विविधताओं का उत्सव: नया साल 1 जनवरी तक सीमित नहीं, जानिए भारत के राज्यों और धर्मों में नववर्ष की अनोखी परंपराएं...

Update: 2025-03-30 02:14 GMT
नया साल 1 जनवरी तक सीमित नहीं, जानिए भारत के राज्यों और धर्मों में नववर्ष की अनोखी परंपराएं...

नया साल 1 जनवरी तक सीमित नहीं, जानिए भारत के राज्यों और धर्मों में नववर्ष की अनोखी परंपराएं...

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विविधताओं का अनोखा उत्सव: भारत एक ऐसा देश है जहां नए साल का जश्न सिर्फ 1 जनवरी तक सीमित नहीं है। यहां की सांस्कृतिक विविधता और परंपराओं की गहराई इसे और खास बना देती है। लेकिन भारत की खासियत ये है कि यहां एक जनवरी के अलावा भी कई बार नया साल मनाया जाता है। चाहे वो बैसाखी हो, चंद्र कैलेंडर के हिसाब से मनाया जाने वाला गुड़ी पड़वा हो या फिर बिहू, पोइला बैशाख और पुथंडु जैसे त्यौहार। हर राज्य और समुदाय के पास अपने-अपने नए साल का तरीका है।

यहां नए साल की शुरुआत कभी फसल कटाई के साथ होती है, तो कभी मौसम के बदलाव के साथ। हर पर्व, हर उत्सव, अपनी परंपराओं और मान्यताओं का जश्न मनाता है। यही विविधता भारत की खूबसूरती है। आइए जानते हैं कि हमारे इस विशाल देश में कब-कब और कैसे नए साल का जश्न मनाया जाता है।

हिंदू नववर्ष: नवसंवत्सर की पावन शुरुआत

हिंदू धर्म में नवसंवत्सर की शुरुआत चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से मानी जाती है, जिसे हिंदू नववर्ष के रूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की थी। इसके साथ ही विक्रम संवत का भी शुभारंभ होता है जो भारतीय पंचांग का आधार है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार, यह तिथि हर साल मार्च-अप्रैल के महीने में आती है। इस दिन घरों को सजाया जाता है, पूजा-अर्चना की जाती है और खुशहाली की कामना की जाती है।

महाराष्ट्र का गुड़ी पड़वा

चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा तिथि मराठी और दक्षिण भारतीय समुदायों के लिए नए साल की शुरुआत का प्रतीक है। महाराष्ट्र में इसे गुड़ी पड़वा या मराठी-पाडवा के रूप में धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन घरों में गुड़ी सजाई जाती है, जो विजय और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है।

आंध्र प्रदेश व कर्नाटक का उगादि

आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना में इसी दिन को 'उगादि' के रूप में मनाया जाता है। दक्षिण भारत में उगादि को नए साल की शुरुआत का दिन माना जाता है और इसे उल्लासपूर्वक पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। इन क्षेत्रों में यह पर्व हिंदू पंचांग के चैत्र महीने के पहले दिन उत्सवपूर्वक मनाया जाता है।

नवरेह: कश्मीरी नववर्ष की नई शुरुआत

नवरेह कश्मीर में नव चंद्रवर्ष के रूप में मनाया जाता है और यह पर्व चैत्र नवरात्र के पहले दिन बड़े ही उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। खासतौर पर कश्मीरी पंडित समुदाय के लिए यह दिन बहुत महत्वपूर्ण होता है। नवरेह के अवसर पर घरों में विशेष पकवान बनाए जाते हैं और लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं।

पोइला बैशाख : बंगाली नव वर्ष का पहला दिन

पोइला बैशाख, जिसे पहेला बैशाख भी कहा जाता है, बंगाली नव वर्ष का पहला दिन है जिसे बंगाली समुदाय द्वारा उत्साहपूर्वक मनाया जाता है। यह पर्व हर साल 14 या 15 अप्रैल को मनाया जाता है और नई शुरुआत, समृद्धि और खुशहाली की कामना के साथ मनाया जाता है।

