सुबह से शाम तक मोबाइल, लैपटॉप, टीवी और सोशल मीडिया के बीच समय बिताने के बाद अगर आपको बिना किसी शारीरिक मेहनत के भी थकान महसूस होती है, तो इसे हल्के में लेने की जरूरत नहीं है। न्यूरोसाइंटिस्ट्स और मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि यह ‘ब्रेन रॉट’ का संकेत हो सकता है, जो डिजिटल दौर की तेजी से बढ़ती समस्या बनता जा रहा है।
हालांकि ‘ब्रेन रॉट’ कोई आधिकारिक मेडिकल बीमारी नहीं है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि लगातार स्क्रीन देखने, छोटी-छोटी वीडियो क्लिप्स और सूचनाओं की बाढ़ ने लोगों की एकाग्रता, सोचने की क्षमता और मानसिक ऊर्जा पर असर डालना शुरू कर दिया है। यही वजह है कि यह शब्द अब दुनियाभर में चर्चा का विषय बन चुका है।
आखिर क्या है ‘ब्रेन रॉट’ और क्यों बढ़ रही चिंता?
लंदन मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक डॉ. वेंडी रॉस के मुताबिक, जब इंसान लगातार जानकारी तो ग्रहण करता है लेकिन उसका विश्लेषण या उपयोग नहीं करता, तब दिमाग पर अनावश्यक दबाव बढ़ने लगता है। दरअसल, आज के समय में मोबाइल फोन और सोशल मीडिया ने जानकारी तक पहुंच को बेहद आसान बना दिया है। लेकिन यही सुविधा कई बार समस्या भी बन जाती है। लगातार स्क्रॉलिंग, रील्स और शॉर्ट वीडियो देखने से दिमाग को सोचने और गहराई से समझने का मौका कम मिलता है। विशेषज्ञों का मानना है कि एआई टूल्स और अल्गोरिदम आधारित कंटेंट इस स्थिति को और तेज कर रहे हैं। लोग पहले से ज्यादा कंटेंट देख रहे हैं, लेकिन कम याद रख पा रहे हैं।
क्यों महसूस होती है मानसिक थकान?
अक्सर लोग सोचते हैं कि थकान केवल शारीरिक मेहनत से होती है। लेकिन मानसिक थकावट भी उतनी ही वास्तविक होती है। लेखक ऑस्कर डी बॉस के अनुसार, जब कोई व्यक्ति बार-बार एक काम छोड़कर दूसरे काम पर जाता है, तो दिमाग पूरी तरह किसी एक गतिविधि से बाहर नहीं निकल पाता। इसे मनोविज्ञान की भाषा में ‘अटेंशन रेजिड्यू’ या ध्यान का भटकाव कहा जाता है। यही कारण है कि कई लोग दिनभर व्यस्त रहने के बावजूद किसी काम में संतोषजनक परिणाम नहीं देख पाते। यही सवाल अब उठ रहा है कि क्या लगातार नोटिफिकेशन, सोशल मीडिया अपडेट और मल्टीटास्किंग हमारी उत्पादकता को कम कर रहे हैं? विशेषज्ञों का जवाब काफी हद तक ‘हां’ में है।
दिमाग को तेज रखने के लिए क्या करें?
ऑस्ट्रेलियाई न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. लीला लैंडोव्स्की का कहना है कि दिमाग की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए नियमित और चुनौतीपूर्ण व्यायाम बेहद जरूरी है। उनके अनुसार, सप्ताह में कम से कम तीन बार हाई-इंटेंसिटी एक्सरसाइज करने से मस्तिष्क की नसों को मजबूती मिलती है और एकाग्रता बेहतर होती है। वहीं डॉ. वेंडी रॉस एक आसान अभ्यास सुझाती हैं। वह कहती हैं कि रोज सिर्फ 10 मिनट के लिए किसी एक आवाज पर ध्यान केंद्रित करें। यह घड़ी की टिक-टिक, पंखे की आवाज या पक्षियों की चहचहाहट भी हो सकती है। ऐसे में दिमाग की ‘अटेंशन मसल’ मजबूत होती है और फोकस बढ़ता है। इसके अलावा तनाव के कारणों को लिखना, डिजिटल डिटॉक्स करना और बार-बार काम बदलने की आदत छोड़ना भी फायदेमंद माना जाता है।
आम लोगों पर क्या असर पड़ सकता है?
ब्रेन रॉट की सबसे बड़ी चिंता यह है कि इसका असर केवल कामकाजी लोगों तक सीमित नहीं है। छात्र, प्रोफेशनल्स, गृहिणियां और यहां तक कि किशोर भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। कम होती एकाग्रता, याद्दाश्त में गिरावट, निर्णय लेने में कठिनाई और लगातार मानसिक थकान जैसे संकेत भविष्य में बड़ी चुनौतियों का कारण बन सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक से दूरी बनाना समाधान नहीं है, बल्कि उसका संतुलित उपयोग सीखना ज्यादा जरूरी है। फिलहाल, डिजिटल दुनिया से घिरे इस दौर में एक बात साफ है दिमाग को स्वस्थ रखने के लिए केवल शरीर का आराम काफी नहीं, बल्कि मानसिक अनुशासन भी उतना ही जरूरी हो गया है।