़ी भाजपा

लंबे समय बाद भाजपा में अपनी वैचारिक लाइन को लेकर गर्व का भाव दिखाई देता है। अरसे बाद वह भारतीय राजनीति के सेकुलर संक्रमण से मुक्त होकर अपनी वैचारिक भूमि पर गरिमा के साथ खड़ी दिख रही है। समझौतों और आत्मसमर्पण की मुद्राओं के बजाय उसमें अपनी वैचारिक भूमि के प्रति हीनग्रंथि के भाव कम हुए हैं।

अब वह अन्य दलों की नकल करने के बजाय अपनी वैचारिक रेखा पर चलते हुए दिखाई देती है। दिखावटी सेकुलरिज्म के स्थान पर उसमें वास्तविक राष्ट्रीयता के दर्शन होते हैं। मोदी जब 140 करोड़ हिंदुस्तानियों की बात करते हैं तो विमर्श अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की सीमाओं से ऊपर उठ जाता है। यहां देश केंद्र में आता है और नई राजनीति का आरंभ दिखाई देता है।

एक भगवाधारी संन्यासी जब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठता है तो वह त्याग, परिवारवाद के विरोध, तुष्टिकरण के विरोध और सबके लिए न्याय का संदेश देता है।

भारतीयता का विमर्श बना केंद्रीय विमर्श

आजादी के बाद के सात दशकों में देश की राजनीति का विमर्श भारतीयता और उसकी जड़ों की ओर लौटने के बजाय पश्चिमी और वामपंथी विचारों के प्रभाव में रहा। बेहतर होता कि स्वतंत्रता के बाद हम अपनी ज्ञान परंपरा की ओर लौटते और अपनी जड़ों को मजबूत करते। लेकिन सत्ता, शिक्षा, समाज और राजनीति में हमने पश्चिमी तथा वामपंथी विचारों के आधार पर संरचनाएं खड़ी कीं।इसके कारण हमारा अपने समाज से रिश्ता कमजोर होता चला गया। सत्ता और जनता के बीच दूरी बढ़ती गई। सत्ता दाता बन बैठी और जनता याचक। सेवक मालिक बन गए। ऐसे में लोकतंत्र एक छद्म लोकतंत्र में बदलता दिखाई दिया। यह लोकतंत्र की विफलता ही है कि हम आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह लोकतंत्र की विफलता ही है कि देश के कुछ हिस्सों में युवाओं ने भारतीय राज्य के खिलाफ हथियार उठा लिए थे। गृहमंत्री अमित शाह के दृढ़ संकल्प की बदौलत माओवादी हिंसा पर नियंत्रण की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता मिली है।

उम्मीद और भरोसे के नए चेहरे

पिछले सात दशकों में लोकतंत्र की विफलताओं की अनेक कहानियां बिखरी पड़ी हैं। राजनीतिक व्यवस्था के प्रति लोगों का भरोसा भी कमजोर हुआ था। लेकिन आज ऐसा लगता है कि राजनीति से कुछ सकारात्मक हो सकता है। मोदी, शाह और आदित्यनाथ भरोसे के प्रतीक बन गए हैं। लोगों को लगता है कि यदि वे कुछ कहते हैं तो उसे पूरा करने का प्रयास भी करते हैं।नरेंद्र मोदी, अमित शाह और योगी आदित्यनाथ देश की इन्हीं उम्मीदों के चेहरे हैं। तीनों अंग्रेजी नहीं बोलते। तीनों जन-मन-गण के प्रतिनिधि हैं। यह भारतीय राजनीति का बदलता हुआ चेहरा है।

क्या सचमुच भारत खुद को पहचान रहा है? क्या वह जातियों, पंथों और क्षेत्रों की सीमाओं से ऊपर उठकर एक बड़ी पहचान से जुड़ रहा है? वह पहचान है  भारतीय होने की, राष्ट्रीय होने की। एक समय राजनीति लोगों को निराश करती हुई दिखाई देती थी। बदले हुए समय में वही राजनीति उम्मीद जगा रही है। कुछ चेहरे ऐसे हैं जो भरोसा पैदा करते हैं। एक आकांक्षी भारत आकार लेता दिखाई दे रहा है। यदि ये आकांक्षाएं राजनीतिक दलों के एजेंडे से जुड़ सकें तो देश और तेजी से आगे बढ़ सकता है।राजनीतिक विमर्श और जनविमर्श को साथ लाने की कवायद हमें करनी ही होगी। जितनी जल्दी यह होगा, उतनी ही जल्दी भारत अपने भाग्य पर इठलाता हुआ दिखाई देगा।

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