पुथंडु : तमिल नव वर्ष

पुथंडु , जिसे पुथुरूषम या तमिल नव वर्ष भी कहा जाता है, तमिल कैलेंडर के अनुसार वर्ष का पहला दिन होता है। इसे तमिल महीने चिधिराई के पहले दिन के रूप में मनाया जाता है और यह लुन्नीसोलर हिंदू कैलेंडर के सौर चक्र के अनुरूप होता है। इसी कारण, यह पर्व हर साल ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार 14 अप्रैल या उसके आसपास मनाया जाता है। ।

विषु: केरल का पारंपरिक नववर्ष उत्सव

विषु केरल में मनाया जाने वाला महत्वपूर्ण नववर्ष पर्व है, जिसे विशेष धूमधाम और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। इसी दिन तमिलनाडु में इसे बिसु परबा के नाम से भी जाना जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार, विषु का पर्व अप्रैल महीने में आता है।

बैसाखी: सिख नववर्ष और नई फसल का पर्व

बैसाखी सिख समुदाय के लिए नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक है, जिसे हरियाणा, पंजाब और जम्मू में विशेष धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व हर साल अप्रैल महीने में 13 या 14 तारीख को मनाया जाता है। बैसाखी सिर्फ नए साल का ही नहीं, बल्कि फसल कटाई के समय का भी उत्सव है।

नवरोज: पारसी समुदाय का नया साल

पारसी समुदाय नवरोज को अपने नववर्ष के रूप में हर्षोल्लास और धूमधाम से मनाता है। इसे पारसी न्यू ईयर के नाम से भी जाना जाता है और यह मुख्य रूप से मार्च और अगस्त में मनाया जाता है। यह पर्व वसंत विषुव के अवसर पर पड़ता है, जो आमतौर पर 20 मार्च को आता है।

बिहू: असम का पारंपरिक नववर्ष उत्सव

असम में बिहू नववर्ष की शुरुआत के रूप में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से फसल कटाई से संबंधित होता है और असम की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का एक अहम हिस्सा है। साल 2025 में बिहू का त्योहार 15 जनवरी को मनाया गया था। असम के प्रमुख त्योहारों में शामिल बिहू राज्य की पारंपरिक और सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

हिजरी: इस्लामिक नववर्ष की पवित्र शुरुआत

इस्लामिक नववर्ष की शुरुआत हिजरी कैलेंडर के पहले महीने, मुहर्रम, के पहले दिन से होती है, जिसे अत्यंत पवित्र माना जाता है। साल 2025 में इस्लामी नववर्ष 25 जून को मनाया जाएगा।

आषाढ़ी बीज: कच्छी समुदाय का नया साल

आषाढ़ी बीज का पर्व गुजरात के कच्छ क्षेत्र में कच्छी समुदाय द्वारा बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह दिन नए साल की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है और विशेष रूप से कृषि से जुड़े लोगों के लिए इसका खास महत्व होता है। 2025 में यह पर्व 22 जून, रविवार को मनाया जाएगा।

भारत एक ऐसा देश है जहाँ हम अनेकता में एकता की खूबसूरत मिसाल देख सकते हैं। यहाँ हर धर्म, राज्य और समुदाय का अपना कैलेंडर और नया साल मनाने की परंपरा है। चाहे वह चैत्र नवरात्रि का नवसंवत्सर हो, सिखों की बैसाखी, केरल का विशु, असम का बिहू या पारसियों का नवरोज़ .... हर त्यौहार नई उम्मीदों, खुशियों और बेहतर भविष्य की कामनाओं से जुड़ा है।

भले ही ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार नया साल व्यापक रूप से 1 जनवरी को मनाया जाता है, लेकिन भारत में पारंपरिक और सांस्कृतिक नववर्ष का महत्व अभी भी बना हुआ है। ये अनूठी परंपराएँ न केवल हमारी सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध करती हैं बल्कि हमें अपनी जड़ों से भी जोड़े रखती है।

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