Hydrogen Train vs Vande Bharat

हाइड्रोजन ट्रेन आई तो क्या वंदे भारत पर पड़ेगा असर, समझिए दोनों की तकनीक और भूमिका

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को हरी झंडी दिखाई है। इसके शुरू होने के साथ ही नई बहस छिड़ गई है। जानिए यह ट्रेन वंदे भारत से कितनी अलग है।

हाइड्रोजन ट्रेन आई तो क्या वंदे भारत पर पड़ेगा असर, समझिए दोनों की तकनीक और भूमिका

Indian Railway New Train News

भारतीय रेलवे लगातार अपने विकास के चरणों में एक कदम और आगे बढ़ गई है। भाप निकालने वाली ट्रेन से शुरू होकर आज इसका सफर हाइड्रोजन ट्रेन तक पहुंच गया है। इस नई तकनीक के साथ भारतीय रेलवे ने एक नया अध्याय शुरू कर दिया है। इसके बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या यह नई तकनीक वंदे भारत जैसी ट्रेनों की जगह लेगी या दोनों की भूमिका अलग-अलग रहेगी। 

एक ओर वंदे भारत तेज रफ्तार और हाई-डिमांड रूट्स की जरूरत पूरी करती है। दूसरी ओर हाइड्रोजन ट्रेन उन इलाकों के लिए तैयार की गई है जहां बिजली के ओवरहेड तार बिछाना व्यावहारिक या पर्यावरणीय रूप से आसान नहीं है। यानी दोनों का मकसद अलग है और यही इनके बीच सबसे बड़ा अंतर भी है।

हाइड्रोजन ट्रेन कैसे करती है काम

हाइड्रोजन ट्रेन पारंपरिक इलेक्ट्रिक ट्रेन की तरह बाहरी बिजली पर निर्भर नहीं रहती। इसमें फ्यूल सेल तकनीक का इस्तेमाल होता है, जो हाइड्रोजन की मदद से चलते समय ही बिजली तैयार करती है। इसी बिजली से ट्रेन संचालित होती है। इस प्रक्रिया में धुआं या कार्बन उत्सर्जन नहीं होता और शोर भी बेहद कम रहता है। यही वजह है कि इसे पर्यावरण के लिहाज से भविष्य की तकनीक माना जा रहा है।

वंदे भारत और हाइड्रोजन ट्रेन में सबसे बड़ा फर्क

वंदे भारत एक इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट (EMU) ट्रेन है, जो पूरी तरह ओवरहेड बिजली लाइनों पर निर्भर रहती है। जहां विद्युतीकरण नहीं है, वहां यह नहीं चल सकती। इसके उलट हाइड्रोजन ट्रेन अपने भीतर ही बिजली तैयार करती है, इसलिए उसे ओवरहेड तारों की जरूरत नहीं होती। वंदे भारत 130 से 160 किमी प्रति घंटे की रफ्तार के साथ बड़े शहरों को जोड़ने के लिए डिजाइन की गई है, जबकि हाइड्रोजन ट्रेन शुरुआती चरण में लगभग 75 किमी प्रति घंटे की गति से उन रूट्स पर चलेगी जहां अभी डीजल इंजन इस्तेमाल किए जाते हैं।

रेलवे हाइड्रोजन तकनीक पर क्यों लगा रहा है दांव

भारतीय रेलवे ने अपने अधिकांश ब्रॉड गेज नेटवर्क का विद्युतीकरण पूरा कर लिया है। लेकिन कुछ पहाड़ी और हेरिटेज रूट अब भी ऐसे हैं जहां बिजली के खंभे और तार लगाना आसान नहीं है। कालका-शिमला, दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे और नीलगिरी माउंटेन रेलवे जैसे मार्ग प्राकृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील माने जाते हैं। ऐसे क्षेत्रों में डीजल इंजनों की जगह हाइड्रोजन ट्रेनें प्रदूषण कम करने के साथ पर्यावरण संरक्षण का बेहतर विकल्प बन सकती हैं।

क्या हाइड्रोजन ट्रेन वंदे भारत की जगह ले लेगी

फिलहाल ऐसी संभावना नहीं दिखती। दोनों ट्रेनों की भूमिका अलग-अलग तय की गई है। वंदे भारत आगे भी मुख्य कॉरिडोर और अधिक यात्री संख्या वाले रूट्स पर तेज रफ्तार सेवा देती रहेगी। वहीं हाइड्रोजन ट्रेन कम दूरी, क्षेत्रीय नेटवर्क और गैर-विद्युतीकृत या हेरिटेज मार्गों पर डीजल इंजनों का विकल्प बनेगी। हाइड्रोजन तकनीक अभी अपेक्षाकृत महंगी है, इसलिए जहां पहले से बिजली की व्यवस्था मौजूद है वहां इसे लागू करना व्यावहारिक नहीं माना जा रहा। रेलवे की रणनीति साफ है कि एक तकनीक गति बढ़ाएगी, जबकि दूसरी हरित परिवहन और कार्बन उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य को मजबूत करेगी।

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